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आखिर क्यों महाराणा प्रताप और दूसरे राजपूत योद्धा हार जाते थे सभी युद्ध?

महाराणा प्रताप के जन्मदिन के दिन उन कारणों को भी तलाशना होगा जिन वजहों से राजपूत वीरता और पराक्रम के बावजूद हारते रहे

Animesh Mukharjee | Published On: May 09, 2017 08:02 AM IST | Updated On: May 09, 2017 08:02 AM IST

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आखिर क्यों महाराणा प्रताप और दूसरे राजपूत योद्धा हार जाते थे सभी युद्ध?

अगर जनवरी के महीने में कोई दिल्ली के किसी खुले मैदान में धोती और कुर्ता पहन कर पहुंच जाए वो भी तब...जब एक दिन पहले अच्छी खासी बरसात हुई हो..ओले गिरे हों तो उसे क्या कहेंगे?

आपके दिमाग में जो भी शब्द आया हो उसे ज़ुबां पर लाने से पहले थोड़ा संभल जाइए क्योंकि 14 जनवरी 1761 को ऐसा ही कुछ मराठाओं ने पानीपत की आखिरी जंग में किया था.

इस युद्ध में लड़ने वाले अफगान सिपाही गरम कपड़े और जिरह बख्तर पहने थे. हर अफगान के सिपाही के पास चमड़े के थैले में भुना गोश्त और पानी भी था.

afgan and maratha soldier

वहीं मराठा सिपाही छोटी कटार और चमड़ा मढ़ी लकड़ी की ढाल लेकर लड़ने पहुंचे थे. इस हार ने तीन घंटे में पूरे मराठा साम्राज्य को खत्म कर दिया था. सुनने में बुरा लगता है पर भारत के ज्यादातर राजपूत और दूसरे राजा अपनी वीरता की तमाम कहानियों के बाद भी इतिहास में हारते ही आए हैं.

चारणों ने कविताओं में इनकी हार को वीरगति और त्याग कह कर चाहे जितना ग्लोरिफाई किया हो हारने का मतलब जीतने वाले से कमतर होना ही है.

दिखावा करना हमेशा एकता से ऊपर रहा

राणा अमर सिंह की सेना में दो जातियां थीं चूड़ावत और शक्तावत. कहानी सुनाई जाती है कि एक बार राणा ने घोषणा की कि जिस बिरादरी के सैनिक उंटाला के किले में सबसे पहले घुस कर कब्जा कर लेंगे उन्हें महाराणा की सेना में सबसे आगे चलने का मौका मिलेगा.

चूड़ावतों के पास हाथी थे और शक्तावतों के पास सीढ़ियां और रस्सियां. चूड़ावत सरदारों ने जब किले के दरवाजे पर लगी कीलों को देखा तो बल्लू शक्तावत नाम के सरदार ने खुद को किले के दरवाजे के सामने कर दिया. हाथी ने बल्लू को टक्कर मारी और कीलों से बचते हुए दरवाजा तोड़ दिया.

प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रतीकात्मक तस्वीर

दूसरी तरफ चूड़ावतों की तरफ से जैत सिंह नाम के सरदार ने साथी सैनिक से अपना सिर कटवा कर किले की दीवार के पार फिंकवा दिया. जब शक्तावत अंदर घुसे तो उन्हें शक्तावत सरदार का कटा सिर पहले से पड़ा मिला.

इस कहानी को कितना भी ग्लोरिफाई करके सुनाया जाए मगर वास्तविकता ये है कि मुगलों के बिना कुछ किए ही राजपूतों के दो बहादुर सरदार कम हो गए.

जिस सेना के सरदारों में आपस में इतनी कटुता हो कि वो एक दूसरे से आगे निकलने की होड़ में अपनी जान दे दें...वो भला कैसे एक साथ एक योजना बनाकर दुश्मनों से लड़ते.

