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MH 04- 7554 की वो कहानी जो किसी पर ना गुजरे

मोपेड खो जाने में किसी की गलती नहीं है, न उसकी, न दोस्त की, न कबाड़ी वाले की और न ही चोरी करने वाले की

Pradeep Shadangule Updated On: Jun 04, 2017 02:31 PM IST

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MH 04- 7554 की वो कहानी जो किसी पर ना गुजरे

सत्रह साल की जिंदगी में, अपने ही घर जाते हुए कभी उसे इतनी घबराहट नहीं हुई थी. महसूस हो रहा था दिल सरक कर पेट में आ गया है. वो बाइक पर पीछे बैठे सर झुकाए भागती सड़क को ऐसे देख रहा था जैसे वो उसे मुसीबत से बचने का रास्ता बता रही हो. जिंदगी में 'अब किस मुंह से घर जाऊ' वाले हालत पैदा हो गए थे.

यूं देखा जाये तो गलती उतनी बड़ी थी नहीं जितनी कि साबित हुई. दरअसल अपने एक दोस्त के किसी काम से उसे कॉलेज जाना था. काम चूंकि दो ही मिनट का था इसलिए उसने मोपेड को... या कहना चाहिए... 'उस' मोपेड को, जो उसे जान से भी ज्यादा प्यारी थी, जो पिता ने आम सरकारी नौकरी की सीमित आय से पैसे बचा के बच्चों और पत्नी की बड़ी मुनव्वल के बाद खरीदी थी. जिसकी हालत तीनों भाइयों के बीच कुछ द्रौपदी की सी थी जिसपर यूं तो सबका हक था पर मिलती किसी को न थी. इसलिए मौका पाते ही हर कोई उसे उड़ा ले जाना चाहता था... को ताला नहीं लगाया था.

ताला न लगाने से मोपेड हुई चोरी

लौटकर देखा तो मोपेड गायब थी और तमाम हाय तौबा मचाने के बाद ये तय पाया गया की दोष चुराने वाले का उतना नहीं था जितना कि उसके ताला न लगाने का. अगर उस दिन मोपेड चोरी न हुई होती तो उसे कभी इस हरकत के गलती होने का अहसास भी न होता.

बहरहाल, वो ये जानता था की घर पर बड़ा भाई अपनी पारी के इंतजार में मोपेड की राह तकता होगा, और हुआ भी वैसा ही. दोस्त ने जैसे ही उसे घर के बाहर छोड़ा और उसने घर की दहलीज में कदम रखा, भाई उसपर चिढ़कर चिल्लाया- 'तुझे कहा था 6 बजे तक आने को, मुझे जाना था...'.

Moped

वो पहले ही से झुका हुआ सर लेकर बिना कोई जवाब दिए अंदर चला गया. पिताजी ऑफिस से बस लौटे ही थे और चाय पीते हुए न्यूज देख रहे थे. वो बुत की तरह उनके सामने जाकर खड़ा हो गया. भाई भी तब तक अंदर आ गया था. चेहरे की संजीदगी को भांपते हुए पिताजी ने पूछा- क्या हो गया?

किसी रिकार्डेड मैसेज की तरह वो पूरा किस्सा भावनाहीन होकर सुनाने लगा. सुनकर पिताजी अपनी जगह से खड़े हुए. उसे पता था की पिटाई पक्की है बल्कि आज तो वो चाहता था कि उसकी पिटाई हो जाये ताकि जो ग्लानी उसका खून सुखाए दे रही है उससे तो राहत मिले. मगर ऐसे हालातों के लिए पिताजी का तजुर्बा उसके अंदाजे से कहीं ज्यादा था. उन्होंने सिर्फ पूछा – ताला लगाया था?

इनकार में सिर हिलाने पर, अफसोस की मुस्कराहट लेते हुए पिताजी ने टीवी बंद किया और चुपचाप निकल गए. भाई भी गुस्से से दरवाजा पटकते हुए बाहर निकल गया. इस से बड़ी सजा उस गलती की नहीं हो सकती थी. अब पश्चाताप में घुलने के अलावा कोई रास्ता न था.

मोपेड खोज लेने तक चैन से नहीं बैठेगा

पिताजी की डांट या झापड़ किसी माफी से कम न थी पर चुपचाप रहकर उन्होंने इतना आहत किया कि उससे रोते भी न बना. मन ही मन उसने भी अपनी शिखा पर गठान लगाई और निश्चय किया कि वो तब तक चैन से नहीं बैठेगा जब तक मोपेड खोज नहीं लेगा.

अब तक की जिंदगी में जरा सी वाकफियत के हर आदमी से उसने मदद ली. पुलिस स्टेशन के संतरी से लेकर राज्य के मंत्री तक हर आदमी से पहचान निकाली गई. कहीं इल्तिजा तो कहीं रुतबा दिखाकर काम की अहमियत समझाई गई.

शहर का हर चौराहा, हर सड़क, सिनेमा हॉल, मार्केट, कॉलेज, स्कूल, उस इलाके के दोस्तों की टोली कड़ी नजर रखने लगी. शायद ही जान-पहचान का कोई बचा होगा जिसे मोपेड का नंबर याद न हो. किसी ने मोपेड का मिलना चुटकियों का काम बताया तो, किसी ने ढूंढने के जतन सुझाये, किसी ने सिर्फ अफसोस जताया. तो किसी ने साथ चलकर चक्कर भी लगाये.

