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‘पोर्न देखने वाली महिलाएं बहस से बाहर कर दी गई हैं’

'डीप डाइव्स’ एक अवॉर्ड विनिंग डिजिटल मंच है जो सेक्सिंग द इंटरवेब्स का दूसरा सीजन ले कर आए हैं.

Rohini Nair | Published On: Mar 12, 2017 08:19 AM IST | Updated On: Mar 12, 2017 08:19 AM IST

‘पोर्न देखने वाली महिलाएं बहस से बाहर कर दी गई हैं’

आज की दुनिया में सेक्स, जेंडर और टेक्नोलोजी का संगम किस तरह होता है? ऋचा पड़ते कौल की दिलचस्पी इस सवाल को टटोलने में है. वह ‘डीप डाइव्स’ की मैनेजिंग डायरेक्टर हैं, जो एक अवॉर्ड विनिंग डिजिटल मंच है. यहां आपको विस्तृत लेख, निजी किस्से कहानियां, कलाकृतियां, कविताएं और फिक्शन सब कुछ मिलता है.

डीप डाइव्स के पहले कलेक्शन का नाम था ‘सेक्सिंग द इंटरवेब्स’ जो 2015 में पेश किया गया था. अब ऋचा और उनकी टीम सेक्सिंग द इंटरवेब्स का दूसरा सीजन ले कर आए हैं. पेश हैं उनके साथ हुई बातचीत के प्रमुख अंश:

ऋचा, हमें यह बताइए कि डीप डाइव्स की शुरुआत कैसे हुई थी. सेक्सिंग द इंटरवेब्स के सीजन 1 का ख्याल कहां से आया और अब इसका सीजन 2 लाने के लिए आपको किस बात ने प्रेरित किया?

डीप डाइव्स की शुरुआत 2015 में बिशाखा दत्ता और मेरे बीच एक बिंदास बातचीत से हुई. बिशाखा मुंबई में महिलाओं के लिए एक गैर सरकारी संस्था पॉइंट ऑफ व्यू चलाती हैं (दरअसल वहीं पहली बार मैंने नौकरी की). उनके पास कुछ फंडिंग थी. मैं भी अपनी जिंदगी के उस मोड़ पर थी जहां मैं गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रही थी और मेरे पास कुछ भी नया करने को नहीं था. और मेरे ख्याल से, इसीलिए हम दोनों इस चीज को शुरू करने के लिए इतने उत्साहित थे. हम दोनों लेखिकाएं हैं और हमें विस्तार से लिखना बहुत पसंद है. मुझे लगता है कि एक तरह से, यहीं से डीप डाइव्स की शुरुआत हुई. सेक्सिंग द इंटरवेब्स ही लिखने का वह तरीका है जो हमें पढ़ना पसंद है- ऐसे विषयों के बारे में, जो हमारे लिए बहुत अहम हैं.

जेंडर, सेक्सुएलिटी और टेक्नोलोजी- इन सभी का संगम है सेक्सिंग द इंटरवेब्स, जो अपने फीचर लेखन और कलाकृतियों से इसे अभिव्यक्त करता है. इन तीनों चीजों में क्यों आपकी खास तौर से दिलचस्पी है? आपकी वेबसाइट पर बहुत सारा निजी लेखन इन्हीं विषयों के बारे में है.

इसे देखने के बहुत सारे तरीके हैं, लेकिन एक आसान तरीका है. टेक्नोलोजी लगातार हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बनती जा रही है. मैं सिर्फ आईफोन7 वाले अमीर लोगों के बारे में बात नहीं कर रही हूं बल्कि मैं नोकिया के बेसिक फोन, या फेसबुक या सीसीटीवी निगरानी की भी बात कर रही हूं. अब दुनिया को जानने समझने और आपस में एक दूसरे को बात करने के लिए डिजिटल टेक्नोलोजी हमारे लिए जरिया बन रही है.

साथ ही साथ, बहुत ज्यादा जेंडर यानी लैंगिक असमानता है, और सिर्फ भारत में नहीं, बल्कि सभी जगह. इसी का नतीजा है कि महिलाओं को टेक्नोलोजी के बारे में होने वाली चर्चाओं से अलग किया जा रहा है (बाकी अन्य असमानताओं की तरह, यहां भी महिलाओं को जितना ज्यादा हाशिए पर रखा जाएगा, वे उतनी ही उस छोटे खोपचे दूर होती जाएंगी, ये चर्चाएं हो रही हैं). सेक्सिट होने और दूसरी तरह की असमानताओं को अंजाम देने की बात एक तरफ, इससे एक ऐसा माहौल तैयार होगा जहां टेक्नोलोजी के बारे में महिलाओं की तरफ से कोई और फैसले ले रहा होगा, और फिर कहा यह जाएगा कि ऐसा महिलाओं के संरक्षण के लिए किया जा रहा है. और अकसर जिस चीज से महिलाओं को ‘बचाया’ जाता है, वह है यौन खतरा, जिसने डिजिटल टेक्नोलोजी आने के बाद नए हिंसक रूप अख्तियार कर लिए हैं.

