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7 फेरे कुबूल किए हमने: 'लव जिहाद' नहीं इस कहानी में सिर्फ लव ही लव है!

यह एक मुसलमान लड़के और एक हिंदू लड़की के लव और लव-मैरिज का किस्सा है.

FP Staff | Published On: Mar 30, 2017 01:20 PM IST | Updated On: Mar 30, 2017 01:20 PM IST

7 फेरे कुबूल किए हमने: 'लव जिहाद' नहीं इस कहानी में सिर्फ लव ही लव है!

'लव जिहाद' टर्म जब से ईजाद हुई है चर्चा में तो यह तभी से है. योगी जी के सीएम बनने के बाद जाहिर है अब लोग इस बात को ज्यादा सीरियसली ले रहे होंगे.

लेकिन, अगर आप इस 'लव जिहाद' उर्फ लव स्टोरी को पढ़ लेंगे तो यह बात अच्छी तरह समझ जाएंगे कि न तो लोगों को इतनी फिक्र करने की जरूरत है और न ही रात-दिन लव-जिहाद....लव जिहाद रटने वालों की.

यह तो आप समझ ही गए होंगे कि यह एक मुसलमान लड़के और एक हिंदू लड़की के लव और लव-मैरिज का किस्सा है. जिसे अपने ब्लॉग में शेयर किया है अंकिता अग्रवाल ने. अंकिता ने अपनी और फैज़ की शादी के किस्से को बड़े ही मोहक अंदाज में इस ब्लॉग में लिखा है.

सियासत के चश्मे से आप चाहे इसे जो नाम दे लें लेकिन कहानी पूरी फिल्मी है. इसे पढ़कर आप भी महसूस करेंगे कि इस जोड़े ने सच में प्यार के रास्ते पर चलते हुए हर रीति रिवाज को कुबूल किया है.

यह कहानी है फैज रहमान और अंकिता अग्रवाल की. इस कहानी में प्यार है... मोहब्बत है...गाना-बजाना-नाचना है...मेहंदी है...सात फेरे हैं....निकाह है...कसमें हैं...वादें हैं... गोवा का बीच है...रंग हैं....रोशनी है और सारे रीति-रिवाज हैं. इस शादी की तस्वीरें काफी कुछ बयान करती हैं.

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मंदिर में शादी अंकिता अग्रवाल और फैज़ (फोटो-नमित नारलावर)

मोहब्बत और 'जालिम जमाना'

अपनी इस प्रेम कहानी को अंकिता ने एक ब्लॉग में बयान किया है. वह बताती हैं कि यह पहली नजर का प्यार है. और ये नजरें मिलीं आईआईएम में एमबीए कोर्स के दौरान.

मोहब्बत तो हो गई, लेकिन 'जालिम जमाने' को कौन समझाए. अंकिता लिखती हैं कि उनके घरवालों की सबसे बड़ी चिंता तो यही थी कि मुसलमानों में चार शादियां करने की इजाजत होती है. ऐसे में किसी मुसलमान लड़के से शादी करना ठीक रहेगा? चार शादियां तो हुई, लेकिन चारों शादी फैज ने अंकिता से ही कीं.

अंकिता दो साल तक अपने पापा को मनाने की कोशिश करती रहीं. लेकिन बात बनी नहीं. फिर एक दिन अंकिता के बॉयफ्रेंड यानी फैज बिना बताए उनके घर पर आ धमके.

पापा हैरान और मां परेशान. मां को समझ ही नहीं आया कि अंदर जाकर चाय बनाएं या फिर फूट-फूट कर रोएं. बेटी को तो काटो तो खून नहीं. अंकिता बताती हैं कि सब चुप थे और सिर्फ फैज बोल रहे थे.

उन्होंने अपनी तरफ से खूब सफाई देने की कोशिश की कि शादी के बाद न तो मेरा धर्म बदलवाया जाएगा और न ही नाम. न मुझ पर नॉनवेज खाने का दबाव होगा और न ही उनके कल्चर को मानने के लिए कहा जाएगा.

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मुस्लिम रीति रिवाज़ से निकाह़ (फोटो-नमित नारलावर)

उन्होंने आगे इस बात का भी भरोसा दिया कि, 'न कोई मुझे बुरका पहनने को बोला जाएगा और न ही फैज कभी किसी और से शादी करेगा. लेकिन पापा का दिल नहीं पसीजा और एलान कर दिया कि अगर यह शादी हुई तो वह इसमें कभी शामिल नहीं होंगे.'

शादी और धूमधड़ाका

कोर्ट मैरिज के अलावा अब कोई रास्ता नहीं बचा था. तारीख तय हुई 18 फरवरी 2015. अंकिता के ससुराल वालों ने झटपट लखनऊ से मुंबई की हवाई टिकट बुक कर ली लेकिन उनके अपने माता पिता शादी में आने को तैयार नहीं हुए.

