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बाहुबली 2: कटप्पा-बाहुबली और सिनेमा का सीक्वल मैनेजमेंट

कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा वाले राज को राज रखने के लिए फिल्म से जुड़े 150 लोगों को बॉन्ड भरवाया गया

Girijesh Kumar | Published On: Apr 29, 2017 03:11 PM IST | Updated On: Apr 29, 2017 03:11 PM IST

बाहुबली 2: कटप्पा-बाहुबली और सिनेमा का सीक्वल मैनेजमेंट

कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा? व्हाट्सऐप, फेसबुक, यूट्यूब और न्यूज चैनल्स वाला इंडिया इस सवाल का जवाब उस वक्त से ढूंढ रहा था, जब जुलाई 2015 में एस एस राजमौली ने 180 करोड़ का पहला ‘बाहुबली बम’ फोड़ा था. 28 अप्रैल 2017 को ‘बाहुबली 2- द कनक्लूजन’ रिलीज होते ही मानो सदी के सबसे बड़े रहस्य से पर्दा उठ गया.

न्यूज वेबसाइट्स से लेकर न्यूज चैनल्स पर बड़ी-बड़ी हेडलाइन चली- खुल गया राज, मिल गया 2 साल पुराने सवाल का जवाब- कटप्पा ने बाहुबली को राजमाता के कहने पर मारा. अब ये बात सच है या नहीं ये तो आपको फिल्म देखकर ही पता लगाना चाहिए, लेकिन अगर ये सच भी हो तो इस राज के बेपर्दा होने से माहिष्मती के युवराज बाहुबली का जलवा कम नहीं होता, क्योंकि लार्जर दैन लाइफ वाले पैमाने और बेहतरीन विजुअल इफेक्ट्स से बनाई गई बाहुबली सुनने या जानने की नहीं, पूरी तरह देखने की चीज है.

रिपोर्ट्स तो यहां तक आ रही है कि कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा वाले राज को राज रखने के लिए फिल्म से जुड़े 150 लोगों को बॉन्ड भरवाया गया, गोपनीयता की शपथ दिलाई गई और शपथ तोड़ने पर बाकायदा सजा तक का इंतजाम था. बहरहाल, देखा जाए तो लाइक्स, शेयर, हैशटैग और रिट्वीट के इस दौर में कुछ चीजें क्यों इतनी तेजी से ‘वायरल’ हो जाती हैं, समझ में नहीं आता.

‘पीएसपीओ नहीं जानते?’ वाले फॉर्मूले पर ऐसी हवा बना दी जाती है कि अगर आपने इसके बारे में नहीं सुना, तो आप कहीं न कहीं अपने दौर से कदमताल मिलाने में पिछड़ रहे हैं. ये हमने ‘गंगनम’ में भी देखा था, ‘कोलावरी डी’ में भी देखा था. लेकिन कुल मिलाकर बाहुबली के कर्ता धर्ता जिस बड़े पैमाने का ‘बज़’ क्रिएट करने में कामयाब रहे उसके लिए उन्हें साधुवाद देना चाहिए.

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बाहुबली का जादू पार्ट टू तक आते-आते जुनून में बदल गया

साधुवाद इसलिए क्योंकि बॉलीवुड में फिल्मों के सीक्वल पहले भी बनते रहे हैं, लेकिन जिस तरह ‘बाहुबली- द बिगनिंग’ के जादू को ‘बाहुबली- द कनक्लूजन’ तक आते आते जुनून बना दिया गया वो हर किसी के बूते की बात नहीं. जिस तरह दो साल बाद बाहुबली पार्ट-2 रिलीज करने से पहले पार्ट-1 को दोबारा रिलीज करके दर्शकों की यादों पर पड़ी धूल हटाई गई, पार्ट-2 के लिए पूरा माहौल तैयार किया गया, वो तमाम फिल्म निर्माताओं के लिए एक मिसाल है और इससे टीम बाहुबली को करोड़ों की कमाई होना तय है.