इसी कहानी की बात करें तो एक ही सेना के दो हिस्सों के पास आधे-आधे संसाधन हैं जिन्हें वो एक आपस में बांटना नहीं चाहते थे. किले को जीतना भी यहां ऐसा लगता है कि ट्रेन में सीट छेंकने का प्रयास हो.

ऐसा ही कुछ पानीपत की लड़ाई में भी हुआ था. जब सारे सरदारों ने मिलकर घेरा बनाने की बजाए अलग-अलग हमला कर दिया था. हालांकि, मराठा इस युद्ध में शिवाजी के समय की लड़ाई की शैली को भूल बाकी राजपूतों की तरह युद्ध करने की कोशिश कर रहे थे.

हथियार मारक क्षमता से ज्यादा प्रदर्शन के काम के थे

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विकीपीडिया से साभार (प्रतीकात्मक तस्वीर)

मंगोल धनुष करीब चार फुट का होता था, जिसे घोड़े के ऊपर बैठकर चलाना बड़ा आसान था. इसकी मारक क्षमता इतनी थी कि बख्तरबंद, ढाल वगैरह को भेद कर शरीर के अंदर तक घुस जाए. वहीं मध्यकाल आते-आते राजपूत धनुष को मुख्य हथियार के तौर पर इस्तेमाल बहुत कम कर चुके थे.

उन्होंने हल्दीघाटी जैसी राजस्थान की लड़ाइयों में भी कभी ऊंटों का इस्तेमाल नहीं किया. अबुल फजल ने लिखा है कि अकबर की तरफ से आया ऊंटों का रिसाला जंग के मैदान में आंधी की तरह कहर मचा रहा था.

हिंदुस्तान में भारी हथियार बेहतर है की अवधारणा हमेशा से रही है. राजपूतों की कड़क बिजली जैसी एक तोप को खींचने में 20-20 बैल लग जाते थे जबकि अब्दाली और बाबर जैसों के पास ऐसी तोप मौजूद थीं कि एक ऊंट पर 2 तोप तक लादी जा सकती थीं.

हल्दीघाटी के मैदान तक तक ये तोपें खराब रास्ते के चलते आ ही नहीं पाई थीं. ये बात सर्व प्रामाणिक है कि हथियार की तेजी उसके वजन से ज्यादा खतरनाक होती है.

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ज्यादातर भारतीय सेनानायक अपने आप को बेहतर दिखाने के लिए सामान्य सैनिकों से भारी और बड़े हथियार इस्तेमाल करने लगते थे. इसके चलते उनका प्रदर्शन कितना सुधरा पता नहीं मगर लगातार युद्धों में उनका हारना ऐसे हथियारों के औचित्य पर सवाल खड़े करता है.

हथियारों के वजन की बात चली ही है तो आपने महाराणा प्रताप के 80 किलो के भाले और 35 किलो की तलवार की बात सोशल मीडिया पर पढ़ी होगी.

राजपूतों की तलवार ‘खांडे’ को दुनिया के सबसे घातक काटने वाले हथियारों में से एक माना जाता है. एक औसत खांडे का वजन 1.5 किलो के आस-पास होता है. अगर इतिहास से जुड़े जानकारों की मानें तो महाराणा प्रताप की तलवार 35 नहीं 2-3 किलो की रही होगी. जो उन्हें किसी भी आम योद्धा से कम से कम दो गुना ताकतवर बनाती है.

एक बात जान लीजिए कि दुनिया भर के विशेषज्ञ 10-15 किलो की नुमाइशी तलवार को सबसे भारी हथियार मानते हैं. राणा प्रताप के हथियार उदयपुर संग्रहालय में उपलब्ध हैं. अगर वो वास्तव में उतने ही भारी हैं जितना कहावतों में बताए जाए हैं तो सरकार को भारत के इतिहास की इस उपलब्धि का रिकॉर्ड गिनीज बुक में दर्ज करवाना चाहिए.

