S M L

रागदारी: 'राग मालकौंस' में गूंजते मन मोहने वाले भजन

शहनाई वाले कलाकार भी अक्सर राग मालकौंस और मारू बिहाग जैसे राग ही बजाते हैं

Shivendra Kumar Singh | Published On: Mar 26, 2017 12:53 PM IST | Updated On: Mar 26, 2017 12:53 PM IST

रागदारी: 'राग मालकौंस' में गूंजते मन मोहने वाले भजन

साल 1952 की बात है. इसी साल फिल्म ‘बैजू बावरा’ रिलीज हुई थी. जो महान संगीतज्ञ बैजू बावरा पर आधारित थी. फिल्म के डायरेक्टर थे विजय भट्ट. विजय भट्ट ने ‘गूंज उठी शहनाई’ और ‘हिमालय की गोद’ में जैसी चर्चित फिल्में भी बनाई.

खैर, बैजू बावरा में एक गाना था- जिस गाने को राग मालकौंस पर तैयार किया गया था. आज बात राग मालकौंस की करेंगे इसलिए आपको पहले वो गाना सुनाते हैं और उसके बाद बताते हैं इस गाने और राग मालकौंस की दिलचस्प कहानी.

ये बात आपने लाखों बार सुनी होगी कि संगीत का कोई मजहब नहीं होता. ये बात इस गाने पर पूरी तरह लागू होती है. आपको जानकर ताज्जुब होगा कि भारतीय फिल्म इतिहास के सबसे लोकप्रिय कृष्ण भजनों में एक इस भजन को मोहम्मद शकील बदायूंनी ने लिखा था. इस गाने को गाया था मोहम्मद रफी ने और धुन तैयार की थी नौशाद साहब ने. कहते हैं कि शकील बदायूंनी को इस कृष्ण भजन को लिखने के लिए कुछ देर के लिए उर्दू भूलनी पड़ी थी. इस भजन के बोल पढ़िए

हरि ओम, हरि ओम, हरि ओम, हरि ओम

मन तड़पत हरि दर्शन को आज

मोरे तुम बिन बिगरे सगरे काज

बिनती करत हूं, रखियो लाज

तुमरे द्वार का मै हूं जोगी

हमरी ओर नजर कब होगी

सुनो मोरे ब्याकुल मन का बाज

बिन गुरू ज्ञान कहां से पाऊं

दिजो दान हरि गुण गाऊं

सब गुणी जन पे तुम्हारा राज

मुरली मनोहर आस ना तोडो

दुख भंजन मोरा साथ ना छोड़ो

मोहे दर्शन भिक्षा दे दो आज

मन तरपत हरि दर्शन को आज

ये कृष्ण भजन इतना लोकप्रिय हुआ कि आज करीब साठ-पैंसठ साल बाद भी सुनाई देता है. इस गाने में मोहम्मद रफी की गायकी को याद करते हुए नौशाद साहब ने एक बार कहा था-

'गूंजते हैं तेरे नगमों से अमीरों के महल, झोपड़ों में भी गरीबों से तेरी आवाज है.

अपनी मौसिकी पर सबको फक्र होता है मगर, मेरे साथी आज मौसिकी को तुझ पर नाज है..'

इस भजन में वो जज्बात, वो कृष्णभक्ति मौजूद है. कहते हैं कि जब नौशाद साहब इस भजन की रिकॉर्डिंग कर रहे थे तो उन्होंने रिकॉर्डिंग से पहले सभी साजिंदों को ताकीद की थी कि रिक़ॉर्डिंग के दिन हर कोई पाक साफ होकर आएगा.

नौशाद साहब याद करके बताते हैं ‘इस भजन की रिकॉर्डिंग के वक्त एक शख्स पर कैफियत तारी हो गई. वो कृष्णा कृष्णा पुकार रहे थे. अपनी ही धुन में थे. उनका नाम था- लल्लू भाई, जो सेट पर सबकी पेमेंट करने के लिए आते थे. भजन खत्म होने के बाद भी वो कृष्णा कृष्णा कहकर झूमते रहे.’

ये राग मालकौंस की खूबी है. रफी साहब का ही गाया एक और बहुत ही कर्णप्रिय गाना इसी राग पर आधारित है ‘अंखियन संग अंखियां लागी आज’.

शास्त्रीय कलाकारों में भी ये राग खासा लोकप्रिय है. उस्ताद अमीर खां राग मालकौंस में गाया करते थे- ‘जिनके मन राम बिराजे...’ . शब्दों में निहित संवेदना खुद से ही अपनी ओर खींच लेती है. आप भी उस्ताद अमीर खां का राग मालकौंस सुनिए.

