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बाहुबली 2 मूवी रिव्यूः रहस्य और रोमांच से रचे संसार को भूलना मुश्किल होगा

कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा, फिल्म में इस सवाल के अलावा भी बहुत कुछ देखने लायक है

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Hemanth Kumar | Published On: Apr 28, 2017 12:17 PM IST | Updated On: Apr 28, 2017 01:14 PM IST

बाहुबली 2 मूवी रिव्यूः रहस्य और रोमांच से रचे संसार को भूलना मुश्किल होगा

एसएस राजामौली की महागाथा फिल्म बाहुबली 2: द कनक्लूजन देखने के बाद आप बैठकर सोचने लगते हैं. याद करते हैं कि फिल्म देखते वक्त आप किस दौर से गुजरे हैं. उसके बाद आपके दिमाग में एक मूल सवाल कौंध सकता है कि हम अपने इर्दगिर्द की अच्छी चीजों को क्यों भूल गए?

तत्काल सुख और क्षणिक आनंद के इस दौर में क्या ऐसी कला (इस मामले में फिल्म) हो सकती है, जो हमें उन चीजों की याद दिलाए जिन्हें हम काफी वक्त पहले भुला बैठे हैं? गुजरे सालों के दौरान हमने अपने दिमाग की घेराबंदी कर ली है और अब हम हर कहानी को संदेह की नजर से देखने के आदी हो गए हैं.

क्या आप आश्चर्य को नाप सकते हैं?

लेकिन आप आश्चर्य को कैसे नाप सकते हैं? यही चीज बाहुबली 2: द कनक्लूजन को वो बनाती है, जो वह है. इसमें जिस तरह से कहानी कही गई है वह एक जादूगरी लगती है. जिस तरह के भव्य विजुअल्स बाहुबली 2 में हैं, वैसे शायद ही किसी भारतीय फिल्म में देखने को मिलेंगे और इन्हें जल्द भुला पाना आसान नहीं होगा.

जैसे हर कोई गया था वैसे ही मैं भी यह देखने गया था कि कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा, लेकिन फिल्म में इसके अलावा भी बहुत कुछ देखने लायक है. राजामौली इस फिल्म को देखने के दौरान एक रोलर कोस्टर जैसी राइड करवाते हैं जो कि बड़े परिदृश्य में एक ज्वलंत सवाल हमारे लिए छोड़कर जाती है.

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फिल्म की हर चीज हमें खींचकर उस दौर में ले जाती है. लेकिन बाहुबली 2 की ताकत, इसके कैरेक्टर्स में है. साथ ही फिल्म यह दिखाती है कि जिस चीज में उनका भरोसा है उसे पूरा करने के लिए वे किस हद तक जा सकते हैं.

कहानी के साथ जबरदस्त तरीके से डेवलप हुए हैं किरदार

अमरेंद्र बाहुबली (प्रभास) हर किसी से टक्कर लेने को तैयार हैं क्योंकि उनका मानना है कि धर्म किसी भी व्यक्ति से बड़ा होता है. इसके बाद फिल्म में देवसेना (अनुष्का शेट्टी) का कैरेक्टर है, जो कि सही के लिए खड़ी होती है. हमें फिल्म में यह भी पता चला कि शक्तिशाली शिवगामी (राम्याकृष्णा) आखिरकार एक मनुष्य है और मानवीय प्रवृत्तियों की शिकार होती है.

बिज्जलदेव (नासर) बाहुबलीः द बिगनिंग के मुकाबले दूसरे पार्ट में और ज्यादा धूर्त साबित होता है. सत्ता की अपनी भूख मिटाने के लिए भल्लालदेव (राणा दुगुबती) खुद को एक शैतान में तब्दील कर लेता है और अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए दिमागी जंग शुरू कर देता है.

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इन सबके परिणामस्वरूप कैरेक्टर्स में विवाद शुरू हो जाता है और इसी कौतुहल से बाहुबली 2 की कहानी बुनती है जो कि शुरू से लेकर आखिरी तक आपको बांधे रखती है. कौतुहल की बात की जाए तो एसएस राजामौली ने हर फ्रेम पर इतना ध्यान दिया है कि मैंने कई बार अपनी पलकें झपकाने से भी खुद को रोक लिया, कि कहीं कहानी का कोई बेहद अहम क्षण मिस न हो जाए.

एक खास दृश्य में बाहुबली देवसेना को धनुर्विद्या सिखाता है और यह इतना काव्यात्मक दृश्य है कि आप इसे देखकर आनंद से सराबोर हो जाएंगे. राजामौली “हमसा नवा’ गाने में फिल्म के विजुअल ट्रीटमेंट को और ऊपर ले जाते हैं.

इंटरवल का जादू भरा आश्चर्य

इंटरवल आश्चर्य की नई सीमाओं के साथ आता है. इस फिल्म का जादू आपकी नस-नस में भर जाता है, भले ही आपका दिमाग कहता है कि आप इस तरह की कहानियां पहले भी सुन चुके हैं.

