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कमलसी प्राना का दर्द 'मैं लेखक के तौर पर जीना नहीं चाहता'

कमल सी चवारा ने न सिर्फ अपनी किताब वापिस लेने बल्कि उसे सार्वजनिक रूप से जलाने की बात कही है.

FP Staff | Published On: Jan 13, 2017 11:39 AM IST | Updated On: Jan 13, 2017 11:44 AM IST

कमलसी प्राना का दर्द 'मैं लेखक के तौर पर जीना नहीं चाहता'

साल 2015 में चर्चित हुए तमिल लेखक पेरुमल मुरुगन मामले की याद कराते हुए ऐसा ही एक मामला सामने आया है. ये घटना भी दक्षिण में ही हुई है, जहां एक मलयाली लेखक पर अपने उपन्यास में राष्ट्रीय गीत का अपमान करने आरोप लगा है.

इस आरोप के बाद लेखक कमल सी चवारा ने न सिर्फ अपनी किताब वापस लेने बल्कि उसे सार्वजनिक रूप से जलाने की बात कही है.

एक बहुत ही भावुक करने वाले फेसबुक पोस्ट में, लेखक और नाटककार चवारा ने कहा कि, 'जब से वे पुलिस हिरासत से रिहा हुए हैं तब से इंटिलिजेंस के लोग उनके परिवार को परेशान कर रहे हैं.' उन्होंने ये भी कहा कि वे अब लेखक के तौर पर काम नहीं करना चाहते हैं.

तमिलनाडु में कमल को आमतौर पर लोग कमलसी प्राना के नाम से जानते हैं. उनके खिलाफ ये शिकायत बीजेपी की युवा मोर्चा की तरफ से की गई थी.

हिरासत में लिए गए कमल चवारा

पुलिस ने बीते 18 दिसंबर को कमलसी को हिरासत में लिया था, उनपर आईपीसी की धारा 124(ए) के तहत कोजिकोड से केस दर्ज की गई थी. कमलसी के खिलाफ ये शिकायत तब की गई जब उन्होंने फेसबुक पर अपने उपन्यास समासनांगलुडे नोट्टुपुस्तकम का एक हिस्सा फेसबुक पर डाला था.

उन्होंने ऐसा सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले के विरोध में लिखा जिसके अनुसार सिनेमा हॉल में राष्ट्रगान बजाना जरूरी किया गया है. युवा मोर्चा का दावा था कि कलमसी के इस पोस्ट से राष्ट्रगान का अपमान हुआ था.

हालांकि, पुलिस ने बाद में उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों को निरस्त करते हुए उन्हें रिहा कर दिया था.

2015 में भी तमिल लेखक पेरुमल मुरुगन को दक्षिणपंथी ताकतों के सामने झुकना पड़ा था

2015 में भी तमिल लेखक पेरुमल मुरुगन को दक्षिणपंथी ताकतों के सामने झुकना पड़ा था

लेकिन अपनी ताजा पोस्ट में कमलसी ने लिखा है, ‘मेरी मां और पिता दोनों ही हृदयरोग के मरीज हैं, मेरा भाई ठीक से सुन और बोल नहीं पाता और उसका पूरा परिवार मेरे कारण मुसीबत में फंस गए हैं. मैंने जब से जन्म लिया है तब से उनके लिए मुसीबत कारण बन गया हूं. मेरे खिलाफ राष्ट्रद्रोह के आरोपों को अभी तक हटाया नहीं गया है.’

वे आगे लिखते हैं, ‘मुझे लगातार धमकी भरे फोनकॉल्स आ रहे हैं. मैं अब लेखक के तौर पर जीना नहीं चाहता. उनके मुताबिक उन्होंने अपने प्रकाशक ग्रीन बुक्स से कह दिया है कि वे बाजार से किताब हटा लें.’

कलम सी चवारा के अनुसार, ‘अपनी सारी गलतियों को मानते हुए मैं परसों अपनी सारी किताबों को लोगों के सामने रखकर जला दूंगा.’ उन्होंने लोगों से अपील की, कि वे उन्हें उनके इस निर्णय के लिए माफ करें और उनका साथ भी दें.

हालांकि, उनके दोस्तों और हितेषियों ने फेसबुक में ही उनके विनती की है कि वे अपने इस फैसले पर फिर से विचार करें. फर्स्टपोस्ट की लाख कोशिशों के बाद भी हम उनसे या उनके प्रकाशक से संपर्क करने में नाकाम रहे.

पेरुमल मुरुगन की याद 

ताजा घटना तमिलनाडु में साल 2015 में हुए पेरुमल मुरुगन मामले की याद कराता है जब इस लोकप्रिय लेखक को अपने उपन्यास माधुरोबगन का अनुवाद ‘वन पार्ट वुमन’ को बाजार से वापिस लेना पड़ा था. उन्हें ये कदम हिंदूत्व और जातिवादी ताकतों के विरोध प्रदर्शनों के बाद उठाना पड़ा था.

इस सब से क्षुब्द होकर उन्होंने फेसबुक में लिखा था, ‘लेखक पेरुमल मुरुगन मर चुका है.’

इस किताब को बाजार से हटाने का फैसला मुरुगन ने तब लिया जब उन्हें तमिलनाडु के नामक्कल जिले के रेवेन्यू अफसर वी आर सुब्बुलक्ष्मी के साथ एक मीटिंग के लिए बुलाया गया था.

हालांकि, जुलाई 2016 में मद्रास हाईकोर्ट ने मुरुगन के खिलाफ दायर एक क्रिमिनल केस को निरस्त कर दिया था. कोर्ट ने ये भी कहा कि 2015 में जिला अधिकारियों के साथ जिस बैठक के लिए मुरुगन को बुलाया गया था उसे मानने के लिए वो बाध्य नहीं हैं.

कोर्ट के इस आदेश से मुरुगन को एक बार फिर से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार हासिल हुआ.

ये ध्यान देने वाली बात है कि कमल सी चवारा का ये चौंकाने वाला फैसला तब आया जब राज्य के मुख्यमंत्री पिनारयी विजयन ने खुलकर कहा कि, ‘संघ के कार्यकर्ता चवारा को मुसलमान देशद्रोही के रुप में चिन्हित करने की कोशिश कर रहे हैं.’

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