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आवाज की दुनिया को कोई तोड़मरोड़ नहीं सकता: उस्ताद अमजद अली खान

प्रसिद्ध सरोद वादक उस्ताद अमजद अली खान से फ़र्स्टपोस्ट हिंदी की संवाददाता रूना आशीष की बातचीत

Runa Ashish | Published On: Mar 30, 2017 06:22 PM IST | Updated On: Mar 30, 2017 06:46 PM IST

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आवाज की दुनिया को कोई तोड़मरोड़ नहीं सकता: उस्ताद अमजद अली खान

देश के सबसे सम्माननीय पुरस्कार पद्मभूषण और पद्मविभूषण से सम्मानित सरोद वादक उस्ताद अमजद अली खान ने हाल ही में एक किताब लिखी है. इस किताब का नाम है ‘मास्टर ऑन मास्टर्स’.

इस किताब में उस्ताद ने कई बड़े और नामी लोगों से जुड़ी बातों और अपने जीवन में उनकी जगह के बारे में लिखा है. इस किताब में एमएस सुब्बालक्ष्मी, पंडित किशन महाराज, उस्ताद बिस्मिल्ला खान और मल्लिका ए गजल बेगम अख्तर जैसी नामचीन हस्तियों का जिक्र किया है.

उनकी इस किताब के लॉन्च के लिए उस्ताद खुद मुंबई में मौजूद थे. फ़र्स्टपोस्ट हिंदी की संवादाता रूना आशीष ने उनसे इस किताब और सरोद के बारे में बातचीत की.

कैसे सरोद से सजे हाथों में कलम आ गई?

ये कलम नहीं सोच है. ये मेरे ख्याल हैं. वैसे भी मैंने कलम की साधना नहीं की है. मैं तो भाषा को कभी समझ भी नहीं पाया क्योंकि मेरा ऐसा मानना है कि भाषा के माध्यम से कई बार हेराफेरी हो जाती है.

हालांकि मैं संतो की लिखी बातों और लेखकों के लेख के बारे में नहीं बोल रहा हूं लेकिन भाषा के जरिए लोग कई बातों को तोड़मरोड़ देते हैं. मैं ध्वनि की भाषा की दुनिया में रहता हूं. मुझे लगता है कि आवाज की दुनिया बहुत ही पारदर्शी है और मैं उसे किसी भी तरह से तोड़मरोड़ नहीं सकता हूं.

लेकिन आज के समय भी भाषा इस दुनिया पर राज कर रही है. भाषा की वजह से कोई चुनाव जीत जाता है तो कोई हार जाता है. मैं खुश हूं कि किताब के जरिए अपनी सोच को लोगों के सामने ला सका.

इस किताब में संगीत की बारह बड़ी शख्सियतों के बारे में लिखा गया है. कोई खास वजह?

ustad amjad ali khan

तस्वीर: उस्ताद अमजद अली खान के फेसबुक वाल से

फेहरिस्त तो लंबी थी लेकिन ये 12 लोग मेरे लिए ज्यादा खास थे. इन लोगों से मेरी जाती तौर पर ताल्लुक रहे हैं. कभी मैं उनके घर गया, कभी वो मेरे घर आए. हम लोगों ने काफी समय साथ बिताया. ये वो 12 लोग है जिनकी वजह से शास्त्रीय संगीत पूरी दुनिया में पहुंचा और इस संगीत को दुनियाभर के लोगों ने जाना.

वैसे और भी लोगों ने शास्त्रीय संगीत को दुनिया के स्तर पर लाने का प्रयास करते रहे हैं. यह मियां तानसेन से शुरु होता है. वो अकबर बादशाह के दरबार शाही गायक रहे हैं.

वैसे भी लोगों ने अपने गुरुओं या पिता के बारे में बहुत कुछ लिखा है. हमारे इतिहास में कलाकारों को कभी भी आम जनता के बीच में सराहना नहीं मिली है.

मेरे पिता और मेरे गुरु (उस्ताद हाफिज अली खान) हमेशा कहते थे कि मुझे बाकी के महान संगीतकारों के बारे में जानना चाहिए और उन्हें ढ़ूंढना चाहिए. यही एकमात्र जरिया है जिससे हम अपनी जमात को संपंन बनाते हैं.

आपने मात्र 6 साल की उम्र में सरोद वादन किया और लोगों के सामने अपना हुनर दिखाया. इस उम्र में तो बच्चा एक जगह स्थिर बैठ भी नहीं पाता.

होता ये है कि अगर आप किसी संगीतकार के घर में जन्म लेते हैं तो 24 घंटे आपको संगीत सुनने को मिलता है. ऐसे घरों में यह परंपरा बन जाती है कि 6 साल के बच्चे को मंच पर चढ़ा दिया जाता है. मैं कोई मेधावी संगीतकार नहीं रहा हूं.