फिल्म की खूबसूरती इसके कहानी कहने के अंदाज में छिपी हुई है और राजामौली इस चीज को बखूबी भुनाना जानते हैं. अगर बाहुबलीः द बिगनिंग हमें माहिष्मती की एक झलक देता है, तो दूसरा पार्ट इसके चरित्रों के मनोविज्ञान को दिखाता है. दूसरा पार्ट बताता है कि कैसे इन चरित्रों की विचारधारा के टकराव से भयंकर नतीजे निकलते हैं.

हर भाव, यहां तक कि आंसू की एक बूंद भी गिरती है तो उस पर फोकस किया जाता है और कैमरा तब तक होल्ड रहता है जब तक कि आप उस कैरेक्टर से और अधिक संवेदना नहीं जताने लगते.

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फिल्म के असर को बताना मुश्किल

अगर सच कहा जाए तो बाहुबलीः द कनक्लूजन का एक्सपीरियंस शब्दों में बयां करना बेहद मुश्किल है. हम फिल्म में पसंद आने वाली हर चीज को और जो पसंद नहीं आया उसे विस्तृत रूप से बता सकते हैं, लेकिन हम वह नहीं बता सकते जो फिल्म ने हम पर अपना प्रभाव छोड़ा है. यह फिल्म हमें उसकी दुनिया का हिस्सा बनने के लिए मजबूर करती है.

अमरेंद्र बाहुबली की भूमिका निश्चित तौर पर प्रभास के लिए एक लाइफटाइम रोल है और उन्होंने इस रोल को निभाने में अपनी पूरी जान लगा दी है. राजामौलि ने भी प्रभास को उस स्तर पर पहुंचने में मदद की है जहां उनके बिना फिल्म का होना नामुमकिन लगता है.

राणा दुगुबती ताकतवर राजा भल्लालदेव के रूप में जबरदस्त लगते हैं. फिल्म में भाइयों के बीच दुश्मनी को बेहद गहराई और व्यापक रूप से दिखाया गया है. राणा का प्रभास के साथ टकराव देखना काफी प्रभावशाली है. फिल्म का सबसे बड़ा खुलासा शायद अनुष्का हैं, जिन्होंने एक विद्रोही योद्धा राजकुमारी देवसेना के रूप में इस फिल्म में अपने करियर का सबसे बेहतरीन परफॉर्मेंस दिया है.

उनका देवगामी बनीं राम्याकृष्णा से टकराव फिल्म को नई ऊंचाई देता है. यह बेहद दुर्लभ है. दो महिला कैरेक्टर्स जब भी वे आमने-सामने होती हैं तो पुरुषों से पूरा आकर्षण छीन लेती हैं.

राम्याकृष्णा, सत्यराज और नासर ने भी ऐसा परफॉर्मेंस दिया है कि आप अगर उनसे आमने-सामने मिलें तो शायद उनके असली नामों की बजाय उन्हें बाहुबली के नामों से पुकारेंगे.

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कमियां इस विशाल कैनवास पर मायने नहीं रखतीं

बाहुबली 2: द कनक्लूजन एक ऐसी फिल्म भी है, जहां आप इसके हर पहलू की तारीफ किए बगैर नहीं रह सकते. चाहे सिनेमैटोग्राफी हो, या वीएफएक्स, प्रोडक्शन डिजाइन, कॉस्ट्यूम्स इनकी तारीफ में आपके शब्द कम पड़ जाएंगे.

हां, फिल्म के क्लाइमेक्स में कुछ हिस्से ऐसे हैं जो कि और बेहतर हो सकते थे और वीएफएक्स को और मांझा जा सकता था. लेकिन, यह सब इतनी तेजी से घटता है और इतना सधा हुआ है कि अंत में इसका कोई महत्व नहीं रह जाता है.

देश की सबसे बड़ी मोशन पिक्चर बनाने की कोशिश में राजामौली ने दर्शकों को फिल्मों, या कहा जाए कि उनकी फिल्मों, के अचरज भरे जगत में रहने की एक वजह दे दी है. इस हिसाब से कोई भी रिव्यू इस फिल्म को समेटने में कामयाब नहीं हो सकता है.

इस पर विश्वास करने के लिए इसे महसूस करना होगा. फिल्म ‘इनसेप्शन’ में एक डायलॉग कुछ इस तरह है, ‘बड़ा सपना देखने से परेशानी नहीं होती है.’ शायद यही चीज राजामौली ने इस फिल्म को बनाने से पहले खुद से बोली होगी. और इसे देखने के बाद हम उनसे सहमत दिखते हैं.

इस जबरदस्त एपिक ड्रामा को जरूर देखना चाहिए. लेकिन, क्या इसे वास्तव में खत्म होना चाहिए? क्योंकि निश्चित तौर पर यह आपको ऐसी जगह छोड़ देती है जहां आप और ज्यादा चाहते हैं, और तब तक अंत में चलने वाले क्रेडिट्स आने लगते हैं.

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