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इंटरनेट, स्मार्टफोन के हमले ने उजाड़ी लुगदी साहित्य की दुकान

ग्लोबलाइजेशन के बाद सीडी, इन्टरनेट, स्मार्टफोन और सैटेलाइट टीवी के हमलों के आगे लुगदी टिक नहीं पाई.

Rajan Pandey | Published On: Jan 14, 2017 08:49 AM IST | Updated On: Jan 14, 2017 08:49 AM IST

इंटरनेट, स्मार्टफोन के हमले ने उजाड़ी लुगदी साहित्य की दुकान

लुगदी की एक बड़ी खूबी थी कम दामों में आसान मनोरंजन. फिर चाहे वो अपराध कथाएं हो, आंसुओं में डूबी प्रेम कहानी हो, तांत्रिकों और पिशाचों के रूह सिहराते किस्से हों या सुहागरात-सेक्स स्कैंडल्स की गरमा गरम कहानियां. सस्ते कागज पर छपने के कारण इन किताबों की कीमत कम होती थी.

इस वजह से दफ्तरी वर्ग और मजदूर तबके के आदमी-विद्यार्थी, गृहणियां आदि भी जेब पर बिना ज्यादा बोझ डाले इन्हें खरीद सकते थे. 1990 के दशक तक सिर्फ 20 से 30 रुपए में 200 से  400 पेजों की ये किताबें उपलब्ध हो जाती थी.

वहीं बेहतरीन कहा जाने वाला साहित्य इससे कहीं ज्यादा महंगा था. इसके अलावा पढ़ने के बाद इन्हें आधे दाम पर आसानी से उसी दुकान को बेचा जा सकता था जहां से इन्हें आपने खरीदा हो.

 

pulp literature

तस्वीर: विशी सिन्हा

छोटे कस्बों में दो-चार ऐसी दुकानें भी हुआ करती थीं, जहां से इन किताबों को रुपए-दो रुपए में किराए पर लाकर पढ़ा जा सकता था. ए एच वीलर के जरिए देश भर के रेलवे स्टेशनों पर ये किताबें सहज उपलब्ध थी.

कुल मिलाकर लेखक से पाठक तक, प्रकाशक और किराए पर देने वालों बुकसेलर्स वगैरह की एक पूरी चेन थी जिसमें लुगदी साहित्य का व्यापार फल-फूल रहा था.

अपने ही घर में ही बेगानी हुई लुगदी

कपड़ों के संदर्भ में जो रुतबा एक समय कानपुर और मैनचेस्टर का था, लुगदी साहित्य के व्यापार में वही रुतबा मेरठ का था. यहां के दर्जनों प्रकाशक लुगदी पर लाखों किताबें छापते थे.

ग्लोबलाइजेशन के बाद सीडी, इंटरनेट, स्मार्टफोन और सैटेलाइट टीवी के हमलों के आगे लुगदी टिक नहीं पाई. सस्ता मनोरंजन पाने के लिए लुगदी का मुंह ताकने की जरूरत खत्म हो गई.

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आज उसी मेरठ में सिर्फ दो प्रकाशक रवि पॉकेट बुक्स और धीरज पॉकेट बुक्स बचे हैं. ये आज भी लुगदी उपन्यास छाप रहे हैं. रवि पॉकेट बुक्स के मनेश जैन बताते हैं, ‘पहले कम से कम दस हजार के एडिशन छपते थे, आजकल सिर्फ 1100 के एडिशन ही छापे जाते हैं. फिर दाम बढ़ने के कारण आजकल लुगदी किताबें भी 70-80 रुपये में बिक रहीं हैं. इससे सस्ता होने का उनका 'समय' भी खत्म हुआ है.’

वे आगे कहते हैं, ‘पाठक कम हुए तो प्रकाशक भी कम हो गए. वीलर वालों के भी ऑर्डर घट गए हैं. पहले सैकड़ों में उपन्यास लेते थे आजकल दर्जनों ही लेते हैं. कई बुक सेलर्स भी लुगदी उपन्यास छोड़ के कंपीटिशन की किताबें बेच रहे हैं.’