शायद घरवाले यह देखना चाहते हैं कि आप मंच पर कैसे पेश आते हैं. घरवालों का उद्देश्य होता है कि आप कम से कम यह सीख लें कि लोगों के सामने कैसे परफॉर्म करें. इस वजह से यह मेरे लिए एक ट्रेनिंग थी. लेकिन असल में लोगों ने मुझे 12 साल की उम्र में आमंत्रित करना शुरु कर दिया.

तो कभी कोई बदमाशी नहीं की. कभी अम्मी के सामान में से मिठाई चुरा कर नहीं खाई.

हां, मैं कभी वो बचपन वाली शैतानियां नहीं कर पाया. वैसे भी मुझे डर था कि कहीं भी पिता के सामने कोई गलत बात ना चली जाए. ये हमेशा दिमाग में चलता रहता था. वैसे भी मेरे पिता और मुझमें उम्र का काफी अंतर था. उस्ताद बिसमिल्लाह खान भी मेरे पिता को चचा कह कर पुकारते थे.

आपने तो बचपन नहीं जिया लेकिन अपने बेटों अमान और अयान को ऐसा कोई मौका दिया कि नहीं जब वो बदमाशी कर पाते.

हम सब लोग आपस में दोस्त हैं. वैसे भी ये ही रिश्ता ठीक रहता है और मजबूत भी रहता है. घर में ऐसी दोस्तियां बड़ी अहम होती हैं.

मैंने सुना है कि सरोद वादन में आपकी यानी छठी पीढ़ी के बाद अब आठवीं पीढ़ी भी तैयार हो रही है.

हां, अयान के जुड़वा बच्चे हैं- अबीर और जोहान. ये दोनों अगस्त के महीने में पांच साल के हो जाएंगे. उन्हें संगीत पसंद है. वो सुनते हैं. लेकिन उनकी ख्वाहिशें क्या हैं और वो कैसे पूरी होती हैं ये तो उनके माता पिता पर निर्भर होगा.

तस्वीर: उस्ताद अमजद अली खान के फेसबुक वाल से

तस्वीर: उस्ताद अमजद अली खान के फेसबुक वाल से

आपने कभी अपने पोतों को घोड़ा बन कर पीठ पर सवारी कराई है?

उनकी फरमाइश मुझसे संगीत वाली होती है. कभी कहते हैं दुर्गा बजाइये तो कभी किसी और राग की फरमाइश कर देते हैं. उन्होंने कई रागों को अपने ही नए नाम दिए हैं. कभी वो मुझे कहते हैं जिंगल बेल बजाइए तो मुझे उसे सरोद पर बजाना पड़ता है. फिर वो दोनों नाचते हैं और मस्ती करते हैं.

फिल्म संगीत की बात करें तो इसमें आजकल मीठी आवाज कम और हल्की आवाज ज्यादा सुनने को मिलती है. ऐसा क्यों?

फिल्मों की दुनिया में कौन सी आवाज को कौन प्रमोट करना चाहता है यह बात बहुत मायने रखती हैं. लेकिन आज के गायकों में श्रेया घोषाल और सुनिधि चौहान बहुत अच्छा गा रही हैं. कई लड़कों को भी मैंने सुना है कि युवा लोगों में अरिजीत का बहुत नाम हो रहा है. फिर इसमें कंपोजर का भी बहुत बड़ा काम है. अगर अच्छी धुन है तो गायक के लिए भी फायदे की बात होती है.

आपने जमाने में किन गायकों को आपने पसंद किया है?

लताजी और आशाजी तो हैं ये तो अपने आप में हमारे बीच में लीजेंड हैं लेकिन जो लोग चले गए हैं उनको भी हम बहुत मिस करते हैं. हेमंत कुमार या मुकेशजी या मन्ना डे या किशोर कुमार. उनकी आवाज में जाने क्या कैफियत थी कि हर आदमी आज किशोर कुमार और रफी बनना चाहता है. मेरे भी इन सभी से बहुत अच्छे रिश्ते रहे हैं.

आगे आने वाले दिनों में क्या कर रहे हैं आप?

मेरा स्कॉटिश चैंबर ऑर्केस्ट्रा के साथ एक कार्यक्रम है. वो लोग चाहते थे कि मैं उनके लिए लिखूं. मैं ऐडिनबरा गया उन लोगों के साथ रिकार्डिंग की. जिसका नाम समागम रखा है.

ये 45 मिनिट का कार्यक्रम है और पहली बार सरोद के साथ ये काम किया गया है. वैसे और देशों के ऑर्केस्ट्रा इस तरह का काम करना चाहते हैं और वो हम कर रहे हैं. यह भारतीय शास्त्रीय संगीत का यूरोपीय संगीत के साथ एक तरह का कोलाब्रेशन है. मैं इसे एंजॉय कर रहा हूं और मुझे अच्छा भी लग रहा है.

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