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‘मोक्ष की नगरी’ के ठप्पे से मुक्ति चाहती है वाराणसी

किसी ने इन मुक्ति-घरों को संवारने में अपनी रुचि नहीं दिखाई.

Shantanu Guha Ray | Published On: Nov 28, 2016 07:12 PM IST | Updated On: Nov 29, 2016 04:49 PM IST

‘मोक्ष की नगरी’ के ठप्पे से मुक्ति चाहती है वाराणसी

मृत्यु, मोक्ष या मरने वालों के शहर में तौर पर वाराणसी की ख्याति, इसकी निंदा की मुख्य वजह बन गई है. लेकिन अब भारत का यह पवित्रतम शहर अपनी नई पहचान के लिए प्रयास कर रहा है.

इसके लिए जनवरी 2017 की शुरुआत से मुक्ति घरों (मुक्ति, मुमुक्षु और मोक्ष भवन) में आने वाले श्रद्धालुओं पर कड़ी निगरानी रखी जाएगी. इन घरों में अब सिर्फ उन्हें ही जगह मिलेगी जो किसी लाइलाज बीमारी से ग्रसित हैं.

गंगा आरती, दशाश्वमेध घाट

 

मोक्ष की कामना

हर साल लगभग 20,000 से अधिक बीमार श्रद्धालु मोक्ष की कामना लेकर वाराणसी में मरने आते हैं. हिंदू धर्म में ऐसा माना जाता है कि वाराणसी में मरने वाले को मुक्ति या मोक्ष मिल जाती है. यानी जन्म और मृत्यु के चक्र से मनुष्य को छुटकारा मिल जाता है. लेकिन साल दर साल यह देखा गया है कि इनमें से करीब आधे से अधिक लोगों को इन मुक्ति-घरों से अधिकारियों को निकालना पड़ता है. इनमें से कई लोग महीनों और कुछ मामलों में सालों तक जबरन अपनी मौत का इंतजार करते हुए कमरों पर कब्जा जमाए रहते हैं.

वाराणसी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लोकसभा क्षेत्र भी है. काशी लाभ मुक्ति भवन के भैरवी नाथ शुक्ला कहते हैं- ‘अब समय आ गया है कि इस तरह के मृत्यु-पर्यटन को रोका जाए.’

वे कहते हैं कि यहां इस तरह के 200 से अधिक मुक्ति-घर हैं. इनमें से कुछ कि स्थापना 1920 से पहले ही हो चुकी थी, जैसे मुमुक्षु भवन ( बीमारों के लिए घर). उनके खुद का मोक्ष भवन अस्सी घाट के पास है.

यह बहुत ही रोचक तथ्य है कि बहुत सी भारतीय और बहुराष्ट्रीय कंपनियां शहर को बदलने के लिए आगे आ रही हैं, खासकर बर्बाद होते घाटों को बचाने के लिए. लेकिन किसी ने इन मुक्ति-घरों को संवारने में अपनी रुचि नहीं दिखाई. शुक्ला कहते हैं-

‘मुक्ति-घर वैसे नहीं हैं, जैसा इनके बारे में सोच है.’

उन्होंने कहा कि इन घरों के मालिक अब ‘मृत्यु के करीब’ रोगियों को नए नजरिए से परखेंगे. पहले जिन्हें वाजिब वजहों से अस्पतालों में डॉक्टर बिस्तर नहीं देते थे वे भी इन घरों में रहने आ जाते थे. शुक्ला कहते हैं- ‘जीवन के उल्लास से भरे शहर में मौत का इंतजार करना कोई अच्छी बात नहीं.’

दशाश्वमेध घाट, वाराणसी

बिना डॉक्टर के सर्टिफिकेट के मुक्ति-घरों में जगह नहीं

वे कहते हैं कि यह नया कदम ऐसे लोगों के जत्थों को उनके और अन्य मुक्ति घरों में जाने से रोकेगा. ‘यह कहीं न कहीं शहर की पवित्रता को भी प्रभावित करता है, यह किसी के लिए अच्छी खबर नहीं है कि इतने सारे लोग मरने के लिए आ रहे हैं, खासकर तब जब आपको उस व्यक्ति के बीमारी के बारे में कुछ मालूम नहीं हो. इतने लोगों द्वारा मौत का इंतजार करना अच्छा लक्षण नहीं है.’

अभी शुक्ला अपने मुक्ति भवन में 10 कमरों की मरम्मत करवा रहे हैं और इन कमरों में सिर्फ उन्हें रखेंगे जिनकी बीमारी को डॉक्टरों ने लाइलाज बताया हो. इन कमरों की मरम्मत के बाद मृत्यु की कामना वाले लोगों के लिए कुछ 16 कमरे होंगे. यहां विधि-विधानों के लिए 24 घंटे मंदिर और पुजारी उपलब्ध हैं.

