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चोरी करके बनाई गई वो 6 फिल्में जिसने आमिर खान को मि. परफेक्शनिस्ट बनाया

नई सदी के साथ ‘लगान’ ने हिंदी सिनेमा को एक ऐसा सितारा दिया, जो साल दो साल की तसल्ली के साथ एक फिल्म बनाता है

Animesh Mukharjee | Published On: May 01, 2017 12:50 PM IST | Updated On: May 01, 2017 01:30 PM IST

चोरी करके बनाई गई वो 6 फिल्में जिसने आमिर खान को मि. परफेक्शनिस्ट बनाया

सिनेमा के कई जानकार कहते हैं कि आमिर बॉलीवुड में सिनेमा की गहरी समझ रखने वाले गिने-चुने स्टार्स में से एक हैं. एक ऐसा एक्टर-प्रोड्यूसर जिसकी फिल्मों का इंतजार सबको रहता है. मगर आमिर की चर्चित फिल्मों में से कई ऐसी हैं, जिनको अलग-अलग तरह से दूसरी फिल्मों से कॉपी किया गया है.

आमिर खान के करियर को हम तीन हिस्सों में बांट सकते हैं. पहला जब हर लड़का गाता था, ‘पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा’ और लड़कियां फिल्म के बाद दुपट्टे के कोर से आंसू पोंछते हुए थिएटर के बाहर निकलती थीं. दूसरा दौर ‘आतंक ही आतंक’ और ‘मेला’ जैसी फिल्मों का आया जिसकी फिल्मों को आमिर खुद भी याद न करना चाहें.

फिर नई सदी के साथ ‘लगान’ ने हिंदी सिनेमा को एक ऐसा सितारा दिया, जो साल दो साल की तसल्ली के साथ एक फिल्म बनाता और उसमें से लगभग सारी (‘मंगल पांडे’ की ‘तलाश’ छोड़ दें) बार-बार देखने लायक होती थीं. अपनी फिल्मों के इन तीनों दौर में आमिर की फिल्मों की समझ और उनका अपनी फिल्मों में दखल और कभी कभी दखलअंदाजी भी बढ़ी.

आज आमिर खान अपनी फिल्मों में बहुत मेहनत करते हैं. मगर उन तमाम विदेशी लेखकों, निर्देशकों को भी क्रेडिट मिलना चाहिए जिन्होंने सबसे पहले ये कॉन्सेप्ट और कहानियां दुनिया के सामने रखीं. जिनकी नींव पर हिंदी सिनेमा की कई चर्चित फिल्में बनीं.

जो जीता वही सिकंदर

‘उसने बात की कुछ ऐसे ढंग से, सपने दे गया वो हज़ारों रंग के... पहला नशा’ मजरूह सुल्तानपुरी के लिरिक्स, उदित नारायण और कविता कृष्णमूर्ति की आवाज़, स्लोमोशन में आमिर खान, क्यूट सी आयशा जुल्का और उड़ती हुई स्कर्ट को रोकती पूजा बेदी.

1992 में आई ‘जो जीता वही सिकंदर’ आज भी एक पूरी पीढ़ी को नॉस्टैल्जिया में ले जाती है. दो कॉलेजों के बीच की लड़ाई, बाली उमर के प्रेम और सायकिल रेस की कहानी का बड़ा हिस्सा अंग्रेजी फिल्म ‘ब्रेकिंग अवे’ से लिया गया था. नासिर हुसैन की प्रोड्यूस की हुई ये आखिरी फिल्म का सायकिलिंग वाला हिस्सा ‘ब्रेकिंग अवे’ से हद से ज़्यादा मिलता है. जब नासिर से इसके बारे में पूछा गया था तो उनका कहना था कि उन्होंने ये फिल्म देखी ही नहीं. ये बहुत अजीब इत्तेफाक है.