राग मालकौंस का एक और स्वरूप देखिए. जिसमें उस्ताद राशिद खान ने शुद्ध शास्त्रीय तानकारी की है.

शास्त्रीय गायक उस्ताद राशिद खान को हम सभी जानते हैं. उनका आसान परिचय ये है कि उन्होंने सुपरहिट फिल्म ‘जब वी मेट’ में आओगे जब तुम ओ साजना गाना भी गाया था. मोमिन खां मोमिन का एक शेर याद आ रहा है. ये शेर अक्सर बड़े गायक-गायिकाओं की शान में पढ़ा जाता है लेकिन रामपुर सहसवान घराने के शास्त्रीय गायक राशिद खान की आवाज पर ये शेर बिल्कुल मुफीद लगता है.

उस ग़ैरत--नाहीद की हर तान है दीपक

शोला सा लपक जाए है आवाज़ तो देखो

जाने माने शास्त्रीय गायक मल्लिकार्जुन मंसूर भी राग मालकौंस के संपूर्ण रूप को खूब गाया करते थे. मंसूर की गायकी की एक खासियत थी. उनकी गायकी में तीन घरानों, तीन परंपराओं का संगम मिलता था. उन्होंने बचपन में कर्नाटक संगीत सीखा, जवान हुए तो ग्वालियर घराने के विद्वानों से सीखा और आखिरकार जयपुर अतरौली घराने से जुड़ गए.

आपको राग मालकौंस के शास्त्रीय पक्ष के बारे में भी बताते हैं. मालकौंस अद्भुत किस्म का मधुर राग है. राग मालकौंस भैरवी थाट से निकला है. इसमें गंधार (ग), धैवत (ध) और निषाद (नि) ये तीनों स्वर कोमल लगते हैं.

ऋषभ (रे) और पंचम (प) इस राग में नहीं लगता, संगीत की भाषा में कहें तो ऋषभ और पंचम वर्जित है. चूंकि सात स्वरों में दो स्वर वर्जित हो गए तो आरोह और अवरोह दोनों में पांच-पांच स्वर बचते हैं, इस तरह इसकी जाति हो जाती है औडव-औडव. मालकौंस का आरोह-अवरोह देख लेते हैं-

आरोह- सा  म,  नि सां

अवरोह- सां नि  म,  म  सा

राग की ‘पकड़’ स्वरों के उस कॉम्बिनेशन को कहते हैं जिसका इस्तेमाल करते ही राग पकड़ में आ जाता है यानी पहचान में आ जाता है. राग मालकौंस की पकड़ है-

ध़ नि सा म,  म  सा

मालकौंस में वादी स्वर यानी सबसे अहम स्वर है मध्यम (म) और संवादी यानी दूसरा सबसे अहम स्वर है षडज (सा). यानी इन दोनों स्वरों को बार-बार इस्तेमाल करें तो राग की शक्ल खिलकर सामने आती है. इस राग को गाने का समय रात का तीसरा प्रहर बताया गया है. राग मालकौंस का मूड गंभीर है. भक्ति संगीत इस राग में बड़ा सुंदर लगता है.

पंडित राजन-साजन मिश्र ने फिल्म स्वर संगम के लिए इसी राग मालकौंस में एक गीत गाया था- आए सुर के पंछी आए. आइए आपको वो गाना भी सुनाते हैं. ये गाना गिरीश कर्नाड पर फिल्माया गया था. पंचम वर्जित होने के कारण जब इस मालकौंस गाते हैं तो तानपुरे में पहले तार को मंत्र मध्यम (म) में मिलाते हैं. इससे मिलता जुलता राग है चंद्रकौंस. मालकौंस में निषाद (नि) कोमल होता है, इसे शुद्ध कर दीजिए तो चंद्रकौंस बन जाता है.

राग मालकौंस की बारीकियों को और अच्छी तरह समझने के लिए इस वीडियो को देखिए. इसमें ध्रुपद गायक उस्ताद फैयाज वसीफुद्दीन डागर मालकौंस की बारीकियों को बहुत ही अच्छी तरह समझा रहे हैं.

अगली बार जब आप किसी ऐसे शादी-ब्याह में जाएं जहां शहनाई बज रही हो तो थोड़ा ध्यान से सुनिएगा क्योंकि किसी कोने में छोटे से मंच पर बैठकर शहनाई वाले मंगल धुन बजा रहे होंगे. ये बात इसलिए कही क्योंकि शहनाई वाले कलाकार भी अक्सर राग मालकौंस और मारू बिहाग जैसे राग ही बजाते हैं.

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi