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लुगदी साहित्य का जादुई संसार

इन किताबों को शरीफ परिवारों में अच्छा नहीं माना जाता. पर ये किताबें दिखती कम हैं और बिकती ज्यादा हैं.

Rajan Pandey | Published On: Jan 07, 2017 03:57 PM IST | Updated On: Jan 07, 2017 11:21 PM IST

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लुगदी साहित्य का जादुई संसार

‘दहेज में रिवॉल्वर’, ‘डायन’, ‘बीवी का नशा’, ‘छह करोड़ का मुर्दा’ जैसी मोटी-ताजी भड़कीली किताबों ने हिंदी पट्टी के रेलवे स्टेशनों, बस स्टैंड से गुजरते  हुए आपकी भी निगाह खींची होगी.

जो इन्हें नहीं जानते वो इन्हें हिकारत की नजर से देखते हैं. पर इन्हें हलके में ना लें, ये इस तरह के साहित्य को अंग्रेजी में रचने वाले 'हिट' लेखक चेतन भगत की सारी किताबों को मिलाकर आई संख्या से चार पांच गुना ज्यादा बिकती है.

इन किताबों को शरीफ परिवारों में अच्छा नहीं माना जाता. पर ये किताबें दिखती कम हैं और बिकती ज्यादा हैं.  इन किताबों को छुपकर पढ़ते हुए सिर्फ हमें ही नहीं, बल्कि हमारी कई बुजुर्गवारों को भी उनके पिता और चाचाओं की मारपीट गाली-गुफ्तार का सामना करना पड़ा है.

ये साहित्य की कौन सी बला है ? 

कईयों को ‘पढ़ने का चस्का’ लगाने वाली ये किताबें, किसी भी भाषा के लिए पाठक वर्ग तैयार करने का काम करती हैं.

रिसाइकल्ड पेपर यानि लुगदी कागज पर छपने की वजह से इसे ‘लुगदी साहित्य’ कहा जाता है.

इन किताबों में सिर्फ अपराध और जासूसी ही नहीं, बल्कि भूत-प्रेत, शिकार, प्यार और सेक्स से जुड़ी कहानियां भी होती हैं.

सम्मानित हिंदी साहित्य के जलवेदार आलोचकों के ‘फरमे’ में फिट न आने के कारण इस पूरे साहित्य को ही ‘लुगदी’ या ‘लोकप्रिय साहित्य’ कहकर मुख्य साहित्य से खारिज कर दिया गया है.

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तस्वीर: विशी सिंहा

लेकिन सस्ते दाम, भरपूर मनोरंजन और सरल भाषा के चलते ये किताबें आम पाठकों के बीच हमेशा पॉपुलर रही हैं. मजदूरों, कामकाजी-नौकरीपेशा लोगों से लेकर छात्र-छात्राओं और गृहणियों के बीच इनकी एक जैसी लोकप्रियता है.

इन किताबों में कर्नल रंजीत और रिपोर्टर सुनील के जासूसी कारनामे, बैंक डकैतियों, हत्याओं, जिस्म का इस्तेमाल कर के दुश्मनों को धूल चटाने वाली बालाओं, मोहब्बत के लिए जान देने वाले प्रेमियों और खजाने की तलाश में लगे खोजियों का जगमगाता संसार होता है.

अपराध साहित्य का झंडा हर ओर बुलंद 

लोकप्रिय या लुगदी साहित्य पर नाक-भौं सिकोड़ने वाले अक्सर भूल जाते हैं कि आज की हिंदी को प्रसिद्धि एक लोकप्रिय रचना, बाबू देवकी नंदन खत्री की 'चंद्रकांता' से मिली थी.

1888 में आई इस  किताब की इतनी चाहत फैली थी कि बहुत से हिंदी ना जानने वालों ने सिर्फ इस किताब को पढ़ने के लिए हिंदी सीखी.

चंद्रकांता ने 20वीं सदी के शुरुआती दशकों में तिलिस्म और अय्यारी का ऐसा जादू बुना कि हिंदी के सबसे चर्चित कथाकार प्रेमचंद ने भी शुरुआत इन्हीं थीम पर कहानियां लिखने से की थी.

अपराध साहित्य की लोकप्रियता हिंदी तक ही सीमित नहीं है. मराठी में अपराध और फंतासी कहानियां लिखने वाले रत्नाकर मतकरी का दर्जा किसी सेलेब्रिटी से कम नहीं है.

