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भारतीय राजनीति को फिर से राजीव गांधी न ही मिलें तो बेहतर

21 मई को स्व. राजीव गांधी की पुण्यतिथि पर उनके ऐसे फैसलों को भी याद करना होगा जो राजनीतिक और कूटनीतिक रूप से फेल साबित हुए

Avinash Dwivedi | Published On: May 21, 2017 10:01 AM IST | Updated On: May 21, 2017 10:13 AM IST

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भारतीय राजनीति को फिर से राजीव गांधी न ही मिलें तो बेहतर

राजीव गांधी को इंदिरा गांधी के हत्या के तुरंत बाद प्रधानमंत्री पद की शपथ दिला दी गई. राजीव गांधी बड़े ही अनमने ढंग से सत्ता पर काबिज हुए. इसके बाद उनका पूरा कार्यकाल भारतीय राजनीति की कुछ सबसे बुरी घटनाओं से भरा रहा.

पता नहीं ये उनका दुर्भाग्य था या राजनीतिक परिपक्वता का अभाव पर ये तय है कि आज कोई भी प्रधानमंत्री और भारत का नागरिक ऐसे कार्यकाल की पुनरावृत्ति नहीं चाहेगा. भारतीय राजनीति पर धब्बा लगाने वाली वो घटनाएं थीं -

'भोपाल गैस त्रासदी' और एंडरसन का अमेरिका भाग जाना

bhopal gas

3 दिसंबर, 1984 को अभी भोपाल में पूरा सवेरा भी नहीं हुआ था, तभी आसमान में सफेद धुएं के बादल का गुबार उठा. लोगों को सांस लेने में दिक्कत, छींक, मितली और आंखों में जलन महसूस होने लगी. अफरा-तफरी मच गई. लोग बेहोश होकर गिरने लगे.

बाकी लोग सुरक्षित स्थानों की तलाश में भागने लगे. करीब एक घंटे के अंदर ही 400 लोगों ने दम तोड़ दिया. हादसे में कुल 2 हजार लोगों की जानें गईं. 50 हजार लोग जिंदगी भर के लिए इससे प्रभावित हुए.

इसके बाद लोग भोपाल छोड़ भागने लगे. वैज्ञानिक और बहुत से लोग मदद के लिए भोपाल पहुंचे. वैज्ञानिकों ने 'ऑपरेशन होप' चलाया. पर लोगों में भारी असंतोष बना रहा. पता चला कि जिस यूनियन कार्बाइड नाम के कारखाने से ये गैस लीक हुई. ऐसे कारखाने इतनी जनसंख्या के बीच लगाए ही नहीं जा सकते हैं.

फिर कारखाने का रख-रखाव भी बहुत बुरी हालत में था. ऐसे में आज नहीं तो कल ये हादसा होना ही था. इसमें जो बात हमेशा के लिए कलंक बनकर रह गई वो थी कि यूनियन कार्बाइड के मुख्य प्रबंध अधिकारी वारेन एंडरसन कुछ देर के लिए गिरफ्तार किया गया पर फिर उसे जमानत पर छोड़ दिया गया और वो अमेरिका भाग गया.

हादसे के पीड़ितों को न्याय के नाम पर सरकारी सहायता और नौकरियां जो मिलीं उसमें हमेशा से धांधली की खबर आती रही है. मामले का आखिरी फैसला भी अभी नहीं हो सका है. और एंडरसन की 2014 में मौत हो चुकी है.

भारतीय राजनीति में खुले तौर पर धार्मिक तुष्टिकरण की शुरुआत

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इंदौर में रहने वाली 62 साल की शाह बानो को उसके पति ने 1978 में तलाक दे दिया था. शाह बानो के 5 बच्चे थे. शाह बानो ने पति से कानूनी तलाक भत्ते की मांग की पर पति इस्लामिक कानून के हिसाब से ही गुजारा भत्ता देना चाहता था जबकि हाइकोर्ट ने आजीवन गुजारा भत्ता देने का फैसला सुनाया था.

सुप्रीम कोर्ट ने भी इस फैसले पर मुहर लगा दी थी. शुरुआत में राजीव गांधी सरकार ने भी इस फैसले का स्वागत किया और गृह राज्य मंत्री आरिफ मोहम्मद खान ने फैसले के पक्ष में मौलाना आजाद के एक भाषण का हवाला देते हुए फैसले की तारीफ में कसीदे पढ़े.

पर फैसले की मुस्लिम समुदाय में धार्मिक पदाधिकारियों ने बहुत आलोचना की. फैसले को सरकार का धर्म में हस्तक्षेप बताते हुए तमाम फतवे जारी करने का दौर शुरू हो गया. इसी सबके बीच पार्टी 1985 के आखिरी में हुई उत्तर भारतीय राज्यों के उपचुनाव भी हार गई. इसके बाद राजीव गांधी सरकार ने हवा के रुख के मुताबिक अपना स्टैंड बदला और जेड. ए. अंसारी की सलाह लेनी शुरू कर दी.

