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एक थी 'कनुप्रिया'...

हिंदी के ख्यातिनाम साहित्यकार भगवतीचरण वर्मा की बहू की दुखभरी दास्तान

Nazim Naqvi | Published On: Jun 01, 2017 08:23 AM IST | Updated On: Jun 01, 2017 08:23 AM IST

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एक थी 'कनुप्रिया'...

धोखा मत खाइएगा ये धर्मवीर भारती की कालजयी कविता ‘कनुप्रिया’ की पात्र नहीं बल्कि भगवतीचरण वर्मा की बहू की दास्तान है.

विडंबना देखिये, भगवतीचरण वर्मा का पहला उपन्यास था ‘पतन’ (1928) और आखिरी उपन्यास था ‘सबहीं नचावत राम गोसाईं’ (1970). ऐसा लगता है जैसे इन दो उपन्यासों के नाम में उनके बेटे के परिवार कि अंतर्कथा छुपी हुई है, जिसके पतन के आखिरी गवाह खुद उनके पौत्र रवि वर्मा हैं, जो कानपुर से 50 किलोमीटर और कन्नौज से 30 किलोमीटर पर स्थित ‘बिल्हौर’ में एक मुस्लिम परिवार के आश्रय पर किसी तरह जीवन गुजार रहे हैं.

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रवि वर्मा

कनुप्रिया मंजरी वर्मा, भगवतीचरण वर्मा के तीसरे बेटे चतुर्भुज प्रताप वर्मा की पत्नी थीं. आइए आधुनिक हिंदी साहित्य के एक बड़े हस्ताक्षर और ‘चित्रलेखा’ जैसे कालजयी उपन्यास के लेखक भगवतीचरण वर्मा की बहू की दर्द भरी दास्तान को उनके पौत्र की जुबानी सुनते हैं.

दास्तान सुनाने से पहले एक अहम बात; रवि वर्मा जो पेशे से और स्वभाव से भी एक पेंटर हैं, उनकी बातों में न तो बनावट है न ही तथ्यों को तोड़ने-मरोड़ने की क्षमता. पतलून को, बेल्ट की जगह सुतली की डोर से बांधे और बीड़ी पीते रवि के शब्दों और आवाज में उसी आत्म-सम्मान के दर्शन होते हैं जो एक साहित्यकार के पौत्र, एक कला प्रेमी कत्थक नृत्यांगना और जांबाज एयरफोर्स पायलट के बेटे में स्वाभाविक रूप से आने चाहिए. तो दास्तान कुछ इस तरह है:

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चतुर्भुज वर्मा और उनकी पत्नी कनुप्रिया. साथ में बच्चे रवि और सोनिया

'जी, मेरी मां और पिता का विवाह 3 जून, 1962 में हुआ. मेरी मां आईटी कॉलेज, लखनऊ यूनिवर्सिटी की पढ़ी हुई थीं. विवाह से पहले वो लखनऊ कॉलेज ऑफ आर्ट्स में थीं. चूंकि मेरे पिता पायलट थे, पहले वो इंडियन एयरफोर्स में थे बाद में उन्होंने इंडियन एयरलाइन्स ज्वाइन कर ली'.

'फिर मेरी सिस्टर पैदा हुई 1963 में, और 1964 में, 3 जून को मैं पैदा हुआ. फिर मेरी मां ने गुरु कालू शंकर रॉय चौधरी से डांस सीखना शुरू किया जब हमलोग 4-5 साल के थे. उस समय हमलोग कोलकाता में रहते थे. कोलकाता में हम नौ साल रहे वहीं हमने स्कूलिंग की, साउथ-पॉइंट स्कूल में.'

'फिर हमलोग 1975 में दिल्ली आ गए. दिल्ली आकर वसंत-विहार में एक किराए के मकान में रहने लगे. इसी बीच हमारे दादा भगवतीचरण वर्मा जी राज्य-सभा के सदस्य बन गए. उन्हें मकान मिल गया लुटियन देहली में. जब वो दिल्ली आये तो हमें अपने साथ रख लिया. हमलोग उन्हीं के पास शिफ्ट हो गए. 3-4 साल हमलोग वहीं रहे, वहां काफी लोग आया करते थे बड़े-बड़े राइटर, लेखक, प्रोफेसर आते थे दादा जी से मिलने'.

'चूंकि मेरे पिता पायलट थे इसलिए उनकी दोस्ती राजीव गांधी से भी थी. उनलोगों ने मिलकर उस समय एक थर्ड-लेवल एयरलाइन्स भी शुरू की थी, जो मेरे पिता का आयडिया था. 70 के दशक में, अमेरिका में इसका बड़ा चलन था. मुझे याद नहीं कि फिर इस कल्पना का क्या हुआ. मैं 18-19 साल का था उस समय. मेरे घर में राजीव जी के फोन आया करते थे, पिता जी भी 10 जनपथ जाया करते थे'.

'फिर मेरी बहन के साथ हादसा हो गया, वो मिरांडा कॉलेज से इंग्लिश ऑनर्स कर रही थीं. वो एक अच्छी पेंटर भी थीं और त्रिवेणी कला संगम से जुडी हुई थीं. वहां से उन्हें सनावर स्कूल, शिमला का निमंत्रण मिला कि आप हमारे यहां आकर बच्चों को पेंटिंग सिखाइए. लेकिन शिमला जाते समय, 91 में उनकी कार-दुर्घटना में मौत हो गई'.

Putri Soniya Verma jiski Car accident mein mritu hui

सोनिया वर्मा

'दीदी का चला जाना हम सब के लिए, मेरे परिवार के लिए दुःख का पहाड़ था. उसी के बाद पिता ने नौकरी से अवकाश ले लिया. मेरी मां जो एक प्रतिष्ठित कत्थक डांसर बन चुकी थीं, वो भी टूट सी गईं'.

'मां के लिए ये भावनात्मक अाघात था. उसके बाद उन्होंने खुद को कथक में लीन कर दिया. कभी 15 घंटे तो कभी साठ घंटे तक डांस करते रहना उनकी नियति बन गई. उन्होंने हिमाचल-भवन में 101 घंटे तक कथक नृत्य करके एक रिकॉर्ड बनाया था तो ‘दैनिक-जागरण’ की एक पत्रकार ने उनसे पूछा था. मंजरी जी ‘व्योम से व्योम तक’ 101 घंटे नृत्य की प्रेरणा कहां से मिली? तो उनका जवाब था- मेरे अंदर एक आग दहक रही थी, अपनी बेटी को खो देने की आग, मैंने इस आग को कुछ करके ठंडी करना चाहा, और 101 घंटे नृत्य किया. ये सब अपने आप बिना इरादे के हो गया'.

'जो लोग कथक के बारे में जानते हैं वो ये भी जानते हैं कि 101 घंटे नृत्य करना कितना मुश्किल काम है. इसके लिए मां ने दो साल तक रोज़ दस-दस घंटे का रियाज़ किया. शायद दीदी को भुलाने का यही तरीका था उनके पास'.

नृत्य के दौरान की कनुप्रिया की तस्वीर

नृत्य के दौरान की कनुप्रिया की तस्वीर

'मां काफी हंसने-बोलने वाली महिला थीं. कभी किसी कि बुराई में उनका मन नहीं लगा. मेरे पिता भी ऐसे ही थे. फिर हमलोगों ने गुड़गांव में प्रॉपर्टी ली, उसमें लैंड माफिया बीच में आ गए और इसी बीच मेरे पिता की डेथ हो गई. कुछ लोगों का कहना है कि मेरे पिता कि मौत में उन्हीं लैंड माफियाओं का हाथ था. फिर हमें धमकी भरे फोन आने लगे कि इस जमीन को खाली कर दो. इसी बीच मेरी मां को भी जहर देने कि कोशिश की गई. इन सबसे घबराकर हमनें जमीन बेच दी और गुड़गांव छोड़ दिया'.

'अचानक एक परिवर्तन हमने देखा, क्योंकि हमारे पास पैसे आ गए थे इसलिए मां के कई रिश्तेदार हमारे प्रति सहानुभूति दिखाने लगे. कुछ पैसा इस तरह भी उड़ा. इसी बीच उन्हें हार्ट-अटैक भी हुआ दिल्ली में, उसमें भी काफी पैसा लगा'.

'फिर हमलोग लखनऊ आए, लखनऊ में मेरे दादा का मकान है लेकिन हमारे ताऊ और चाचा ने न तो हमारी कोई मदद की न ही हमें घर में जगह दी. जब कोई आसरा नहीं बचा तो हम अपने पिता के बचपन के दोस्त तारिक इब्राहिम, जो कानपुर में रहते थे उनके पास गए. तारिक ने जब हमारा हाल देखा तो बेचैन हो गए और मां को हर तरह से मदद का दिलासा दिया'.

'तारिक चाचा की बिल्हौर में, एक सरिया मिल थी. वहीं एक कमरे में उन्होंने हमारे रहने की व्यवस्था कर दी. मां तारिक से वचन ले चुकी थीं कि वो किसी को नहीं बताएंगे कि वो कौन हैं. मां नहीं चाहती थीं कि लोगों को पता चले कि भगवती चरण वर्मा कि बहू किस दुर्दशा में रह रही है. वहीं एक साल बाद पहली जून 2012 में उन्होंने अंतिम सांस ली'.

'चूंकि मां के कहने पर तारिक चाचा ने उनकी पहचान छुपाई थी और फैक्ट्री का मैनेजर तनवीर अहमद ही उनके खाने-पीने का खयाल रखता था इसलिए जब वो मर गईं और उनके अंतिम संस्कार के लिए पंडितों को तारिक चाचा ने लाना चाहा तो वो लोग तैयार नहीं हुए. एक अजनबी औरत को वो लोग मुसलमान समझे. मजबूरन तारिक चाचा को अपना वचन तोड़ना पड़ा और उन्होंने हिन्दुओं को बताया कि ये भगवतीचरण वर्मा कि बहू हैं'.