अफीम की लत और घिसे-पिटे तरीके

राजस्थान में अफीम चखने का रिवाज लंबे समय से रहा है. मध्यकाल में युद्ध में जाने से पहले योद्धा इतनी ज्यादा मात्रा में अफीम चख लेते थे कि मरने-मारने के अलावा कोई रणनीति याद ही नहीं रख पाते थे.

हिंदुस्तानी सेनानायकों का युद्ध करने का तरीका 20-20 क्रिकेट मैच खेलने जैसा था. वो मैदान में उतरने के बाद पारी खत्म करके ही बाहर आने में विश्वास रखते थे. वहीं दूसरे आक्रमणकारी अपनी सेना का बड़ा हिस्सा रिजर्व रखते थे.

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विकीपीडिया से साभार

जब युद्ध का अच्छा खासा समय निकल जाता तो ये ताजादम सैनिक हमला करते और खेल पलट देते. ऐसे युद्धों की इतिहास में कमी नहीं है जहां इस नीति के कारण भारतीय जीता हुआ युद्ध हार गए.

महाराणा प्रताप ने भी हल्दीघाटी में उसी तरकीब का इस्तेमाल किया जिसके चलते उनके दादा खानवा का युद्ध हार गए थे.

संकरी सी हल्दीघाटी में 2 दिन अकबर की सेना का इंतजार करने के बाद उनकी सेना तीसरे दिन बाहर खमनौर के मैदान में लड़ने निकल आई. पहले से तैयार बैठे मानसिंह के सैनिकों ने जमकर मारकाट मचाई. खुद महाराणा प्रताप की जान बचना मुश्किल लगने लगा.

तब सरदार झाला ने महाराणा का मुकुट खुद पहन कर मुगल सैनिकों को बेवकूफ बनाया. महाराणा को जैसे-तैसे जंग के मैदान से बाहर निकाला गया और झाला शहीद हो गए.

औरतें और पारिवारिक कलह

राजपूत राजाओं का अपनी महारानियों के प्रति जरूरत से ज्यादा प्रेम भी राजपूतों के आपस में ही भिड़ जाने का एक कारण बना.

महाराणा उदय सिंह की 22 रानियां 56 लड़के और 22 लड़कियां थीं. उनके लड़के प्रताप को गद्दी पाने के लिए अपने भाई जगमल से लड़ना पड़ा था.

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उदय सिंह (विकीपीडिया से साभार)

प्रताप बगावत के बाद ही महाराणा बन पाए थे. प्रताप के भाइयों जगमल, शक्ति सिंह आदि ने अकबर के दरबार में नौकरी कर ली थी. वहीं प्रताप की मृत्यु के बाद उनके वारिस अमर सिंह ने भी मुगलों से संधि कर ली थी और प्रताप का छोटा बेटा भीम सिंह जहांगीर का खिदमतगार बन गया था.

बाद के समय कई राजा अपनी प्रेमिकाओं, रखैलों, नाचने गाने वालियों को लड़ाई में साथ ले जाते थे. पानीपत के युद्ध में मराठों ने भी यही किया था. युद्ध खत्म होने के बाद अफगान सैनिकों ने 14 साल से ऊपर के हर मराठा लड़के का सिर काट दिया था.

कई औरतों ने अफगानों से बचने के लिए अपनी जान दे दी. जो बच गईं उनके साथ क्या सुलूक हुआ होगा0 बताने की जरूरत नहीं.

कुल मिलाकर बात इतनी है कि हर पक्ष इतिहास को एक खास चश्मे से देखता है. ऐतिहासिक चरित्रों के नाम पर राजनीति करने वाले उनको महामानव का दर्जा देकर उनके सही गलत होने की बहस को ही खत्म कर देना चाहते हैं. जबकि जरूरत अपने पुराने समय में की गई गलतियों से सीखने और सुधार करने की है.

(स्रोत: एससी मित्तल आधुनिक इतिहास, हिस्टरी.कॉम, डेडलिएस्ट वॉरियर्स, स्क्रॉलडॉट इन, विकीपीडिया )

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