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बेगम जान रिव्यू: सबके लिए नहीं बनी फिल्म, लेकिन देखनी सबको चाहिए

श्रीजीत मुखर्जी ने विभाजन के दौर की कहीं दूर कोने से एक अलग सी कहानी निकाली है.

FP Staff | Published On: Apr 14, 2017 12:11 PM IST | Updated On: Apr 14, 2017 02:22 PM IST

बेगम जान रिव्यू: सबके लिए नहीं बनी फिल्म, लेकिन देखनी सबको चाहिए

विद्या बालन की बेगम रिलीज हो गई है. विद्या की इस फिल्म का ट्रेलर तो दमदार है. और हमेशा की तरह विद्या ने साबित किया है कि उनके किरदारों के चुनाव उम्दा होते हैं.

बंगाली फिल्म राजकहिनी की हिंदी रीमेक में बेगम जान का किरदार कर रही विद्या के लिए ये फिल्म उनके ताज में एक और स्टार जोड़ सकती है.

भारत-पाक विभाजन पर अब तक बहुत सी फिल्में बन चुकी हैं लेकिन श्रीजीत मुखर्जी ने उस दौर के कहीं दूर कोने से एक अलग सी कहानी निकाली है. बेगम जान भारत-पाक के बॉर्डर पर बने कोठे की मालकिन की व्यवस्था से लड़ाई की कहानी है, जो अपनी पुरानी जगह को नहीं छोड़ना चाहती और इसके लिए वो विभाजन के फैसले के खिलाफ खड़ी हो जाती है.

बॉलीवुडलाइफ.कॉम ने बेगम जान के रिव्यू में फिल्म क्रिटिक श्रीजू सुधाकर ने विद्या के किरदार को बॉलीवुड के मेनस्ट्रीम फिल्मों की तुलना में कहीं ज्यादा बोल्ड कहा है. फिल्म का फर्स्ट हाफ सुस्त है और कहानी की जमीन तैयार करने और किरदारों के परिचय में ही निकल जाता है. कुछ किरदारों की गहराई में जाने से बचा सकता था. फर्स्ट हाफ में पार्टिशन पर बहुत बात नहीं की गई है.

स्क्रॉल.इन में नंदिता रामनाथ ने कहा है कि फिल्म में विभाजन को बेगम जान की कोठे की औरतों के नजरिए से देख रही इस फिल्म में औरतों का किरदार और मजबूत और दमदार रहा होता, अगर औरतें कागज की तरह पतली न होकर फिट और भरे-पूरे शरीर वाले उस जमाने के चलन को पकड़ पातीं.

डायरेक्टर ने इतिहास का बैकग्राउंड तैयार करने के लिए स्वतंत्र रूप से श्याम बेनेगल की क्लासिक फिल्म मंडी की मदद ली है. विभाजन के खिलाफ खड़ी विद्या अपने किरदार में थोड़ी संघर्ष करती नजर आती हैं, मूल बंगाली फिल्म की एक्ट्रेस के रितुपर्णा सेनगुप्ता की एक्टिंग के सामने वो थोड़ी फीकी पड़ गई हैं.

श्रीजीत ने बेगम जान के किरदार को रानी लक्ष्मीबाई और रजिया सुल्तान जैसी इतिहास की मजबूत महिलाओं के कतार में खड़ा करने की कोशिश की है.

फिल्म क्रिटिक मीना अय्यर ने टाइम्स ऑफ इंडिया में लिखा है, ‘विद्या बेगम जान के किरदार में जम रही हैं और इस किरदार के डायलॉग पर सीटियां बज सकती हैं. हालांकि फिल्म की बाकी औरतों के किरदार को बेहतर तरीके से गढ़ने की जरूरत थी. पार्टिशन पर राजनयिक स्तर पर हो रही घटनाएं और बातचीत बहुत सतही है.

इनयूथ.कॉम पर विनीता कुमार लिखती हैं कि फिल्म आपको दिमागी तौर पर हिला देती है. फिल्म की जान विद्या बालन हैं. फिल्म धर्म, समुदायों के मूल्यों पर सवाल तो खड़े करती ही है, साथ ही इस सच्चाई को भी भयंकर तरीके से दिखाती है कि कैसे औरतों को हमेशा से सेक्स ऑब्जेक्ट से ज्यादा कुछ नहीं समझा जाता. इनके अलावा चंकी पांडेय भी आपको अपने किरदार कबीर के रूप में बहुत कुछ याद करने को दे जाते हैं.

फ़र्स्टपोस्ट के रिव्यू में रेनिल अब्राहम ने लिखा है, 'फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष इसकी स्क्रिप्ट और डायलॉग हैं. हर किरदार इतना दमदार है कि उनमें से किसी एक को बेहतर चुनना बहुत मुश्किल है. हालांकि सिनेमेटोग्राफी जरूरत से ज्यादा प्रयोग करने के चक्कर में थोड़ी अटपटी लगती है. कुल मिलाकर बेगम जान चौंकाती है, झकझोरती है और दिल पर लगती है.'

फिल्म का संगीत अच्छा है. बेगम जान सबके लिए नहीं बनीं लेकिन सभी को ये फिल्म देखनी चाहिए.

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