'मां टूट चुकी थीं समाज के व्यवहार से वो अक्सर कहती थीं कि मैं उस हिंदुस्तान को छोड़ दूंगी जहां कला का खजाना तो है लेकिन कलाकार की कोई कद्र नहीं है. ये विडंबना भी देखिए कि तारिक इब्राहिम और उनके परिवार ने उन्हें आश्रय दिया और उनके अंतिम संस्कार का सारा प्रबंध किया. तनवीर अहमद और इमरान अहमद ने उनके लिए शांति पाठ कराया'.

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तनवीर अहमद के परिवार के साथ रवि वर्मा

तो ये थी वो दास्तान जो उनके बेटे ने हमें सुनाई और हमारी आंखों को नम कर दिया. पूछने पर रवि बड़े दुःख के साथ बताते हैं कि मां के देहांत के बाद रात में ही लखनऊ में ताऊ और चाचा को सूचना दे दी गई थी लेकिन अंतिम संस्कार में भी कोई नहीं आया.

रवि वर्मा, मां के जाने के बाद, अब उसी कमरे में मां की यादों के सहारे रह रहे हैं. इस बीच एक दो जगह शिक्षक कि नौकरी भी की, ट्यूशन भी पढ़ाए, लेकिन जीवन चलाने की समस्या आज तक बनी हुई है. कमरे के एक कोने में मां के लिखे हुए उपन्यासों की पांडुलिपिया, कविता संग्रह, अच्छे दिनों की तस्वीरें, जिनपर वक्त के धब्बे बढ़ते जा रहे हैं, दादा का पद्मभूषण अवार्ड, समाचार-पत्रों कि कतरनें भरी हुई हैं.

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कनु्प्रिया का संदूक

बिल्हौर में भी इक्का-दुक्का लोगों को ही पता है कि रवि कौन हैं? वही गाहे-बगाहे उनकी मदद के लिए आ जाते हैं. रवि खुद बेचैन रहते हैं कि कोई उनकी मां के उपन्यास छाप दे और उनकी कविताओं का संग्रह प्रकाशित कर दे. लेकिन बिल्हौर में उन्हें कोई प्रकाशक कैसे मिलेगा. बिल्हौर से बहार जाने की न उनमें हिम्मत है और न संसाधन. 52-53 कि उम्र है लेकिन गरीबी ने नक्शों-निगार ऐसे बना दिए हैं कि खुद आईना भी 65-66 बरस से नीचे मानने को तैयार नहीं होता.

कनुप्रिया मंजरी की एक कविता:

मेरा रंग-मंच, समूची-धरा सारा का सारा बाहें फैलाए आकाश... मेरी भावनाएं गहन गंभीर सिन्धु-अठखेलियाँ करता सागर “मैं स्वयं” नृत्य-मय स्वयं-मुग्धा कनु कि प्रिया, कनुप्रिया केतकी मेरे दर्शक-गण समूचा ब्रह्माण्ड... जलते-बुझते तारक... और शून्य में समाते ... नक्षत्र

चित्रलेखा की कथा पाप और पुण्य की समस्या पर आधारित है-पाप क्या है? उसका निवास कहां है? इन प्रश्नों का उत्तर खोजने के लिए महाप्रभु रत्नांबर के दो शिष्य, श्वेतांक और विशालदेव, क्रमश: सामंत बीजगुप्त और योगी कुमारगिरि की शरण में जाते हैं. और उनके निष्कर्षों पर महाप्रभु रत्नांबर की टिप्पणी है, 'संसार में पाप कुछ भी नहीं है, यह केवल मनुष्य के दृष्टिकोण की विषमता का दूसरा नाम है. हम न पाप करते हैं और न पुण्य करते हैं, हम केवल वह करते हैं जो हमें करना पड़ता है.'

भगवती चरण वर्मा का जन्म उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के शफीपुर गांव में हुआ था. वर्माजी ने इलाहाबाद से बीए, एलएलबी की डिग्री प्राप्त की और प्रारंभ में कविता लेखन किया. फिर उपन्यासकार के नाते विख्यात हुए. 1933 के करीब प्रतापगढ़ के राजा साहब भदरी के साथ रहे.

1936 के लगभग फिल्म कॉरपोरेशन, कलकत्ता में कार्य किया. कुछ दिनों ‘विचार’ नामक साप्ताहिक का प्रकाशन-संपादन, इसके बाद बंबई में फिल्म-कथालेखन तथा दैनिक ‘नवजीवन’ का संपादन, फिर आकाशवाणी के कई केंद्रो में कार्य. बाद में, 1957 से मृत्यु-पर्यंत स्वतंत्र साहित्यकार के रूप में लेखन. ‘चित्रलेखा’ उपन्यास पर दो बार फिल्म-निर्माण और ‘भूले-बिसरे चित्र’ साहित्य अकादमी से सम्मानित. पद्मभूषण तथा राज्यसभा की मानद सदस्यता प्राप्त.

यह अपना-अपना भाग्य, मिला। अभिशाप मुझे, वरदान तुम्हें॥ जग की लघुता का ज्ञान मुझे। अपनी गुरुता का ज्ञान तुम्हें॥

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