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ये कैसी बाल मजदूरी जो चिता की आग से घर का चूल्हा जलाती है?

जो बचपन किताबों और दोस्तों के बीच गुजरना चाहिए था वो चिता की राख के बीच गुजरने को मजबूर है.

Ankita Virmani | Published On: Jun 12, 2017 06:46 PM IST | Updated On: Jun 12, 2017 08:58 PM IST

ये कैसी बाल मजदूरी जो चिता की आग से घर का चूल्हा जलाती है?

जिंदगी का सबसे खूबसूरत अहसास बचपन होता है. जहां शोखी, मासूमियत, अल्हड़पन की अलग दुनिया होती है. जिंदगी की जिम्मेदारियों और तनावों का अहसास ही नहीं होता. बचपन की यादें ज़िंदगी की किसी भी उम्र में जुदा नहीं होती. लेकिन अगर यही यादें सिर्फ और सिर्फ जलती चिताओं के धुएं में धुंधला जाएं तो फिर वो बचपन अफसोस के अहसास में दम तोड़ देता है.

कुछ ऐसा ही हो रहा है मणिकर्णिका के मोक्षघाट पर जहां स्कूली बैग उठाने वाले मासूमों के कंधों पर चिता जलाने का भार है. ये बच्चे चिता जलाने के लिये जाने जाते हैं. जलती चिता से इनके घर का चूल्हा जल पाता है. इन बच्चों का बचपन जलती चिताओं के बीच गुजर रहा है. इनकी आंखों के सामने खिलौने नहीं होते हैं. मुर्दों के साए में बीतता इनका बचपन सुलगता सवाल है उस मिशन पर, जिसे बचपन बचाओ कहते हैं.

मणिकर्णिका पर शव जलाते बच्चे

हजारों साल पुराने शहर बनारस में ये मणिकर्णिका के घाट पर जलती चिताओं को बच्चों के हाथों आग देने की रवायत सी चल रही है. बचपन की मस्ती को भूल चंद पैसों के लिये ये बच्चे घाट पर आने वाले शवों का इंतजार करते हैं. श्मशान घाट में सिमटे बच्चों को नहीं मालूम कि स्कूल क्या होता है और पढ़ाई क्या होती है क्योंकि अगर पढ़ेंगे तो चार पैसे कैसे अपने घर के लिये कमा सकेंगे?

इन बच्चों के साथ एक दूसरा अभिशाप ये जुड़ा है कि इन्हें लोग छुआछूत की नजर से देखते हैं. स्कूल में इनको डोम कहकर अपमानित किया जाता है. डोम होने की वजह से इनसे इस उम्र में भी दूसरे बच्चे दूरियां रखते हैं. इस बचपन में न स्कूल है और न ही दोस्त. मणिकर्णिका घाट पर मोक्ष की प्राप्ति कराने वाले ये बच्चे जिंदा लोगों के लये अछूत हैं.

7 साल का समीर इन्हीं बच्चों में से एक है. छोटी सी उम्र में पिता को खोने के बाद अपने और मां के लिए रोटी कमाने का जिम्मा उसके मासूम कंधों पर है. समीर कहता है, मैं पढ़ना चाहता हूं पर पढ़ नहीं पाता, पापा नहीं है, मम्मी कहां से पैसा देगी? समीर के कोई दोस्त नहीं हैं, वो कहता है बाहर सब उसे डोम डोम कहकर बुलाते हैं. पैसे कमाने के लिए उसे ये करना पड़ता हैं.

जल रहे बचपन का जिम्मेदार कौन?

सवाल ये है कि चिताओं के साथ जलते इस बचपन की जवाबदेही किसकी है?

सरकार की, कानून की?

तो अगला सवाल ये कि कौन से कानून की? हाल ही में पास हुआ बाल श्रम (निषेध और नियमन) संशोधन अधिनियम 2016,14 साल तक के बच्चों को पारिवारिक व्यवसाय में हाथ बंटाने की इजाजत देता है.

बाल श्रम कानून में इस व्यवसाय का जिक्र ना तो पारिवारिक व्यवसायों में है ना ही हजार्ड्स यानी खतरनाक व्यवसायों में. मौजूदा कानून के हिसाब से हजार्ड्स व्यवसायों की परिभाषा इतनी कमजोर है कि इसे उसमे जगह मिलना भी मुश्किल है.

क्या पारिवारिक व्यवसायों का नाम देकर इसे बाल मजदूरी से दूर रखा जा सकता है? क्या शारीरिक स्वास्थ्य से ज्यादा ये इन बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य का सवाल नहीं है? क्या रिवाजों और अनुष्ठानों जैसे नाम देकर इस बाल मजूदरी पर पर्दा डाला जा सकता है?

बाल अधिकारों का क्या?

क्या बाल अधिकारों पर इन मासूमों का कोई अधिकार नहीं?

जो बचपन किताबों और दोस्तों के बीच गुजरना चाहिए था वो चिता की राख के बीच गुजरने को इसलिए मजबूर है क्योंकि हमारे पास इन्हें बचाने के लिए कोई कानून नहीं.

बाल अधिकारों के लिए काम कर रही संस्था 'चाइल्ड राइट्स एंड यू' ने इन बच्चों को स्कूल भेजने का जिम्मा भी उठाया. पर कुछ परिवार ऐसे हैं जिनके घरों में कमाने वाला और कोई भी नहीं. जो बच्चे स्कूल गए भी उन्हें सामजिक भेदभाव का सामना करना पड़ा.

आंकड़े हैं गवाह

मणिकर्णिका घाट में डोम के कुल 39 परिवार हैं तो वहीं मल्लाह के 5 और दलितों के 46 परिवार हैं. यहां 6 साल से 14 साल के कुल 95 बच्चे हैं जिनमें 49 लड़के और 46 लड़कियां हैं. वहीं कुल 23 बच्चे स्कूल नहीं जाते हैं. जिनमें 13 लड़के और 10 लड़कियां हैं. जबकि 14 से 18 साल की उम्र के कुल 62 बच्चे हैं जिनमें 36 लड़के और 26 लड़कियां हैं. इस उम्र के 43 लड़के-लड़कियां स्कूल से बाहर हैं क्योंकि उनके परिवार की माली हालात बच्चों को पढ़ाने लायक नहीं है.

ये आंकड़े सरकार के लिये कागजी हो सकते हैं लेकिन इन बच्चों के लिये तकदीर के स्याह अंधेरे के समान हैं जोकि पढ़ना चाहते हैं लेकिन उनके कंधों पर स्कूल बैग की बजाए शवों का बोझ होता है.

ये कैसी बाल मजदूरी है जो चिता की आग से घर का चूल्हा जलाती है? मोक्षनगरी बनारस का ये दूसरा चेहरा उन तमाम बाल अधिकारों की चिता जला रहा है, जिसपर बड़े-बड़े कानून बन चुके हैं.

बनारस के श्मशान घाट पर हर दिन जलती सैकड़ों चिताओं के बीच एक बचपन भी रोज जलता है. जरूरत है उस पानी की जो बुझे हुए बचपन के फिर से जिंदा कर सके और इन बच्चों को नए सिरे से जीना सिखाए. इन्हें इनके अधिकारों से वंचित न किया जाए क्योंकि गया हुआ बचपन दोबारा नहीं लौटता और इन बच्चों की यादों में सिर्फ और सिर्फ श्मशान से जुड़ी बातें हैं.

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