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गुलाम

अगर आप को लगता है कि मर्लिन ब्रांडो से सिर्फ अमिताभ बच्चन प्रेरित हुए हैं तो ऐसा नहीं है. आमिर खान की गुलाम मर्लिन ब्रांडो की 1954 की फिल्म ‘ऑन द वॉटर फ्रंट’ की नकल थी. एक छोटा उभरता हुआ बॉक्सर गुंडों के एक गैंग के लिए काम करने लगता है. अनजाने ही एक हत्या का गवाह बन जाता है. बॉक्सर का भाई इस गैंग के लिए काम करता है. ये सब ब्रांडो की ऑन द वॉटर फ्रंट का हिस्सा है. बस ब्रांडो कार से निकल कर भीगते हुए ‘जादू है तेरा ही जादू है’ नहीं गाते हैं.

फिल्म में किरदारों की बॉडी लैंग्वेज़ पुरानी अंग्रेज़ी फिल्म ‘रिबेल विदाउट अ कॉज़’ से भी ली गई है. वैसे इस फिल्म को पहले महेश भट्ट डायरेक्ट करने वाले थे. शाहरुख खान और पूजा भट्ट को लीड रोल में लिया जाने वाला था. बाद में भट्ट साहब ने डायरेक्शन छोड़ दिया. पूजा भट्ट प्रोड्यूसर बन गईं और शाहरुख खान ने भी फिल्म छोड़ दी.

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अकेले हम अकेले तुम

फिल्म बनाने का एक बढ़िया फॉर्मूला सुनिए. एक अच्छी अंग्रेज़ी फिल्म की कहानी लो. उसमें किसी दूसरी क्लासिक फिल्म का प्लॉट मिलाओ और ऊपर से चुराए हुए सुपर हिट गाने छिड़क दो. ‘अकेले हम अकेले तुम’ मेरिल स्ट्रीप (अगर आप इन्हें नहीं जानते तो खुद को डॉनल्ड ट्रंप मान सकते हैं) की 1979 में आई फिल्म ‘क्रेमर वर्सेस क्रेमर’ की नकल है. हिंदी फिल्म में एक ओर जहां क्रेमर से फ्रेम के फ्रेम उठाए गए हैं. अंग्रेज़ी फिल्म ने बेस्ट फिल्म और बेस्ट ऐक्टर (मेल फीमेल दोनों) के साथ कुल 5 ऑस्कर जीते थे.

हिंदी वर्ज़न में कहानी को अलग दिखाने के लिए अभिमान का प्लॉट भी मिलाया गया है. रही सही कसर अन्नू मलिक ने पूरी की है. फिल्म के लगभग सारे गाने अलग-अलग जगह से चोरी किए हुए हैं. ‘राजा को रानी से प्यार हो गया’ गॉड फादर के थीम म्यूज़िक पर बनाया गया है. ‘दिल मेरा चुराया क्यों’ को जॉर्ज माइकल के एल्बम से उड़ा लिया गया.

वैसे एक मज़ेदार बात और इस फिल्म के लिरिसिस्ट मजरूह सुल्तानपुरी थे. मजरूह साहब ने बाद में उनकी लिखी लिरिक्स में अन्नू मलिक के छेड़छाड़ करने की बात कही और राजा को रानी से प्यार हो गया को अपना लिखा गाना कहने से मना कर दिया. तो दोस्तों, गुनगुना लीजिए, ‘ऐसा ज़ख्म दिया है, जो न फिर भरेगा...’

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रंग दे बसंती

रंग दे बसंती हिंदी सिनेमा की उन फिल्मों में से है जिसके क्लाइमैक्स पर लंबी बहस हो सकती है. एक ओर फिल्म दर्शकों को अपने आप से बांध लेती है, दूसरी ओर उसका कानून हाथ में लेने वाला संदेश भी गले नहीं उतरता. फिल्म में एआर रहमान के संगीत को कालजयी कहा जा सकता है.

राकेश ओमप्रकाश मेहरा के डायरेक्शन में बनी इस फिल्म की कहानी कमलेश द्विवेदी ने 90 के दशक की शुरुआत में लिखी थी. तब पहले आहूति और बाद में यंग गन्स ऑफ इंडिया के नाम से प्लान की गई इस फिल्म में 90 के दशक में युवा पीढ़ी के अंदर पनपते आक्रोश को लेकर प्लॉट लिखा गया था. बाद में जब राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने जब ये फिल्म बनाई तो इसमें कुछ बदलाव किए गए.

