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नन्हें-मुन्ने तेरी मुट्ठी में है तकदीर देश की

बाल दिवस से बच्चों के जीवन में रंग भरने की करें शुरुआत

Pratima Sharma Pratima Sharma | Published On: Nov 14, 2016 02:05 PM IST | Updated On: Nov 14, 2016 02:23 PM IST

नन्हें-मुन्ने तेरी मुट्ठी में है तकदीर देश की

इस पुराने गाने के बोल में एक छोटा सा बदलाव किया गया है. असल में देखा जाए तो इस गाने के बदले मायने ही आने वाले कल की सही तस्वीर पेश करते हैं. इसमें कोई शक नहीं है कि ये बच्चे ही हमारे आने वाले कल हैं.

हम अपने बच्चों को सुनहरा कल देना चाहते हैं. लेकिन उन्हें कल के लिए तैयार करने के लिए हम क्या कर रहे हैं, इस पर कोई बातचीत नहीं होती.

इस बार कुछ खास करें

बाल दिवस का मौका, यह बात करने के लिए सबसे ज्यादा मुफीद है. क्योंकि यही वो दिन है, जब बच्चों की बातें की जाती हैं. शायद कहीं-कहीं उनकी सुनी भी जाती है. हम बात-बात पर युवाओं के जोश की बात करते हैं. बुजुर्गों के अनुभवों का जिक्र करना भी नहीं भूलते. लेकिन बच्चों की बात खेल-खेल में ही उड़ा दिया जाता है. बच्चा जानकर उनकी बातें हंसी में उड़ा दी जाती है. यही बच्चे 20-25 साल बाद डॉक्टर, वकील, बिजनेसमैन, इंजीनियर या नेता बनकर हमारा बुढ़ापा आसान बना सकते हैं.

Artist and Muralist Rouble Nagi during an art camp for the underpriviled children, in Mumbai, India on October 28, 2016. (Nitin Lawate/ SOLARIS IMAGES) SOLARIS IMAGES

हमें आने वाला कल कैसा चाहिए, यह इस बात पर निर्भर करता है कि हम कल के लिए बच्चों को कैसे तैयार कर रहे हैं. वैलेंटाइन डे, रोज डे, चॉकलेट डे..हर दिन के लिए बाजार तैयार है, मीडिया तैयार है. गहमागहमी भरपूर होती है. कुछ इसके विरोध में होते हैं, कुछ पक्ष में. कुछ सामाजिक संस्थाएं भी इन मामलों में झंडा बुलंद कर लेती हैं. यानि इन दिनों को पूरी अहमियत दी जाती है. इसमें सिर्फ बाल दिवस ही पीछे छूट जाता है.

बच्चों को खिलने का मौका दें

बाल दिवस पर कोई जोश मां-बाप, टीचरों में क्यों नजर नहीं आता है? बच्चों के मन में क्या चल रहा है, इस बारे में सोचने का वक्त किसी के पास क्यों नहीं होता है? बच्चों पर अपनी मनमर्जी थोपकर उनके बचपन को कुचलना हर हाल में बंद होना चाहिए.

बच्चों की रचनात्मकता और क्षमता, युवाओं और बुजुर्गों से कहीं ज्यादा बेहतर होती है. बच्चों के जरिए अपने सपने पूरे करने वाले अभिभावकों को भी पहले बच्चों की सुननी चाहिए. अगर हम अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए सोचेंगे तो ही हमारा कल बेहतर होगा.

बाल दिवस का ये दिन हर साल आता और चला जाता है. हमें कोशिश करनी चाहिए कि बदलते वक्त के साथ यह दिन सिर्फ कैलेंडर की तारीख बनकर न रह जाए. हम बच्चों को एक नई शुरुआत दें, उन्हे राह दिखाएं, उन्हें जगमगाने का मौका दें.

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