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सुंदर रंग-रूप और गोरे बच्चों का सपना: फॉर्मूला RSS का या ख्वाहिश पूरे हिंदुस्तान की?

आरोग्य भारती की कार्यशाला बेढब जान पड़ सकती है. ऐसा लगता है कि अपने तेवर में वह कुछ ज्यादा ही उग्र है.

Maya Palit | Published On: May 11, 2017 01:43 PM IST | Updated On: May 11, 2017 01:45 PM IST

सुंदर रंग-रूप और गोरे बच्चों का सपना: फॉर्मूला RSS का या ख्वाहिश पूरे हिंदुस्तान की?

क्या आपको तरुण विजय का वह बयान याद है जब वह कहना तो चाहते थे कि भारतीय नस्लवादी नहीं होते लेकिन लफ्जों ने जबान से कुछ ऐसा दगा किया कि बात एकदम बदल गई?

बेशक आपको राज्यसभा के सांसद तरुण विजय के मुंह से निकली वह बात याद होगी. उन्होंने कहा था कि भारतीय लोग नस्लवादी होते तो दक्षिण भारत के लोगों के साथ भला अब तक कैसे रह पाते जिनका रंग काला होता है.

तरुण विजय की इस विस्फोटक टिप्पणी से देश के लोक-लुभावन संस्कृति-जगत (पॉपुलर कल्चर) और मीडिया में बड़ा दिलचस्प वाकया पेश आया.

टिप्पणी को नामी गिरामी हस्तियों ने आड़े हाथों लिया. प्रियंका चोपड़ा जैसी कुछ हस्तियों ने अफसोस जताया कि हाय, हम तो गोरेपन के प्रॉडक्ट का विज्ञापन करते आ रहे हैं जबकि अभय देओल को गुस्सा आया कि आखिर गोरेपन के प्रोडक्ट वाले विज्ञापन आते ही क्यों हैं.

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एक अभिनेत्री सोनल सहगल हैं. सोनल साल 2003 में गोरेपन के एक प्रॉडक्ट के विज्ञापन में नजर आयी थीं. अभी पिछले महीने सोनल सहगल ने माफी मांगी (और यह माफीनामा वायरल हो रहा है) कि हाय, हमने तो 'सांवली सलोनी हिन्दुस्तानियों औरतों के आत्म-विश्वास को तोड़ने का काम किया' था.

सोनल सहगल वाले विज्ञापन से देश भर की सांवली-सलोनी महिलाओं पर पहाड़ टूटा या नहीं महत्व इस बात का नहीं है. ऐसा इसलिए क्योंकि सोनल और उनकी फिल्म जिस टेक पर चलते प्रतीत होते हैं वह यह है कि गोरी चमड़ी के सुंदरता पर नजर जमाये होने के कारण आप अपने आस-पास बिखरे सांवले-सलोने सौन्दर्य की अनदेखी कर रहे हैं.

लेकिन इस सोच में कुछ डरावना सा है क्योंकि इसमें सौन्दर्य ( इसे सिर्फ गोरापन मत समझ लीजिएगा) बहस का मुद्दा बना हुआ है. मिसाल के लिए यह तथ्य कि सुन्दरता का रिश्ता पैदाईश से है और सुंदर बच्चे बिल्कुल बाजार के हिसाब से तैयार किए जा सकते हैं.

आरएसएस लोगों को उनकी फंतासी के मुताबिक बच्चे पैदा करने के गुर सिखा रहा है

आरएसएस लोगों को उनकी फंतासी के मुताबिक गोरे और सुंदर बच्चे पैदा करने के गुर सिखा रहा है

फंतासी के मुताबिक बच्चे

इस हफ्ते कई मीडिया केंद्रों ने एक ऐसा समाचार छापा है जो विज्ञान की फंतासी पर बनी किसी फिल्म के कथानक जैसा जान पड़ता है.

समाचार में कहा गया है रविवार के रोज आरोग्य भारती (आरएएस की चिकित्सा शाखा) ने कोलकाता में एक कार्यशाला का आयोजन किया. इस कार्यशाला में दावा किया गया कि आरोग्य भारती के पास वह तरीका है जिसपर अमल करने से गोरे, लंबे और 'मनपसंद' बच्चे पैदा किये जा सकते हैं.

जाहिर है, ऐसी बातें आसानी से तो होने से रहीं. इसके लिए माता-पिता को तीन माह शुद्धीकरण की प्रक्रिया से गुजरना होगा. शुद्धिकरण की इस प्रक्रिया में यह भी शामिल है कि सहवास (सेक्स) सिर्फ उसी वक्त किया जब ग्रह-दशा शुभ घड़ी का संकेत कर रही हो.

