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उस्ताद शाहिद परवेज: जिनके हाथों में गाने लगता है सितार

शाहिद परवेज के दादा ने पिता को कसम दी थी कि इस बच्चे को बस सितार सीखाना है

Shivendra Kumar Singh Updated On: Jun 24, 2017 11:56 AM IST

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उस्ताद शाहिद परवेज: जिनके हाथों में गाने लगता है सितार

एक जमाने की बात है. बहुत माहिर सितार वादक थे, लेकिन शास्त्रीय संगीत को छोड़कर मुंबई में फिल्मों के लिए बजाते थे. इस बात से उनके पिता ख़फा-ख़फा से रहते थे कि बेटा घराने की शास्त्रीय विरासत को भूलकर छोड़कर फिल्मों की तरफ चला गया. उस बेटे का एक बेटा हुआ. वो बेटा तीन साल का हुआ तो दादा ने पोते को गोद में लेकर सरगम की तालीम देनी शुरू कर दी. और फिर अपने बेटे को बुलाकर धमकी दे दी- इस बच्चे को अगर तुमने शास्त्रीय संगीत की तालीम नहीं दी तो तुम्हें कभी माफ नहीं करूंगा.

इस धमकी से डरकर बेटे ने फिल्म इंडस्ट्री छोड़ दी और बाकी की जिंदगी अपने बच्चे को सितार सिखाने में लगा दी. यहां तक कि इस काम के लिए मुंबई शहर तक छोड़ दिया और बेटे को लेकर गांव चले गए. वो दादा थे मशहूर सुरबहार वादक उस्ताद वहीद खां. बेटा थे मशहूर सितार वादक उस्ताद अज़ीज़ खान और बेटे का बेटा यानी पोता थे- उस्ताद शाहिद परवेज़ जिनके सितार की आज दुनिया दीवानी है.

उस्ताद शाहिद परवेज कहते हैं- ‘राग अहम नहीं है, राग तो सिर्फ एक गेट है, उसके जरिये कहां पहुंचना है- ये ज्यादा अहम है.' शाहिद परवेज का संगीत सचमुच हर बार कहीं पहुंचा देता है. जिस तरह मिश्री की डली पल भर में घुल जाती कुछ वैसा ही है उनका संगीत. वो सितार का एक तार छेड़ते हैं और पूरे माहौल में राग की कैफियत तारी हो जाती है. जो रसिक राग को शक्ल से पहचानते हैं, उन्हें तार पर पहला स्ट्रोक लगते ही एक दिलफरेब शक्ल दिखने लगती है- फिर चाहे वो बागेश्री हो या झिंझोटी, चारुकेशी हो या यमन.

शाहिद परवेज सितार वादकों के परिवार की सातवीं पीढ़ी की नुमाइंदगी करते हैं. वो इटावा घराने के सबसे चमकते सितारे हैं. इटावा घराने की खासियत ये है कि ये घराना शुरू से सितार या सुरबहार के लिए ही जाना जाता है. शाहिद के परिवार से एक से बढ़कर एक उस्ताद हुए- इमदाद खां, इनायत खां, वाहिद खां और विलायत खां. इस घराने के लोगों ने सात पीढ़ियों से कोई और साज़ नहीं थामा.

बांसुरी हो, वायलिन, सितार हो या सरोद, हर एक साज पर सुरों की अवतारणा करने की शैली अलग अलग होती है, अलग पैटर्न, अलग चलन होती है. लेकिन हर साज़ कहीं न कहीं गायकी के करीब आने की कोशिश करता है, क्योंकि स्वर के श्रुतियों को पकड़ने की, संगीत की मिठास को अभिव्यक्त करने की जो क्षमता, जो जरूरी लोच गले में होती है वो कहीं नहीं होती. ये कोशिश इटावा घराने में साफ दिखाई देती है. सितार को तंद्रवाद्य कहते हैं. सितार में ज्यादातर तंत्रकारी अंग ही सुनने को मिलता है, लेकिन शाहिद परवेज का सितार गाता है.

शाहिद के घराने की खासियत ही है गायकी अंग, जिसमें सितार के तारों के जरिए गले जैसी मिठास पैदा की जाती है. शाहिद परवेज को सुनते हुए सचमुच गायकी सुनने का आनंद आता है. तार को छेड़ने के बाद शाहिद परवेज मींड, मुर्कियों और गमक का जो काम दिखाते हैं वो मुग्ध कर देने वाला है. हालांकि तंत्रकारी बाज पर भी उनकी वैसी ही महारत है, और उनको सुनते हुए गायकी और तंत्रकारी दोनों का आनंद मिलता है.

दादा की धमकी के बाद पिता ने करीब तीन साल की उम्र से शाहिद परवेज को संगीत सिखाना शुरू किया. परिवार में परंपरा थी कि पहले गाना सीखना है, लिहाजा पहले एक साल तक उन्हें शास्त्रीय गायन सिखाया गया ताकि उन्हें अपने साज़ में गले सी मिठास और बारीकियां ढालने का हुनर आए. शाहिद परवेज के दादा ही उनके पहले वोकल टीचर थे. बाद में उन्होंने अपने चाचा बॉलीवुड के कंपोजर उस्ताद हाफिज खान उर्फ खान मस्ताना के साथ काम किया. शाहिद परवेज ने उस्ताद मुन्ने खान से तबला भी सीखा. हालांकि जब उन्होंने जब पूरी तरह सितार को बजाना शुरू किया उसके बाद सिर्फ अपने पिता से सीखा.

शाहिद परवेज ने आठ साल की उम्र से ही मंच प्रस्तुतियां देनी शुरू कर दी थीं. छोटी उम्र से ही उनके वादन में ऐसा चमत्कार दिखता था कि उन्हें चाइल्ड प्रॉडिजी यानी बाल प्रतिभा के रूप में पहचान मिलने लगी. बचपन की उस तालीम का असर शाहिदपरवेज के सितार में गूंजता है. मध्य और द्रुत लय में जब सुरों दौड़ के साथ मुश्किल लयकारी करते हुए, खूबसूरत तिहाइयां लेते हुए सम पर आते हैं, तो सुनने वाले मंत्रमुग्ध होकर तालियां बजाने लगते हैं.

शाहिद परवेज के सितार में बहुत सारे बड़े उस्तादों का रंग दिखता है. उस्ताद विलायत खां की तरह परंपरा और नई चीजों का मेल, उस्ताद अमीर खां की तरह रूहानी कैफियत, उस्ताद बड़े गुलाम अली खां की तरह रक्स करते सुर उनके सितार में सुने जा सकते हैं.

शाहिद परवेज आज दुनिया भर के दौरे करते हैं, हर कॉन्सर्ट में दर्शकों को चमत्कृत करके छोड़ते हैं. उन्होंने ने देश और दुनिया के सबसे बड़े संगीत समारोहों में प्रस्तुतियां दी हैं. अमेरिका, यूरोप, कनाडा, मिडिल ईस्ट और ऑस्ट्रेलिया में बेहिसाब शोहरतबटोर चुके हैं. अनगिनत सीडी, डीवीडी और शानदार परफॉर्मिंग करियर वाले शाहिद परवेज को पद्म श्री, संगीत नाटक अकादमी, सुर श्रृंगार जैसे बड़े सम्मान दिए जा चुके हैं. दुनिया भर में दर्जनों शिष्य उनसे तालीम ले रहे हैं. अपने समकालीनों के बीच शाहिद परवेज को आज के दौर का सर्वश्रेष्ठ सितार वादक कहा जा सकता है.

हिंदुस्तान में शास्त्रीय संगीत की हालत पर शाहिद परवेज की एक टिप्पणी गौर करने लायक है. एक इंटरव्यू में वो कहते हैं-‘हिंदुस्तान में जो लोग म्यूजिक समझते हैं वो तो बहुत अच्छा समझते हैं लेकिन जिन लोगों ने कभी शास्त्रीय संगीत नहीं सुना, उनको शास्त्रीय संगीत के बारे में बिल्कुल कुछ मालूम नहीं होता. यहां तक कि वो साज का नाम भी ठीक से नही ले पाते. बाहर क्या है कि जो लोग म्यूजिक हैं उनकी समझ अच्छी होती है, इतनी अच्छी नहीं जितनी हमारे यहां होती है लेकिन जो लोग म्यूजिक में नहीं हैं, उनको भी थोड़ी सेंस होती है, समझ होती है, सलीका होता है, वो भी म्यूजिक को अप्रीशिएट कर सकते हैं.’ ये ऑब्जर्वेशन बहुत अहम है. शास्त्रीय संगीत के शुभचिंतकों को इस पहलू की तरफ ध्यान देना होगा.

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