अंकिता जानती थीं कि उनके पापा भले ही डीडीएलजे के अमरीश पुरी की तरह पेश आ रहे थे लेकिन असल में वह इमोशनल डीडीएलजे के अनुपम खेर की तरह हैं. वह खुद तो शादी में आने को तैयार नहीं हुए लेकिन उन्होंने मां और भाई को आने की इजाजत दे दी थी.

सबने तय किया कि हम 17 तारीख को मंदिर में शादी कर लें. अच्छे से कपड़े पहने...दो वरमालाएं खरीदीं और एक छोटे से मंदिर में कर ली शादी. इसके बाद कोर्ट मैरिज हुई.

अंकिता कहती हैं कि शादी तो हो गई लेकिन शादी पर कोई धूमधड़ाका नहीं हुआ. मतलब सब कुछ फीका-फीका था. फैज और अंकिता अपने नाते रिश्तेदारों और करीबी दोस्तों के साथ किसी ऐसी जगह पर सेलिब्रेशन चाहते थे जहां खर्चा भी ज्यादा न हो और काम भी एक दम चकाचक हो.

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सी-बीच पर सात फेरे (फोटो-नमित नारलावर)

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मतलब फोटो और वीडियो भी दमदार आएं और मस्ती भी जमकर हो. वे चाहते थे कि जो भी उनकी शादी में आए तो उसकी जिंदगी की यह बेस्ट शादी होनी चाहिए.

बड़ी माथापच्ची के बाद तीन फंक्शन फाइनल हुए. पहला था मेंहदी, संगीत और उसके बाद निकाह यानी मुस्लिम रीति रिवाज से शादी. दूसरा, डीजे नाइट के साथ केक काटना और एक दूसरे को अंगूठी पहनाना और कसम-ए-वादे करना.

और तीसरा, 'सी-बीच' पर फेरे लेना यानी हिंदू रीति रिवाज से शादी.

काज़ी को किया राज़ी

कोर्ट मैरिज के महीने भर बाद गोवा में जश्न हुआ. निकाह की रस्म भी कम मजेदार नहीं थी. अंकिता की बड़ी इच्छी थी कि वह बोलें, 'कबूल है', लेकिन काजी ने उनसे यह कहलवाया ही नहीं. बस अंकिता के दस्तख्त को शादी के लिए रजामंदी मान लिया गया.

पर अंकिता को तो 'कबूल है' कहना था. किसी ने ये बात पर्दे के दूसरी तरफ बैठे फैज के कान में डाल दी. काजी साहब को मनाया तब कहीं जाकर अंकिता को कहने दिया गया, 'कबूल है'.

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अंकिता अग्रवाल और फैज़ संगीत के दौरान (फोटो-नमित नारलावर)

इसके बाद शाम को डीजे पार्टी का धमाल होना था. अंकिता लिखती हैं कि डांस फ्लोर पर तीन घंटे किस तरह बीत गए, किसी को पता ही नहीं चला. इसके बाद जो बात अंकिता के लिए हमेशा एक हसीन याद है, वह थी रात के एक बजे पुराने रोमांटिक फिल्मी नगमों को गुनगुनाते हुए बीच पर डिनर करना.

परांठे का प्यार और सिवईं की मिठास

अंकिता लिखती हैं कि इस धमाकेदार रात के बाद उन दोनों की जिंदगी की सबसे खूबसूरत और प्रतीक्षित सुबह आने वाली थी. बीच के किनारे सात-फेरे लेने वाली सुबह.

समंदर के किनारे दूल्हे राजा अपनी बारात के साथ घोड़ी या बग्गी पर नहीं बल्कि लंब्रेटा स्कूटर पर चढ़कर आए. फैज खुद लंब्रेटा चला रहे थे और उनके दोस्त ढोल की थाप पर नाच रहे थे.

फिर मंडप में अंकिता की एंट्री हुई. अजीम-ओ-शान तरीके से दुपट्टे के नीचे. अंकिता के मुताबिक, 'एक घंटे तक चले हंसी मजाक और 'रीति रिवाज' के बाद अब हर तरह से हमारी शादी पूरी हो चुकी थी.'

अंकिता लिखती है कि उन खूबसूरत लम्हों को अब दो साल हो चुके हैं और दोनों के परिवारों ने उनकी शादी को खुशी-खुशी कबूल कर लिया है. अंकिता के घर उन्हें घी से सराबोर आलू के परांठे मिलते हैं तो फैज के घर ऐसी सिवईं कि खाने वाला ऊंगलियां चाटता रह जाए.

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