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बाहुबली ही नहीं राजामौली भी मानते हैं जाति की श्रेष्ठता

फिल्म को सराहें, इसकी आलोचना करें मगर इसे सफलता का ऐसा पैमाना न बनाएं कि ये खराब सिनेमा को सफल बनाने वाले सिस्टम से बदल कर दर्शकों के सर पर पड़ने वाला लट्ठ बन जाए.

Animesh Mukharjee | Published On: May 01, 2017 08:29 PM IST | Updated On: May 01, 2017 09:03 PM IST

बाहुबली ही नहीं राजामौली भी मानते हैं जाति की श्रेष्ठता

बाहुबली एक भव्यता से भरी मनोरंजक फिल्म है. फिल्मी तरीके से कहें तो विद्या बालन के डायलॉग ‘एंटरटेनमेंट, एंटरटेनमेंट और एंटरटेनमेंट’ को पूरी तरह से बयां करती है.

मगर फिल्म देखने के बाद हिंदी फिल्म के दर्शक के तौर पर दिमाग में सबसे पहले जो बात आई वो ये थी कि ये रीजनल सिनेमा का बॉलीवुड की कथित सुपीरियरसिटी और एलीटनेस पर एक तमाचा है.

मगर धीरे-धीरे बाहुबली की सफलता जिस तरह से सेलिब्रेट की जा रही है मुझे डर लगने लगा है.

बाहुबली से उभरे कई सवाल

2015 में आई बाहुबली देखने के बाद ‘कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा?’ के अलावा भी एक सवाल उठा था. ‘रेप ऑफ अवंतिका’. पहले पार्ट में महेंद्र बाहुबली यानी प्रभास जिस तरह से अवंतिका को अपना बनाते हैं, उसने काफी सवाल खड़े किए थे. इस बार उसे काफी सुधारा गया है.

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अमरेंद्र बाहुबली के हाथों पर चढ़कर देवसेना का नाव में जाना इसे अलग से दिखाता है. देवसेना की दरबार में पेशी और उसका फेमिनिस्ट स्टैंड लेनेवाला सीक्वेंस फिल्म की कहानी में अलग से जोड़ा गया लगता है.

इसके अलावा पहले पार्ट से दूसरे पार्ट में सुजीत और तमन्ना के रोल में आए बदलाव इशारा करते हैं कि कहानी में ऐसे कई बदलाव हुए हैं जो शायद पहले नहीं लिखे गए थे.

बाहुबली 2 में सशक्त रोल में महिलाएं

पता नहीं कि राजमौली ने मीडिया और सोशलमीडिया पर अवंतिका वाले सीक्वेंस की आलोचनाएं पढ़ी थीं या नहीं, मगर बाहुबली 2 की कहानी में जिस तरह से महिला किरदारों को सशक्त बनाया गया है, उसकी तारीफ होनी चाहिए.

इन अच्छी बातों के बाद भी फिल्म कुछ ऐसी बातों और अंधविश्वासों का समर्थन करती है जो कचोटता है. ‘बाजीराव मस्तानी’ में नायक के चेहरे पर चितपावन ब्राह्मणों के तेज की तरह इसमें भी सही काम करने के लिए बार-बार क्षत्रिय धर्म का हवाला दिया जाता है.

बिगड़े हुए हाथी को संभालने वाले सीन में भगवान गणेश का मेटाफर इस्तेमाल होता है. ऐसी कई और छोटी-छोटी बाते हैं जिसमें कहीं न कहीं जाति और अंधविश्वास के स्याह पहलुओं को ग्लोरिफाई करके दिखाया जाता है.

अगर आपको लगता है कि ये सब एक जबर्दस्ती के आलोचक के दिमाग की उपज है तो आपको राजमौलि का एक फेसबुक पोस्ट पढ़ना चाहिए जिसमें वो मनुस्मृति और वर्ण व्यवस्था को सही ठहराते हैं.