मतकरी की कुछ कहानियों का हिंदी अनुवाद करने वाले मुबारक अली बताते हैं, 'एक ही साल में उनकी हर कहानी संग्रह के कई-कई संस्करण लाने पड़ते हैं, क्योंकि पहला संस्करण देखते ही देखते बिक जाता है. आखिर में पाठक को शॉक देना उनकी कथा की खासियत है.'

वहीं, बांग्ला में भी अपराध साहित्य की समृद्ध परंपरा रही है. सत्यजीत रे जैसे प्रसिद्ध फिल्मकार ने बच्चों के लिए ‘फेलुदा’ किरदार की रचना की थी. जो बच्चों और बड़ों दोनों में सामान रूप से लोकप्रिय हुआ. इस पर कई फिल्में भी बनीं.

शरदेंदु बंधोपाध्याय के 'ब्योमकेश बक्षी’ की आज भी भारतीय अपराध लेखन में खास जगह है. इसके अलावा तमिल और मलयालम में भी लुगदी साहित्य का बोलबाला रहा है.

दुनिया में सबसे ज्यादा उपन्यास लिखने का रिकॉर्ड भी तमिल लुगदी साहित्य लेखक राजेश कुमार के नाम है. इन्होंने अब तक 1500 से ज्यादा उपन्यास लिखे हैं.

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एक शर्त जिसने दिया रिकॉर्ड तोड़ राइटर

चंद्रकांता के बाद, आजादी के बाद के दौर में जासूसी साहित्य का जलवा कायम रखने वाले लेखक थे, इलाहाबाद में जन्मे असरार अहमद. इन्हें इनके पेन नेम इब्ने सफ़ी के नाम से जाना जाता है.

इलाहाबाद से छपने वाली नखत पत्रिका में उर्दू व्यंग्य लिखने से शुरुआत करने वाले इब्ने सफ़ी का अपराध लेखन में आना भी एक संयोग ही था.

कहते हैं किसी दोस्त ने उनसे शिकायत की थी कि उर्दू में अपराध साहित्य बिना सेक्स के तड़के के नहीं लिखा जा सकता. इस बात को गलत साबित करने के लिए उन्होंने ‘दिलेर मुजरिम’ उपन्यास लिखा जो पाठकों में हिट हो गया.

उसके बाद इब्ने सफ़ी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा. सफ़ी की ‘जासूसी दुनिया’ सीरीज में 100 से भी ज्यादा उपन्यास हैं. जबकि दूसरी, ‘इमरान सीरीज’ के तहत भी सैकड़ों उपन्यास छपे.

उर्दू में लिखने वाले इब्ने सफ़ी की किताबें सिर्फ हिंदी ही नहीं, बल्कि बंगला और अन्य भारतीय भाषाओं में भी अनुवादित करके पढ़ीं जाती थीं. अपनी बढ़ती लोकप्रियता के बीच 1950 के दशक में ही वो पाकिस्तान चले गए.

महमूद फारुख़ी के अनुसार, 'इब्ने सफ़ी मजदूरों और कम पढ़े-लिखे लोगों में बहुत लोकप्रिय थे. दोपहर को काम की छुट्टी के बीच कोई एक पढ़ सकने वाला व्यक्ति किताब बांचता और बाकी सब घेरा बनाकर बैठकर उसे सुनते.'

इब्ने सफ़ी के सुपरहीरो 

सफ़ी की रचनाओं में अगर कर्नल फ़रीदी, कप्तान हामिद और इमरान जैसे जांबाज, मुल्क्परस्त सीक्रेट एजेंट और जासूस हैं तो सिंह ही, डॉक्टर क्यू, टीथ्रीबी और प्रोफेसर बोगा जैसे सुपर विलेन भी.

उनकी सीक्रेट सर्विस के ये किरदार इन खलनायकों की तलाश में यूरोप, अफ्रीका और एशिया ही नहीं बल्कि शकराल, जीरोलैंड और मकराल जैसे काल्पनिक देशों की खाक भी छानते थे.

सफ़ी की कल्पना इन देशों और व्यक्तियों का असली लगने वाला ऐसा ताना-बाना बुनती कि पढ़ने वाला हैरान रह जाता था. उनके कई प्रशंसकों का मानना है कि मोगैंबो, शाकाल जैसे विलेन सफ़ी के रचना संसार से प्रेरित हैं.

मशहूर शायर फ़रहान अख्तर और पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम के जनक अब्दुल कादिर ख़ान भी सफ़ी के प्रशंसकों में शामिल रहे हैं.

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