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वर्ल्ड टॉयलेट डे: क्योंकि स्वच्छता हमारी जिम्मेदारी है

विश्वभर में स्वच्छता को लेकर जागरूकता फैलाने की एक विश्वव्यापी कोशिश जारी है.

FP Staff Updated On: Nov 19, 2016 02:13 PM IST

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वर्ल्ड टॉयलेट डे: क्योंकि स्वच्छता हमारी जिम्मेदारी है

आज वर्ल्ड टॉयलेट डे है. ये दिन आज इसलिए ज्यादा प्रासंगिक है क्योंकि पिछले कुछ सालों में स्वच्छता की जरूरत ने एक अभियान की शक्ल अख्तियार कर ली है. भारत में तो खासकर इसकी ज्यादा जरूरत है क्योंकि एक बड़ी आबादी एक स्वच्छ भारत के हिस्से से महरूम है.

विश्वभर में स्वच्छता को लेकर जागरूकता फैलाने की एक विश्वव्यापी कोशिश जारी है. पहली बार 2013 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 19 नवंबर को वर्ल्ड टॉयलेट डे के तौर पर मनाने की घोषणा की थी. इसका उद्देश्य 2030 तक हर परिवार के लिए एक शौचालय उपलब्ध कराना और हाइजीन को लेकर उन्हें ज्यादा सजग बनाना है.

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आज तकरीबन 2.4 बिलियन की आबादी सफाई के अभाव, खुले में शौच करने जैसी स्थितियों में जिंदगी गुजारने को मजबूर है.

भारत की स्थिति भी इस मामले में बदतर ही कही जाएगी. भारत में सेफ वॉटर एंड सैनिटेशन के क्षेत्र में काम कर रही यूके की एक चैरिटी संस्था ने एक रिपोर्ट में कहा है कि भारत के बड़े शहरों में तकरीबन 157 लाख की आबादी हाइजीन के अभाव में झुग्गी-बस्तियों में रहती है और इनमें से तकरीबन 41 लाख लोग खुले में शौच करने को मजबूर हैं.

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इस बार टॉयलेट डे से एक दिन पहले रिलीज हुई ‘ओवरफ्लोइंग सिटीज- द स्टेट ऑफ द वर्ल्ड्स टॉयलेट्स 2016’ की दूसरी वार्षिक विश्लेषण रिपोर्ट में भयावह तस्वीर पेश की गई है. रिपोर्ट में बताया गया है कि,

भारत के शहरों और कस्बों से बस एक दिन में निकलने वाली गंदगी या अपशिष्ट पदार्थ एक ओलंपिक के स्विमिंग पूल को पूरा भरने लायक मात्रा में या 16 जंबो जेट में निस्तारित हुए शौच के बराबर होती है.

ये समस्या बहुत गंभीर है और इसे बुनियादी तौर पर खत्म करना भी उतना ही जटिल. ये समस्या बड़े शहरों के पूरे इंफ्रास्ट्रक्चर पर सवाल खड़े करती है. इसके लिए बिल्कुल एक बड़े कदम और प्लान की जरूरत है.

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हालांकि, भारत स्वच्छता अभियान एक राहत भरी शुरुआत है. अब लोग स्वच्छता को लेकर पहले से ज्यादा जागरूक हुए हैं. सरकार ने इस समस्या को गंभीरता से समझा है और क्षेत्र में सुधार को अपनी प्राथमिकता में रखा है.

सरकार इस अभियान को देश के हर घर तक पहुंचाना चाहती है. इसके लिए हर तरीके का सहारा लिया जा रहा है. सरकार हर माध्यम से चाहे प्रिंट हो, इलेक्ट्रॉनिक हो या डिजिटल, इस अभियान के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही है और इसका असर भी हुआ है.

गांवों में हर घर में शौचालय की जरूरत और फायदे को धीरे-धीरे ही सही, स्वीकार किया जा रहा है और साफ जल और साफ-अच्छी हाइजीनिक आदतों को बुनियादी तौर पर समझाया जा रहा है.

समस्या बड़ी है तो कोशिशें भी बड़ी होनी चाहिए और वक्त भी उतना ही लगेगा. ये बस सरकार की समस्या नहीं है और न ही बस उसकी कोशिशों की मोहताज है. हम सब भी इस समस्या और इसके समाधान में उतने ही भागीदार हैं.

हम भारतीय थोड़े ढीठ होते हैं और खासकर जब हमसे किसी कोशिश की उम्मीद की जाती है तो हमारी ये आदत हमें उतना ही नालायक बना देती है. लेकिन हमें तय करना होगा कि हम अपनी ही गंदगी से स्थिति को बदतर बनाएंगे या इस दिशा में सकारात्मक कदम उठाकर एक साफ और स्वच्छ भारत के सपने को हकीकत बनाएंगे.

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