साधुवाद इसलिए भी देना चाहिए कि आज जब फिल्म बनाने पर जितना पैसा खर्च किया जाता है, तकरीबन उतना ही बजट फिल्म के प्रचार-प्रसार यानी प्रमोशन के लिए रखा जाता है. फिल्म के स्टारकास्ट को लेकर बड़े बड़े ईवेंट्स कराए जाते हैं, मीडिया में चैट या इंटरव्यू कराए जाते हैं. लेकिन बाहुबली के केस में ये सब भी ज्यादा देखने को नहीं मिला. सब कुछ जैसे सोशल मीडिया पर ही मैनेज कर लिया गया. और नतीजा ये है कि महंगी टिकट के बावजूद बाहुबली-2 के शोज हाउसफुल जा रहे हैं, हर तरफ टिकट के लिए मारामारी मची है.

याद कीजिए वो दौर जब मीडिया का इतना बड़ा रोल नहीं था और फिल्मों के सीक्वल पूरी तरह दर्शक की रिकॉल क्षमता पर भरोसा करके बनते थे. उस दौर में सीक्वल के हिट होने की कोई गारंटी नहीं होती थी. 1967 में आई देव आनंद की सस्पेंस थ्रिलर ‘ज्वेल थीफ’ सुपरहिट साबित हुई थी, लेकिन 1996 में आया उसका सीक्वल फिल्म ‘रिटर्न ऑफ ज्वेल थीफ’ शायद ही किसी को याद होगी.

1986 में आई श्रीदेवी की ‘नगीना’ ब्लॉकबस्टर बनी, लेकिन 1989 में आई उसकी सीक्वल ‘निगाहें’ बॉक्स ऑफिस पर कुछ खास नहीं कर पाई. 1990 में ‘घायल’ जैसी सुपरहिट फिल्म देनेवाले सनी देओल ने भी 26 साल बाद 2016 में ‘घायल- वंस अगेन’ का हश्र देख लिया.

हालांकि बीते दशकों में धूम, दबंग, सिंघम हाल में आई कहानी के सीक्वल ने अच्छा बिजनेस किया. लेकिन इसकी वजह मीडिया या सोशल मीडिया मैनेजमेंट नहीं रही, इसकी वजह रही सधी हुई स्टोरी, बेहतरीन एक्शन, स्पेशल इफेक्ट्स और चुस्त एडिटिंग.

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फिल्म का जादू बनाए रखना आसान नहीं

ये बात कोई राज नहीं कि फिल्म के पिछले पार्ट की जबर्दस्त कामयाबी दर्शक को पहले दिन तो थिएटर तक ला सकती है लेकिन फिल्म में दम न हो तो बड़ी बड़ी फ्रेंचाइज भी दम तोड़ देती हैं. और ये खतरा हर सीक्वल पर मंडराता रहता है. फिर भी सिनेमा, सस्पेंस और सीक्वल का खेल अपनी रफ्तार से चलता रहता है. आज जब बाहुबली का सीक्वल हर तरफ धूम मचा रहा है तो कबीर खान की सलमान स्टारर ‘टाइगर’ का सीक्वल ‘टाइगर जिंदा है’ का प्रोमो आ चुका है, रामगोपाल वर्मा की ‘सरकार 3’ रिलीज होने वाली है और धूम रीलोडेड, डॉन-3 जैसी फिल्में कतार में हैं.

हालांकि इसी दुनिया में ऐसा सिनेमा भी बनता है जहां कहानी जैसी कोई कहानी होती ही नहीं. जहां पर्दे पर असल जिंदगी के प्रतिबिंद उकेरे जाते हैं. उस सिनेमा को देखने का अलग आनंद है. ईरान के जाने माने डायरेक्टर अब्बास कियारोस्तामी कहते थे कि जिस कहानी का अंत उन्हें पहले से पता हो उस पर वो फिल्म बनाते ही नहीं.

उनके लिए फिल्ममेकिंग जिंदगी जैसी एक यात्रा थी जिसमें आपको कुछ पता नहीं होता कि अगले पल क्या होगा. लेकिन कियारोस्तामी और उनका सिनेमा अपवाद है. क्योंकि दुनिया के किसी भी कोने में पॉपुलर सिनेमा का इकलौता मकसद होता है अर्थशास्त्र को साधना.

इसके लिए जरूरी है एक सुनियोजित पटकथा जिसमें एक्शन, इमोशन, रोमांस और कॉमेडी की छौंक हो, थ्रिल और सस्पेंस का मसाला हो. और वो सस्पेंस अगला पार्ट आने तक लोगों के जेहन में ‘कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा’ जैसा सवाल बनकर तैरता रह जाए तो क्या कहने.

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