मेरी दिलचस्पी सबसे ज्यादा इस बात में है कि महिलाओं से कोई पूछ ही नहीं रहा है कि असल में उन्हें कैसा महसूस होता है. मेरा मतलब, यह बात तो हम पक्के तौर पर जानते हैं कि भारतीय महिलाएं टेक्नोलोजी के जरिए यौन विषयों की खोजबीन कर रही हैं जिनमें पोर्न, डेटिंग, सेक्सटिंग और सेल्फी शामिल है. यह बात भी हमें पता है कि टेक्नोलोजी सभी को समान रूप से उपलब्ध नहीं है और न ही इसके साथ उनके अनुभव एक जैसे हैं. महिलाओं को लगातार ट्विटर पर लैंगिक दुर्व्यवहार झेलना पड़ता है. इसलिए नए डिजिटल इंडिया में जरूरी है कि जेंडर, सेक्स और टेक्नोलोजी के बारे में महिलाओं के अनुभवों को मंच देने की एक गंभीर कोशिश की जाए.

उम्मीद है कि इससे आपको अपने इस सवाल का जवाब मिल गया होगा कि हम इन चीजों पर क्यों काम कर रहे हैं. क्योंकि यह करने की जरूरत है.

 

सेक्सिंग द इंटरवेब्स का स्क्रीनशॉट

सेक्सिंग द इंटरवेब्स का स्क्रीनशॉट

जेंडर और सेक्सुएलिटी पर टेक्नोलोजी का कैसे असर हो रहा है (और टेक्नोलोजी पर जेंडर और सेक्सुएलिटी का क्या असर हो रहा है)?

मुझे लगता है कि दोनों एक दूसरे पर असर डालते हैं. एक तरफ टेक्नोलोजी सेक्सुएलिटी के नए आयामों को आकार दे रही है. इसके साथ ही महिलाओं समेत यौन रूप से हाशिए पर धकेले गए समूहों को अपनी इच्छाओं और एकजुटताओं को दिखाऩे और उन्हें तलाशने का मौका मिल रहा है.

दूसरी तरफ, लैंगिक समानता के लिए किए गए प्रयास टेक्नोलोजी के भविष्य को आकार दे सकते हैं. मुझे लगता है कि टेक्नोलोजी जिस तरह से हमारी जिंदगी के हर पहलू में दाखिल हो रही है, उसे देखते हुए डिजिटल अधिकार भी अन्य मानवाधिकारों में शामिल हो गए हैं. हमारी जिंदगी और टेक्नोलोजी के तालमेल पर बात करने के लिए अगर हमारे पास पर्याप्त संख्या में विविध आवाजें होंगी तो उम्मीद है कि हम इस तरह के ज्यादा सवाल पूछ पाएंगे- सीसीटीवी कैमरा से महिलाएं सुरक्षित महसूस करती हैं या असुरक्षित? या फिर, सोशल मीडिया जिस तरह से आम करता है, क्या वह महिला और पुरुष को बराबर मानता है?

और जहां तक टेक्नोलोजी पर सेक्स के असर की बात है तो मैं कहूंगी कि पैचन बार्स की लिखी किताब ‘द इरॉटिक इंजन’ पढ़िए. यह किताब पूरा इतिहास बताती है कि किस तरह पोर्न की चाहत ने बरसों से सभी तरह की कम्युनिकेशन टेक्नोलोजी को मजबूत बनाया है.

आपको क्यों लगता है कि डीप डाइव्स जैसे मंच की जरूरत है – या फिर ऐसा क्या है जो इससे संभव हु है? 

जैसा कि मैंने पहले भी कहा, महिलाओं को टेक्नोलोजी के बारे में होने वाली चर्चाओं और बहसों से बाहर रखा गया है. इसका सबसे बढ़िया उदाहरण है पोर्न पर प्रस्तावित बैन. इस पर मैं कई बरसों से नजर बनाए हुए हूं. इसके पीछे विचार यह है कि हम भारत की उन महिलाओं को बचाना चाहते हैं जिन पर ‘खतरा मंडरा रहा है’. (ठीक यही शब्द सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में कहे गए हैं), लेकिन उन बहुत सारी महिलाओं का क्या, जो पोर्न देखती हैं? हम में से बहुत सी देखती हैं, लेकिन हमें पोर्न बैन पर होने वाली चर्चाओं से बाहर रखा गया. संक्षेप में कहूं, तो डीप डाइव्स (और फिलहाल सेक्सिंग द इंटरवेब्स) का मकसद महिलाओं और ट्रांस लोगों को उन बातचीतों के मोर्चे पर लाना है जिनसे अब तक उन्हें दूर रखा गया है. लेकिन बहस को एक ही तरीके से जारी रखने की बजाय हम इसके तरीके बदलना चाहते हैं. डीप डाइव्स का मतलब है सलीके से कहानी कहना और उसे दमदार कलाकृतियों के साथ पेश करना है. साथ ही यहां ऐसी भाषा इस्तेमाल की जाती है जिससे असली लोग अपने आपको जोड़ पाते हैं. यह याचिका दाखिल करने वालों की भाषा नहीं है. हम कहानी को इस तरह कहने के लिए जगह तैयार कर रहे हैं जिसे पढ़कर लगे कि आप कोई अनुभव पढ़ रहे हैं: अस्त व्यस्त, पसीने से तरबतर, सेक्सी. 

