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कानपुर की चउचक कहानियां: कमलापसंद रिटर्न्स

'उषा ने राजेश के दिमाग में उम्मीद की ऐसी चरस बो दी कि वो फिर से कलप गया...'

Nikhil Sachan | Published On: May 19, 2017 12:41 PM IST | Updated On: May 19, 2017 12:41 PM IST

कानपुर की चउचक कहानियां: कमलापसंद रिटर्न्स

'उषा हमने तुम्हाए लिए गुटका छोड़ दिया. तुमने बोला था कि बाबू कमलापसंद छोड़ दोगे तो चुम्मी लेने देओगी. महीना बीत गया. तलब इतनी होती है कि हमें चक्कर अलग आते हैं. कम से कम चुम्मी तो ले लेने देओ', राजेश ने उषा के चेहरे को हथेली के बीच किताब के तरह पलटते हुए, कातर आवाज में, दुहाई दी.

'अभी नहीं. कोई आ जाएगा तो', उषा ने बिदकते हुए कहा.

'अरे कोई आ जाएगा तो क्या! आठ घंटे से बत्ती नहीं है कछु दिखेगा भी नहीं अंधेरे में. उषा हमाए त्याग की कुछ तो कदर करो. हम सादा तलब तक नहीं खाए हैं. चुप्पे से खा लेते तो तुमको पता भी नहीं चलता और सादा तलब तो गुटका भी नहीं होता है.'

'सच्ची बाबू'?

'हां और नहीं तो क्या!'

'अच्छा ठीक है', उषा ने शरमाते हुए आंखें बंद कर ली. राजेश ने भी आंखें बंद कर लीं और उसने अपने जीवन का पहला चुंबन चखा. जैसे उसने अपने जीवन का पहला कमलापसंद चखा था. और वो बावला हो गया. कपार की चोटी तक नशा फैल गया. जैसे किसी ने कटिया मार दी हो. करंट चढ़ गया. राजेश बेक़ाबू हो गया.

‘हाय दैय्या मुह नोच लिया ! मुह नोच लिया’, उषा दर्द से ज़ोर से चीख़ उठी. वो इतनी ज़ोर से चिल्लाई थी कि नीचे से घरवाले उठ कर छत की ओर भागे. राजेश डर कर दफ़ा हो गया.

‘क्या हो गया उषा’, भाई और ताऊ चीखे.

‘हाय दैय्या मुह नोच लिया’, उषा मुह पकड़े पछाड़ खा रही थी.

‘मुह नोचवा’?

‘मुह नोच लिया’

‘मुह नोचवा’?

उषा ने मुह नोच लिया कहा था. लेकिन ताऊ जी ने मुह नोचवा सुना. डर और लाज के मारे उषा ने मनगढ़ंत कहानी रच दी और कह दिया कि कोई अजीब सा कीड़ा था. बड़ा भयानक सा. अगले दिन मोहल्ले भर में हल्ला मच गया कि मुहनोचवा नाम का कोई कीड़ा है जो रात में काट लेता है.

दैनिक जागरण, अमर उजाला और आज में 6*3 के छोटे से कॉलम में खबर भी आई - ‘बर्रा 2 निवासी, उषा, सुपुत्री राधेश्याम मिसिर को देर रात 1 बजे मुहनोचवा नाम का कीड़ा काट गया’. खबर पढ़कर राजेश की आत्मा किलस गई. वो अन्दर तक कलप गया और उसने रिरियाते हुए उषा को फोन लगाया -

‘उषा हम कीड़ा हैं? मुहनोचवा हैं?’

‘सॉरी बाबू. मैं डर गई थी. मुह पर काटने का निशान बन गया था. क्या बोलती’

‘हमारी पहली चुम्मी थी उषा. उसका मखौल बन गया’

‘अरे हम बोले थे - मुह नोच लिया - वो लोग सुने मुहनोचवा. सॉरी बाबू माफ कर दो. आज फिर आ जाओ’

‘आज कैसे आएंगे. कल इत्ता मुश्किल में पाइप चढ़ कर छत पर आए थे. पैंट की सिलाई अलग उधड़ गई है. बकरम खुल गया है’

‘अरे लोअर पहन कर आ जाओ. जैसे भी आ जाओ. बाबू आज आओगे तो पछताओगे नहीं.’

उषा ने इतना कह के राजेश के दिमाग में उम्मीद की ऐसी चरस बो दी कि वो फिर से कलप गया. उसके दिमाग का टैम्पू दौड़ता रहा, सोचता रहा. रात होने का इंतज़ार करने लगा. अंधेरा होते ही उषा के मोहल्ले गया और मोहल्ले के आखिरी घर के पीछे जाकर चीखा - ‘मुहनोचवा ! मुहनोचवा !’ सारा मोहल्ला टॉर्च और डंडा लेकर आखिरी घर की तरफ भगा. राजेशा उषा के घर की तरफ भगा. पाइप चढ़ कर छत पर आ गया.

‘उषा! मम्मी कसम अब आज तो अच्छी वाली चुम्मी लेकर रहेंगे’, राजेश होंठ हथेली से रगड़ते हुए बोला.

‘हे भगवान ये मोहल्ले वाले लोग इतनी जल्दी मान भी गए’, उषा शरमाते हुए बोली.

‘ये कानपुर है उषा. यहां आदमी गणेश जो की मूर्ति को रात भर दूध पिलाने की बात सच मान लिया. हिमेश रेशमिया के ‘तेरा सुरूर’ की कैसेट उल्टा चला देने से चुड़ैल आ जाने की बात को सच मान लिया. फिर ये तो उससे भी बड़ी बात है’

‘तुम कितने इंटेलिजेंस हो बाबू’

‘हमारा चुम्मा’?

‘हम्म’, उषा ने कहा और अपना गाल आगे बढ़ा दिया.

अगले दिन एक-एक अखबार में मुहनोचवा की खबर थी. मुहनोचवा नेशनल न्यूज बन गया. किसी ने उसे कीड़ा बताया, किसी ने एलियन, किसे ने बंदर बताया तो किसी ने चमगादड़. दो-एक महीने लोग मुहनोचवा की गुत्थी सुलझाते-उलझाते रहे और कसम कमलापसंद की, आज तक कोई ये बात नहीं जान पाया कि मुहनोचवा राजेश की चुम्मी की उपज था. जब तक मुहनोचवा का डर और हल्ला रहा, राजेश मोहल्ले के किसी कोने से हल्ला मचाकर भीड़ को उधर भेज देता और दोनों रोज रात छत पर मिलते और एक दूसरे को चूमते. अगले दिन अखबार पढ़ते और कानपुर की बिचित्रता पर खूब हंसते.

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