वो रोज एक बार पुलिस हेडक्वार्टर, कॉलेज और मार्केट का चक्कर लगा आता. कई दिनों की मशक्त के बाद उम्मीद तो थी कि मोपेड मिल जाएगी पर कैसे? इसकी कोई सूरत दिखती न थी.

दूसरी ओर घर में समय के साथ मोपेड के जाने का दुख कम हो चला था. भाई भी उसकी हालत देखकर थोड़े नर्म पड़ गए थे. उसे न खाने की सुध थी न सोने की, बस कोई फोन आता वो भड़भड़ाकर बाहर निकल जाता. मां को उसकी परवाह होने लगी थी. उसका घुलना वो समझती थी. दो महीने बाद इम्तिहान है अगर गड़बड़ हो गयी तो साल का हर्जाना हो जायेगा.

Number Plate

भारत भर में हर दिन हजारों की संख्या में टू व्हीलर गायब या चोरी हो जाते हैं

मोपेड तलाशने में न संतरी काम आया, न मंत्री

मां ने पिताजी से उसे समझाने को कहा. पिताजी की समझाइश उसे मीठी लगी. जब उन्होंने कहा कि इतनी जान हलकान करने की जरुरत नहीं मोपेड फिर आ जाएगा, तो उसे लगा उन्होंने माफ कर दिया. सच तो ये है की उसकी सारी कोशिशें बेकार हो चुकी थीं. न संतरी काम आया न मंत्री. मन ही मन वो भी शिखा की गठान खोलने का मन बना चुका था इसलिए पिताजी की सलाह को हुक्म समझ वो पुरानी रोजमर्रा की जिंदगी में मशगूल हो गया.

यूं कई दिनों तक सड़क पर चलते हुए उसकी निगाह हर मिलती-जुलती मोपेड की नंबर प्लेट पर बरबस चली जाती. पर धीरे-धीरे गम गठान में बदल गई और दर्द बंद हो गया.

फिर किसी रोज वो उसी दोस्त के साथ उसी कॉलेज जा रहा था कि रास्ते में उसकी आंखों ने कुछ जाना-पहचाना मगर सरसरी तौर पर दर्ज किया. उसने अपने दोस्त को चीखकर स्कूटर रोकने को कहा. इससे पहले की दोस्त कुछ समझता और संभलता वो चलती स्कूटर से भरे ट्रैफिक में कूद गया और बदहवास दौड़ने लगा.

गाड़ियों से बचते-बचाते वो फुटपाथ के किनारे एक कबाड़ की दुकान पर जाकर रुका. तराजू पर तोली जा रही अपनी मोपेड की नंबर प्लेट को झटके से उठाकर देखने लगा. अपनी आखों पर उसे यकीन नहीं हो रहा था... ये उसी की मोपेड की नंबर प्लेट थी MH 04 - 7554. एक झटके से उसने कबाड़ी वाले को कॉलर से पकड़ कर उठा लिया- बोल मोपेड कहां है?

कबाड़ी वाला इसके लिए तैयार न था. लड़खड़ाती जुबान से हैरत में बोला- मोपेड?? कौन सी मोपेड?. साले, बताऊं अभी... जेल करवा दूंगा. कहते हुए कबाड़ीवाले को मारने के लिए उसका हाथ उठा ही था कि बीच-बचाव को दोस्त आ गया. हाथ थामकर बोला- क्या हो गया?? पागल हो गया क्या!!!

Kabadiwala

कबाड़ीवालों के यहां अक्सर लोग अपना पुराना और खराब सामान बेच जाते हैं

कबाड़ी वाले के पास मिला मोपेड का नंबर प्लेट

'अरे ये देख' उसने नंबर प्लेट हाथ में लेते हुए कहा- साला मोपेड बेच खाया. सुताई होगी अच्छे से तो सब उगल देगा. कबाड़ीवाला जो अब तक कुछ हालात समझने की गफलत में और कुछ गुस्से के चलते चुप था अचानक फूट पड़ा- देखो भाईसाब, ऐसा है हमारा काम है कबाड़ी का... दिन में पचासों लोग माल लाकर बेचते है... और सैकड़ों ले जाते हैं. हम किसी का पैन कार्ड तो लेते नहीं जो बता दें नेम प्लेट कहां से आई है. इसलिए उल्टा-सीधा तो आप बोलो नहीं. हां, ये है कि आपका बहुत तकलीफ हो रही हो तो 20 की जगह 10 दे दो और ले जाओ. और जो अगर अब भी न समझ आए बात तो बोलो किस थाने में चलना है... हम तैयार हैं.

सिर पर पड़ती तेज धूप, कबाड़ीवाले के माथे से टपकता पसीना, दोस्त के चेहरे की झुंझलाहट और हाथ में पकड़ी नंबर प्लेट देखकर वो समझ गया कि बात अब खत्म हो चुकी है. दरअसल उसकी मोपेड खो जाने में किसी की गलती नहीं है, न उसकी, न दोस्त की, न कबाड़ी वाले की और न ही चोरी करने वाले की.

उसने कबाड़ी वाले को दस रूपये दिए और स्कूटर की तरफ बढ़ चला. उसका मन गहरी नाउम्मीदी और उथली तसल्ली के बीच कुछ ऐसे झूल रहा था जैसे उसकी उंगलियों के बीच नंबर प्लेट.

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