अंसारी ने संसद में इसी मुद्दे पर तीन घंटे का भाषण दिया. और सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पूर्वाग्रहग्रस्त, भेदभावकारी और विरोधाभाषों से भरा बता दिया. यहां तक कि उन्होंने न्यायधीशों का मजाक उड़ाते हुए उन्हें इस्लामी कानूनों की व्याख्या करने के लिए बहुत छोटा इंसान भी बता दिया. साफ था कट्टरपंथियों के दबाव में कांग्रेस आ चुकी थी. और ये उस दौर तक ही नहीं सीमित रहा. उसके चलते तीन तलाक का मुद्दा आज भी कानून व्यवस्था के लिए परेशानी का सबब बना हुआ है.

उधर अयोध्या में अलग ही बवाल जारी था. राम की मूर्ति मस्जिद प्रांगण के भीतर 1947 में ही स्थापित कर तो दी गई थी पर उसका ताला साल के एक ही दिन पूजा-अर्चना के लिए खोला जाता था. ऐसे में एक वकील ने ताला खुलवाने को जिला न्यायालय में याचिका दायर की. जिला जज ने ताला खुलवाने के आदेश दे दिया.

ऐसे में एक घंटे के अंदर मस्जिद का ताला खोल दिया जाना और दूरदर्शन का इस घटना को कवर करने के लिए वहां मौजूद होना ऐसी बातें थीं जिनसे लोगों ने अनुमान लगाया कि ये काम नई दिल्ली के आदेश पर हुआ है. और अरुण नेहरू की सलाह पर ये ताला खुलवाया गया है. ये ऐसी बातें थीं जिन्होंने खुले तौर पर 'तुष्टिकरण की राजनीति' को बढ़ावा दिया.

इसी दौरान एक वामपंथी सांसद सैफुद्दीन चौधरी ने संडे नाम की पत्रिका में प्रधानमंत्री का मजाक उड़ाते हुए टिप्पणी की, 'प्रधानमंत्री अपने आपको इक्कीसवीं सदी में ले जाने वाले एक आधुनिक व्यक्ति के रूप में पेश कर रहे थे, लेकिन हकीकत में उनका दिमाग मुल्लाओं और पंडितों के समान ही पुरातन काल का था.'

ये धार्मिक तुष्टीकरण तबसे भारतीय राजनीति का एक स्वीकार्य ट्रेंड बन गया है, जो पिछले तीस सालों तक एक धर्म विशेष के पक्ष में काम कर रहा था और आज रिवर्स होकर दूसरे धर्म के लिए काम कर रहा है.

'भारत' और 'इंडिया' की दरार खाई बनने लगी

An Indian farmer walks with his hungry cow through a parched paddy field in Agartala

प्रतीकात्मक तस्वीर

1985 में सूखा पड़ा. उडीसा से भुखमरी की कई खबरें आईं. लोग आम की गुठलियों और इमली के बीजों का शोरबा बनाकर पी रहे थे और बीमार होकर मर रहे थे. सिर्फ उडीसा के कोरापुट और कालाहांडी में 1 हजार से ज्यादा लोग मर गए थे.

1987 में देश में फिर से सूखा पड़ा. सूखा इतना जबरदस्त था कि इसे शताब्दी के सबसे भयानक सूखे की संज्ञा दी गई. पश्चिम के राज्यों में रहने वाले लोग अपने जानवरों को ट्रकों में भरकर भोजन और चारे की तलाश में मध्य भारत के क्षेत्रों में ले आए. इस सूखे में करीब 20 करोड़ लोग प्रभावित हुए थे. अखबारों में ऐसी तस्वीरों की बहुतायत थी जिसमें फटी जमीन, सूखे वीरान खेत और मरे हुए जानवरों की बिखरी हड्डियां दिखाई देती थीं.

ऐसे में दो किसान नेता उभरे. पूर्व ब्यूरोक्रेट शरद जोशी और किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत. दोनों ने ही सारे देश के किसानों के नेतृत्व की बात कही और बहुत सी मांगे सरकार के सामने रखीं. पर अस्सी के दशक के अध्ययनों ने साबित कर दिया कि आज भी ग्रामीण भारत में जाति बुरी तरह से हावी है. और असली वंचितों में अब भी सबसे बड़ी संख्या दलितों और वंचितों की ही है. और ये नेता मध्यमवर्गीय किसानों के नेता भर हैं.