इस वेबसाइट पर स्टोरी डालते समय, आपके लिए एक संपादक (और एक लेखक) के नाते सबसे दिलचस्प क्या होता है? क्या आप इस बारे में थोड़ा विस्तार से बात कर सकती हैं कि आपको क्यों वे जरूरी लगती हैं और उनके कारण कौन सा नया संवाद या चर्चा शुरू हुई. साथ ही, इस दौरान क्या आपको कुछ ऐसा विचित्र पता चला जो आप पहले से नहीं जानती थीं? मिसाल के तौर पर ए ट्विस्ट इन ए स्ट्रैट लाइन को प्रकाशित करते वक्त?

ईमानदारी से बताऊं तो इनमें से हर कहानी पर काम करके मुझे बहुत अच्छा लगा, क्योंकि इन सबने मुझे कुछ ऐसा सिखाया है जो मैं पहले नहीं जानती थी. मुझे लगता है कि विस्तार और गहराई के साथ कहानी कहने की यही खूबी है: जैसे आप थोड़ा सा कुरदते हैं तो आपको बयान या बयानों के अंश नहीं, बल्कि पूरे इंसान नजर आते हैं. खुद ब खुद आपको नई चीजें पता लगने लगती हैं- क्योंकि हर किसी का अनुभव अलग होता है.

लेकिन चूंकि आपने पूछा है तो मैं कहूंगी कि दो चीजें मुझे बहुत दिलचस्प लगीं. पिछले महीने हमने नेहा दीक्षित का एक निबंध छापा जिसमें एक महिला के ‘रिवेंज’ पोर्न के अनुभव का जिक्र था. मैं लंबे समय से लोगों को यह कहानी बतानी चाहती थी, क्योंकि इस तरह के मामलों में पीड़िता को ही खूब बुरा भला कहा जाता है. सहमति का उल्लंघन किए जाने पर उसी से सवाल किए जाते हैं (तुमने उसे इस तरह के फोटो क्यों लेने दिए, वगैरह वगैरह). ऐसे मामलों में महिला सामने आकर अपनी बात कहने में सुरक्षित महसूस नहीं करती.

भारत में इस तरह के सभी मामलों की रिपोर्टें बड़े विवाद और शर्म के इर्द गिर्द घूमती हैं. अपराध का शिकार बनी पीड़िता की कोई नहीं सुनता. मेरे ख्याल से नेहा ने जबरदस्त काम किया है और वह पीड़िता की बताई गई कहानी पर टिकी रही हैं.

एक और कविता मुझे याद आती है. प्रियंका अलिका एलियास की यह कविता पहले सीजन का हिस्सा थी. मैं इसके ज्यादा विस्तार में नहीं जाती हूं लेकिन इसका नाम ‘टेक्स्ट’ था और यह जबरदस्त थी. ईमानदारी से कहूं, मैंने उसमें एक शब्द भी नहीं कांटा छांटा. क्योंकि वह थी ही इतनी खूबसूरत.

ऐसी और कौन सी कहानियां हैं जिन्हें आप डीप डाइव्स या अपने निजी लेखन में जगह देने वाली हैं? क्या कुछ ऐसे सवाल हैं जिनकी पड़ताल आप करना चाहती हैं? 

भविष्य के प्रोजेक्ट्स अभी प्लानिंग की स्टेज पर ही हैं, लेकिन इतना तो मैं बता ही सकती हूं कि हम सेक्सुएलिटी के मुद्दे पर और गहराई में उतरेंगे. हाल के वर्षों में बिशाखा ने यौन कर्मियों पर बहुत सारा काम किया है, तो यही वह धागा है जिसे पकड़कर हम आगे चलेंगे. हमारी युवा महिलाओं से जुड़े विषयों में भी दिलचस्पी है कि मसलन एक किशोर लड़की के लिए सेक्सुएलिटी के क्या मायने हैं.

जहां तक मेरी बात है तो मैं पोर्न के लिए अपनी चाहत के पीछे पीछे चलती रहूंगी, जब तक कि यह एक किताब की शक्ल में सामने न आ जाए या मेरा लैपटॉप गर्म होकर बंद न होने लगे. अभी कहना मुश्किल है कि रुख किधर होगा.

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