शुभ घड़ी यानी गर्भधान के वक्त के आने तक सहवास का त्याग करना होगा. माता-पिता को परहेजी भोजन करना होगा जिसमें कुछ आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों का सेवन शामिल है ताकि वीर्य और अंडाणु की शुद्धि हो सके.

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इतना ही नहीं, आरोग्य भारती के अधिकारियों ने दावा किया कि जर्मनी ने द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान आयुर्वेद का इस्तेमाल करते हुए खास किस्म के बच्चे पैदा किए गए थे और हमलोग जर्मनी में हुए इसी प्रयोग से प्रेरणा ले रहे हैं. कहना न होगा कि यह भी एक विलक्षण फैंटेसी ही है.

लंबे, गोरे और हर तरह से 'पूर्ण' बच्चे पैदा करने का पाठ पढ़ाना खुद ही मायावी जान पड़ता है. तिस पर सितम कि यह सिखाया उन मां-बाप को जा रहा है जो खुद ही सांवले रंग के हैं.

तर्क जब ऐसा बेढब बन पड़े तो समझ नहीं आता कि कोई उसपर हंसे, अचरज करे या उदास हो. लेकिन 'मनपसंद' बच्चे पैदा करने का यह हिन्दुत्ववादी प्रजनन-शास्त्र क्या शेष भारत के सपने से मेल नहीं खाता?

मिसाल के लिए यह बात ध्यान रखें कि कृत्रिम तरीके से गर्भाधान करने वाले सरोगेसी कंसल्टेंसी में जिन महिलाओं के नाम डोनर की सूची में दर्ज हैं उन सबने अपनी चमड़ी का रंग गोरा लिखवा रखा है.

टाइम्स ऑफ इंडिया की हाल की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि कृत्रिम तरीके से गर्भाधान के लिए अंडाणु दान करने वाले व्यक्ति जुटाने की खोज में लगे एजेंट सुन्दर महिलाओं को खास तवज्जो दे रहे हैं.

वे उन्हें अंडाणु दान करने के एवज में न्यूनतम दर (20,000 रुपये) से दोगुनी ज्यादा रकम देने की पेशकश कर रहे हैं. सुंदर और ग्रेजुएट महिला के अंडाणु हासिल करने के लिए एजेंट 50 हजार रुपये तक खर्च करने को तैयार हैं.

कुछ मामलों में तो दानदाता महिलाओं से कहा जा रहा है कि आप अपने बच्चों की तस्वीर भेजिए ताकि पता लगे कि 'आपके अंडाणु से जन्मा बच्चा आपके बाकी बच्चों की तरह ही देखने में सुंदर पैदा होगा.'

इन बातों से साफ पता चलता है कि गोरेपन को लेकर अपने देश में किस कदर की सनक सवार है.

आज भी हमारे समाज में सुंदरता का मतलब गोरा होना होता है

आज भी हमारे समाज में सुंदरता का मतलब गोरा होना होता है

सुंदरता यानि गोरापन

खैर, टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में एक बात आने से रह गई है. वह बात तकरीबन हर वैवाहिक विज्ञापन में लिखी मिल जाती है और उससे यही जाहिर होता है कि चमड़ी के गोरेपन को लोग-बाग सुंदरता का एक पैमाना मानते हैं.

इस साल की शुरुआत में गुरूग्राम सेंटर फॉर सरोगेसी ने कहा कि जब हम डोनर की अपनी जरुरत का विज्ञापन इन शब्दों में करते हैं कि, 'रंग गोरा, बी- पॉजिटिव' तो हमें उम्मीद से ज्यादा रिस्पांस मिलते हैं.

फर्टिलिटी स्पेशलिस्टस् यह बात कहते आये हैं कि गोरी चमड़ी (तकरीबन 70 फीसद ग्राहक अपनी यह मांग खास तौर पर जताते हैं) और नीली आंखों वाले बच्चों की चाहत इस तरह जोर पकड़ रही है कि कॉकेशिएन नस्ल के बच्चों का एक बड़ा बाजार तैयार हो गया है.

एक अस्पताल के अध्यक्ष के मुताबिक गोरी चमड़ी की महिलाओं के अंडाणु की बढती मांग के कारण जॉर्जिया की बहुत सी महिलाएं मुफ्त की हवाई यात्रा हासिल कर भारत पहुंच रही हैं.

अगर कृत्रिम गर्भाधान कुछ इस रीति से कराया जा रहा है कि अंडाणु या शुक्राणु किसी और का और भ्रूण की पालनहार कोख कोई और हो...तब भी दंपत्ति यह जरूर पूछते हैं कि भ्रूण की पालनहार महिला गोरी और सुंदर है या नहीं.