अस्सी घाट के करीब स्थित मोक्ष भवन और प्रसिद्ध दशाश्वमेध घाट के पास के दो बड़े मुक्ति घरों के अफसरों का कहना है कि ये मुक्ति-घर दान पर चलते हैं, इस वजह से सालाना खर्चों को कम करने की जरूरत है.

मोक्ष भवन के अफसर आनंद प्रधान कहते हैं-‘ कोई इस दुनिया में हमेशा के लिए नहीं आया है. और कोई मौत के वक्त को भी नहीं बता सकता. इस वजह से हम सिर्फ उन्हें उन रोगियों को ही कमरे दे रहे हैं जिनके डॉक्टरों ने जबाब दे दिया है.’

इससे पहले के नियम के अनुसार किसी व्यक्ति को एक पखवाड़े तक रहने की अनुमति दी जाती थी और यह उम्मीद की जाती थी कि वह इतने समय में मर जाएगा. यह बहुत ही अजीब नियम था. एक बार चेक इन करने बाद इन्हें एक समय दिया जाता था और इसके बाद इन्हें वापस जाने को कहा जाता था. अधिकतर मामलों में यह समय-सीमा तीन महीने तक बढ़ा दी जाती थी. इसकी वजह से इस शहर में मृत्यु की इच्छा लेकर आने वाले लोगों कि लंबी प्रतीक्षा सूची बन जाती थी.

प्रधान कहते हैं- ‘ऐसे रोगियों के परिवार वालों को जब दूसरों के लिए जगह खाली करने को कहा जाता था तो वे मना कर देते थे.’ प्रधान इस नए नियम से खुश हैं. ‘यह कोई नहीं बता सकता कि कौन कब मरेगा, डॉक्टर सिर्फ इसका अनुमान लगा सकते हैं.’

प्राचीन वाराणसी

खुशी-खुशी मौत का इंतजार 

99 साल की कलावती देवी चार महीने से मोक्ष भवन में रह रही हैं. उनके 75 साल के बेटे संग्राम सिंह कहते हैं- ‘हम हर दिन इसके मरने की प्रार्थना करते हैं लेकिन यह हर दिन जिंदा ही मिलती है. यह वाराणसी में इसीलिए मरना चाहती है क्योंकि इसके पति और भाई की मौत भी यहीं हुई थी.’

इन बीमार रोगियों के बेटे, बेटी और रिश्तेदार इन्हें वाराणसी ले आते हैं. इन्हें पता नहीं होता कि रोगी की मौत कब होगी. इंतजार की घड़ी हमेशा लंबी होती है. हालांकि इसका कोई रिकॉर्ड नहीं है लेकिन यह अनुमान लगाया जाता है कि पिछले 2 दशकों में 95 से 110 साल की उम्र वाले करीब 5 लाख लोगों ने इन मुक्ति-घरों में अपनी अंतिम सांस ली है.

वाराणसी में करीब 4 दशकों से रह रहे अंजन चक्रवर्ती कहते हैं कि इस कदम से इस पवित्र शहर में मौत की इच्छा से आने वालों की संख्या में कमी आएगी. ‘मेरा हमेशा से यह विश्वास रहा है कि वाराणसी जीवन का शहर है न कि मृत्यु का. भले ही इस शहर को चिताओं वाले घाटों और मौत का इंतजार करते बूढ़ों से जोड़ा जाता हो. मुझे उम्मीद है कि अब मृत्यु-पर्यटन में कमी आएगी.’

हालांकि चक्रवर्ती कहते हैं कि इन घरों के मालिकों को इस नियम के पालन में दिक्कत आएगी. ‘सरकार ने यह नियम नहीं बनाया है, मालिकों ने इसे पैसे कमाने के आसान रास्ते के लिए बनाया है. अब मौत के इंतजार की लंबी घड़ी ने उनके लिए मुश्किल पैदा कर दी है. यह अच्छी बात है कि अब सिर्फ लाइलाज बीमारी से ग्रसित रोगियों को ही जगह दी जाएगी.’

वाराणसी

लेकिन दिल्ली के प्रकाशक प्रमोद कपूर, जिनके लिए वाराणसी दूसरे घर की तरह है, का मानना है कि यह कदम कई लोगों के मन में दुविधा पैदा कर सकता है. ‘वाराणसी में मरना कभी भी शोक का विषय नहीं रहा है. मुझे शक है कि इस शहर में आने वाले यात्रियों ने वाराणसी को कभी भी सिर्फ मौत का इंतजार कर रहे लोगों के शहर के रूप में देखा हो. यहां के मंदिरों, घाटों और गंगा के दर्शन के लिए दशकों से लोग आ रहे हैं.

आखिर में, जबकि डॉक्टर्स भी मौत का सही वक्त नहीं बता सकते. कपूर कहते हैं- ‘हो सकता है कि सेल्फी वाली पीढ़ी इस रीति को पसंद नहीं करती है और इसमें बदलाव चाहती हो लेकिन वाराणसी में मरने की इच्छा रखने वालों से निपटना आसान नहीं होगा.’

आखिरकार, मृत्यु की इच्छा तो मृत्यु की इच्छा है.

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