‘डूडलिट’ बनाम ‘लुगदी’

हिंदी के लोकप्रिय साहित्य को तो लुगदी कहकर दुत्कारा गया लेकिन अंग्रेजी के लोकप्रिय लेखन को ज्यादा इज्जत हासिल है.

दिल्ली में एक सॉफ्टवेयर फर्म चला रहे शरद श्रीवास्तव कहते हैं, ‘यूं तो चेतन भगत, अभिजीत भादुड़ी जैसे लोकप्रिय लेखकों की किताबों को भी मुख्य धारा के 'साहित्य' में गिना नहीं जाता है. लेकिन उनकी किताबें लोग गर्व से प्लेन में और ट्रेन के वातानुकूलित डिब्बों में पढ़ते मिल जाएंगे. लेकिन इन्हीं जगहों पर लुगदी पढ़ने में लोग शर्म महसूस करते हैं. हमारी गुलाम मानसिकता के कारण हमारे भीतर ये समझ बन गई कि अंग्रेजी में कोई किताब है तो अच्छी ही होगी.’

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अंग्रेजी में 'लोकप्रिय' लेखन का एक नया 'ट्रेंड' शुरू करने वाले चेतन भगत के उपन्यासों में मध्यवर्गीय छात्रों की दुनिया का लेखाजोखा होता है. जिसमें इंजीनियरिंग या मैनेजमेंट कॉलेज, हॉस्टल की जिंदगी, प्रेम प्रसंग, नौकरी की जद्दोजहद के हलके फुल्के किस्से होते हैं.

चेतन भगत

चेतन भगत  को लोकप्रिय अंग्रेजी साहित्या का लेखक माना जाता है

आज के दौर में कई और लेखकों ने भी इससे मिलते जुलते उपन्यास लिखे हैं, जो इंजीनियरिंग-मैनेजमेंट के छात्रों में काफी लोकप्रिय हुए. चेतन भगत के उपन्यासों 'फाइव पॉइंट समवन' और 'टू स्टेट्स' पर फिल्में बनने के बाद तो इस तरह के उपन्यासों और लेखकों की बाढ़ आई हुई है.

अंग्रेजी हलकों में इस तरह की किताबों को 'चिकलिट' या 'डूडलिट' की संज्ञा दी जाती हैं.

आईपीआर एक्सपर्ट और लुगदी साहित्य के फैन विश्वरंजन सिन्हा कहते हैं, 'इनमें से कई किताबें तो 'लुगदी' कहकर दुत्कारे जाने वाले उपन्यासों के मुकाबले बेहद कमजोर हैं. लेकिन अंग्रेजी में होने भर के कारण ज्यादा ऊंची निगाह से देखे जाते हैं.'

सुरेंद्र मोहन पाठक इसी 'भाषायी छुआछूत' पर तंज कसते हुए कहते हैं, 'मैंने 300 से ज्यादा किताबें लिखीं लेकिन जब तक मेरे उपन्यासों का अंग्रेजी अनुवाद नहीं हुआ था, तब तक मुझे इतनी इज्जत नहीं दी गई थी.'

लुगदी से वाइट पेपर तक

पिछले कुछ सालों में हिंदी में लोकप्रिय लेखन के लिए नए अवसर बने हैं. जहां एक और वेद प्रकाश शर्मा और अनिल मोहन जैसे लेखक लुगदी कागज से हटकर सफेद पेपर पर छपने लग गए हैं. वहीं हार्पर कॉलिंस जैसे बड़े प्रकाशक सुरेंद्र मोहन पाठक के उपन्यास छाप रहे हैं.

इनके प्रिंट रन 15 हजार या अधिक के होते हैं. अमेजन के ऑनलाइन सर्वे में सुरेंद्र मोहन पाठक के उपन्यासों को 2014 और 2016 में 'साल की बेस्ट रीड' घोषित किया गया.

पिछले सालों में ही हिन्द युग्म प्रकाशन ने सत्या व्यास की 'बनारस टाकीज' छापी. यह मोटे तौर पर 'डूडलिट' बिरादरी का ही उपन्यास है और इसकी कई हजार प्रतियां बिकीं. कुल मिलकर हिंदी का बाजार 'लोकप्रिय लेखन' के लिए खुद को तैयार कर रहा है, मगर लुगदी की दुकान उजड़ चुकी है.

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