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पढ़ने की बात से एक बात और जाति व्यवस्था के दंश को झेले बिना उसमें सही होने के लॉजिक तलाशने वालों को सुदामा पांडे ‘धूमिल’ की आखिरी कविता याद रखनी चाहिए,

'लोहे का स्वाद

लोहार से मत पूछो

उस घोड़े से पूछो

जिसके मुंह में लगाम है'

बाहुबली का जश्न गलत तरह से मनाया जा रहा है

इसमें कोई शक नहीं बाहुबली देखकर मजा आता है. उसकी भव्यता सुकून देती है. विज्ञान से परे जाकर जिस तरह के ऐक्शन सीक्वेंस प्लान किए गए हैं वो अद्भुत हैं.

अपनी कल्पना में भी और उनको पर्दे पर दिखाए जाने में भी. सब बढ़िया है मगर क्या इससे राणा दुग्गुबाती के एक्सप्रेशनलेस चेहरे को अदाकारी का बेहतरीन नमूना मान लिया जाए. या कहानी के बड़े-बड़े झोल (स्पॉयलर नहीं दूंगा) भुला दिए जाएं.

2005-06 के आस-पास मल्टिप्लेक्स फिल्में आ रही थीं. ऐसी कहानियां जिनमें हीरो हीरो दिखता ही नहीं था. ऐक्शन होता ही नहीं था.

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बड़े कॉर्पोरेट्स में काम करने वाले, विदेश में रहने वाले, हमेशा सूट पहनने वाले नायक वाली फिल्में. ऐसे में दो ऐक्शन पैक फिल्में आईं. ‘पोकिरी’ की रीमेक ‘वॉन्टेड’ और बहुत ही कैची डायलॉग से भरी ‘दबंग’.

इन दोनों फिल्मों ने दर्शकों को उस दौर के चलन से हटकर कुछ दिया और खूब मनोरंजन किया. मगर इनकी सफलता ने अगले 10 सालों में दक्षिण की दर्जनों फिल्मों के सरदर्द देने वाले घटिया रीमेक दिए गए.

कमाई के तोड़े रिकॉर्ड

100 करोड़ क्लब को सफलता का पैमाना बना दिया गया. जिस फिल्म ने 100 करोड़ जितनी जल्दी कमाए वो ज्यादा अच्छी. तो क्या बाहुबली के बाद एक दर्शक के तौर पर हजार करोड़ क्लब झेलना पड़ेगा.

फिल्म की सारी तारीफ सिर्फ और सिर्फ इसी बात पर हो रही है कि वो कितनी जल्दी कितने सौ करोड़ कमा रही है. क्या ‘मसान’, ‘आंखों देखी’,’ दम लगा के हइशा’ जैसी फिल्मों की राह अब दस गुना कठिन होने वाली है क्योंकि उनका मुकाबला अब 100 करोड़ नहीं हजार करोड़ क्लब से होने वाला है. क्या सिनेमा त्योहारों पर फिल्म थिएटर दादागिरी की तरह से बुक करके घटिया फिल्में दिखाने की प्रथा में 10 गुना और इजाफा होगा?

अगर वॉन्टेड के चलते दर्शकों को सन ऑफ सरदार, सिंघम रिटर्न्स, रईस, रेडी और शिवाय जैसी फिल्में झेलनी पड़ी तो क्या बाहुबली के हजार करोड़ कमाने के बाद अगले दस साल तक ‘मोहन जोदाड़ो’ (या जो भी नाम आशुतोष गोवारिकर ने रखना चाहा हो) का ‘एक्शन जैक्सन’ के साथ कॉकटेल जैसा कुछ देखने को मिलेगा. या साजिद खान की किसी फिल्म ने बाहुबली की कमाई का रिकॉर्ड तोड़ दिया तो उन्हें अगला सत्यजीत रे या रित्विक घटक मान लिया जाएगा.

बाहुबली निश्चित रूप से हिंदी सिनेमा के स्टार सिस्टम और मौलिकता से दूर भागने की प्रवृत्ति पर एक बहुत बड़ा तमाचा है. इसे सराहें, इसकी आलोचना करें मगर इसे सफलता का ऐसा पैमाना न बनाएं कि ये खराब सिनेमा को सफल बनाने वाले सिस्टम से बदल कर दर्शकों के सर पर पड़ने वाला लट्ठ बन जाए.

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