2006 में रिलीज़ हुई ‘रंग दे बसंती’ का बड़ा हिस्सा 1948 की फिल्म ‘ऑल माय सन्स’ से प्रेरित है. ऑल माय सन एक अमीर परिवार के लड़के की कहानी है जिसकी कंपनी के खराब पुर्जों के कारण द्वितीय विश्वयुद्ध में 21 पायलट मारे जाते हैं. इसके बाद फिल्म प्रेम, हत्या और आत्महत्या के साथ फिल्म खत्म होती है.

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गजनी

निर्माता-निर्देशक क्रिस्टोफर नोलन ने सन् 2000 में अपनी फिल्म ‘मोमेंटो’ से हॉलीवुड में एक नई लकीर खींची. एक आदमी जिसकी याददाश्त सिर्फ कुछ मिनट तक रहती है अपनी पत्नी के कातिल को तलाश रहा है. उसके पास एक पोलोराइड कैमरा है. और कुछ धुँधले से सबूत. ‘मोमेंटो’ स्क्रीनप्ले और डायरेक्शन के लिहाज से बहुत ही उम्दा और नए तरह की फिल्म थी.

2005 में इसी कहानी पर तमिल फिल्म गजनी बनी. 2008 में तमिल की गजनी का रीमेक हिंदी में बना. मोमेंटो और गजनी की कहानी बिलकुल एक है. इसके बारे में जब आमिर खान से पूछा गया तो उन्होंने वही जवाब दिया जो उनके चाचा नासिर हुसैन ने ‘जो जीता वही सिकंदर’ के समय दिया था. आमिर का कहना है कि डायरेक्टर मुर्गदास और उन्होंने ये फिल्म पहले नहीं देखी थी. ये बस इत्तेफाक है कि एक ही जैसी कहानी पर दोनों ने फिल्म बना डाली.

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लगान

‘लगान’ बेशक हिंदी सिनेमा की सबसे अच्छी फिल्मों में से एक है. रहमान का संगीत, हर एक किरदार की बेहतरीन अदाकारी और भुवन, गौरी और एलिजाबेथ का प्रेम त्रिकोण. आप ये फिल्म कितनी ही बार देख चुके हों आखिरी बॉल पर कैप्टन रसेल के हाथ में गेंद आने पर एक बार सांस अटकती ही है.

लगान की जादुई कहानी दरअसल एक असली घटना और उस पर बनी दो फिल्मों पर आधारित है. लगान की कहानी की जड़ें हिंदुस्तान से नहीं जर्मनी से जुड़ती हैं. 1981 में सिल्वेस्टर स्टेलॉन की फिल्म आई थी ‘एस्केप टु विक्ट्री’ या ‘विक्ट्री’. फिल्म द्वितीय विश्वयुद्ध के समय जर्मन कैंप में बंद कैदियों की एक टीम के बारे में थी, जो जर्मन सेना की टीम को फुटबॉल मैच में हरा देती है. इसके बदले में टीम को आज़ादी मिलती है.

विक्ट्री से पहले इस कहानी पर एक हंगेरियन फिल्म 1962 में भी बन चुकी थी. ‘विक्ट्री’ में फुटबॉल लेजेंड पेले और फेमस इंग्लिश फुटबॉलर बॉब मूर के साथ 15 अंतराष्ट्रीय खिलाड़ियों ने भी ऐक्टिंग की थी. ‘विक्ट्री’ से लगान बनने में काफी अंतर है. कह सकते हैं कि फिल्म के तौर पर लगान कहीं ज़्यादा मनोरंजक और परिपक्व है. मगर फिर भी अंतिम मैच में काफी कुछ ऐसा है जो आपको दोनों फिल्मों के बीच के बीच की समानता को दिखा देगा.

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इन सारी फिल्मों के अलावा हम है राही प्यार के, दिल है कि मानता नहीं, आतंक ही आतंक, धूम3 और मन जैसी कुछ और भी फिल्में हैं जो हॉलीवुड क्लासिक्स से कॉपी की गई हैं.

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