फिर गांवों में रहने वाले 80 फीसदी और शहरों में रहने वाले 60 फीसदी दलित गरीबी रेखा के नीचे हैं. यही दौर था जब इस खाई में बढ़ोत्तरी तेजी से हुई. और तबसे ये अंतर लगातार बढ़ा ही. अमीर और अमीर होते गए वहीं गरीब और गरीब.

दूरदर्शी होने के चक्कर में पैर ही कुल्हाडी पर दे मारी

कहा जाता है कि राजीव गांधी दूरदर्शी थे. वह चाहते थे कि श्रीलंका में जो सिंहलियों और तमिलों के बीच संघर्ष जारी है उसे सुलझाने के बहाने अमेरिका जैसी शक्तियां दक्षिणी एशियाई मसलों में टांग अड़ाने न आ धमकें. इसीलिए उन्होंने खुद इसे सुलझाकर अपनी अंतरराष्ट्रीय छवि चमकानी चाही. और भारतीय सेना को श्रीलंका भेज दिया.

पर इसके बुरे प्रभाव हुए. भारतीयों के प्रति जो तमिल उदार थे, उन्हें राजीव गांधी का ये कदम पसंद नहीं आया. सिंहलियों को भी ये उनकी संप्रभुता में भारत का दखल लगा. फिर भारत से भेजी गई करीब 48 हजार सेना को श्रीलंका की परिस्थियों का कोई परिचय नहीं था. इससे भारतीय सेना को खासा नुकसान हुआ.

भारतीय सेना ने जाफना में लिट्टे मुख्यालय पर हमला करके भले ही उसपर कब्जा कर लिया. पर बड़ा खामियाजा भुगतते हुए उन्होंने 1 हजार से ज्यादा भारतीय सैनिकों ने जानें गवाईं. 1987 के आखिरी तक प्रेस ने श्रीलंका को 'भारत का वियतनाम' कहना शुरू कर दिया था.

1989 से भारतीय सेनाओं की वापसी शुरू हो गई. फरवरी, 1990 तक सारे सैनिक भारत लौट आए. पर भारत के इस कदम से न ही कोई खास सफलता मिली, न ही मान बल्कि दुनियाभर में भारत की छवि 'एक बदमाश लड़ाके' वाली बन गई. और श्रीलंका का ये युद्ध ही था, जिसके चलते पूर्व-प्रधानमंत्री राजीव गांधी की 21 मई 1991 में हत्या कर दी गई.

'नए महाराजाओं' का दौर हो गया शुरू

ये 'नए महाराजा' भारतीय नेता थे. जो इसी दौर से बड़े-बड़े आलीशान मकानों में रहने लगे थे. लंबी आलीशान गाड़ियों में यात्रा करने लगे थे और पांचसितारा होटलों में खाना खाने लगे थे. इसके पीछे वजह थी उनकी उद्योगपतियों से साठगांठ. राजनीति में नैतिकता अब पुरानी बात हो चली थी और पैसे लेकर उद्योगपतियों की सेटिंग कराना आम बात होती जा रही थी. नेता-उद्योगपति-मीडिया गठबंधन रंग ला रहा था.

संडे मैगजीन में इंद्रनील बनर्जी के 'द न्यू महाराजाज' नामक लेख की ये टिप्पणी इस युग पर सटीक बैठती है-

राजनीतिक जीवन से धोती गायब हो चुकी है और उसी तरह से छड़ी, लकड़ी के खड़ाऊं और रेलवे के तीसरे दर्जे में सफर भी खत्म हो चुका है. महंगे जूते, महंगे चश्में, बुलेटप्रूफ जैकेट, मर्सडीज गाड़ियां और सरकारी हेलिकॉप्टरों ने इनकी जगह ले ली. अब भारतीय राजनीति से पसीने की गंध दूर हो चुकी है, हालांकि यह अभी भी साफ और गंधहीन नहीं है - इससे आफ्टरशेव की बदबू आ रही है.

इन सारी घटनाओं से साबित होता है कि भले ही कंप्यूटर तकनीक भारत में लाने का श्रेय राजीव गांधी पाते हों पर उन्होंने भारतीय राजनीति को एक नकारात्मक मोड़ देने में महती भूमिका निभाई. ये ऐसी नकारात्मक था जिससे भारतीय राजनीति कभी उभर नहीं पाई और निकट भविष्य में भी इन प्रभावों से उभरने के कम ही आसार नजर आते हैं.

(सोर्सेज- रामचंद्र गुहा, इंडिया आफ्टर गांधी; टीएन निनान और जगन्नाथ दुबासी, धीरूभाई अंबानी: द सुपर टाइकून; वीर सांघवी, मैंडेट; इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली, इलेस्ट्रेटेड वीकली, संडे इंडिया टुडे, बिजनेस इंडिया, लोकसभा डिबेट्स)

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