जाहिर है, सरोगेसी के लिए डोनर का काम कर रही महिलाओं के लिए इस रुझान के कुछ खतरनाक नतीजे सामने आ रहे हैं.

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पत्रकार गीता अरवमुदन ने बेबी मेकर्स: द स्टोरी ऑफ इंडियन सरोगेसी नाम की किताब लिखी है. इस किताब में भारत में कृत्रिम गर्भधारण (आईवीएफ) को लेकर प्रचलित धारणाओं का जायजा लिया गया है.

गीता के मुताबिक डोनर महिला अगर गोरी और सुंदर हुई तो फर्टिलिटी ड्रग्स देकर उसके प्रजनन-तंत्र को ज्यादा से ज्यादा उत्तेजित किया जाता है क्योंकि ऐसी महिलाओं के अंडाणुओं की मांग ज्यादा है.

जाहिर है, गोरी चमड़ी वाले बच्चे पैदा करने की इस सनक का रिश्ता हमारे मन में गहरे पैठे जातिगत पूर्वाग्रहों से है. और...ईमानदारी का एक सवाल यह भी है कि सांवले रंग के बच्चे को हमने विज्ञापनों में कब देखा है?

विज्ञापन चाहे हग्गिज का हो या फिर ममी पोको पैंट्स या फिर किटकैट का- जिसमें जोर बच्चे के चंचल नितंब दिखाने पर होता है– इन सारे ही विज्ञापनों में समान बात आखिर क्या है?

हम अब एक ऐसे वक्त में हैं जब एकता कपूर के टीवी शो देव-डी के किरदार किसी से इसलिए नफरत पाल लेते हैं क्योंकि उसने लड़की का रंग काला जानकर दगा किया है. (एक एपसोड में गोरे रंग के दो प्रगतिशील लोग आपस में चर्चा कर रहे हैं कि यह सारा कुछ 2017 में हो रहा है).

'डार्क इज ब्यूटीफुल' यानी सांवली रंगत को सुंदर बताने वाला अभियान अभी जारी है. लेकिन सांवली रंगत के बच्चे दिखाने के मामले में विज्ञापनों का मन-मानस रत्ती भर भी नहीं बदला.

शायद इसकी एक वजह यह भी हो कि बच्चे या उनके मां-बाप को यह समझा जा सके कि सांवली रंगत भी समान रूप से आकर्षक है तो वे इस बात को राजी-खुशी ना मानें.

VARANASI, INDIA - MARCH 26: RSS Volunteers during Pad Sanchalan at Beniyabag ground on March 26, 2017 in Varanasi, India. (Adarsh Gupta/Hindustan Times via Getty Images)

आरएसएस की ये कार्यशाला न सिर्फ बेढ़ब बल्कि अनुचित भी लगती है

बेढब कार्यशाला

आरोग्य भारती की कार्यशाला बेढब जान पड़ सकती है. लग सकता है कि अपने तेवर में वह कुछ ज्यादा ही उग्र है और वैसी कार्यशाला राह भटकी हुई भी जान पड़ सकती है.

एक लेख में तो आरोग्य भारती की कार्यशाला की खबर को मनगढ़ंत भी बताया गया है. लेकिन लेख में आरोग्य भारती के महासचिव को बचाव के अंदाज में यह कहते हुए दिखाया गया है कि, 'हम सांवले रंग को किसी किस्म की बाधा कैसे करार दे सकते हैं... हम तो कृष्ण जी की पूजा करने वाले लोग हैं.'

यह हास्यपद तर्क एक तरह से तरुण विजय वाले प्रसंग की ही याद दिलाता है. लेकिन, याद रहे कृत्रिम गर्भाधान के लिए गोरी रंगत की महिला की तलाश और विज्ञापनों में गोरे बच्चों की भरमार का रिश्ता ठीक-ठीक उसी धारणा से है जो किसी जाति-विशेष को बाकियों से श्रेष्ठ ठहराती है.

क्या आप 'पूर्ण' बच्चा पैदा करने के आरएसएस के सपने पर हंस रहे हैं? याद रखिए कि इस सपने को खाद-पानी हमारे ही सोच-विचार और कर्मों से मिल रहा है.

( द लेडिज फिंगर (टीएलएफ) महिला-केंद्रित एक अग्रणी ऑनलाइन मैगजीन है और इसमें राजनीति, संस्कृति, स्वास्थ्य, सेक्स, नौकरी तथा इन सबके बीच आने वाले तमाम मुद्दों पर नये नजरिए और रोचक तर्कशैली के लेख छपते हैं )

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