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मदरसों की मां: दारुल-उलूम देवबंद

देवबंद का मदरसा इस्लामी शिक्षा का सबसे बौद्धिक और प्रभावशाली केंद्र है.

Nazim Naqvi | Published On: Nov 22, 2016 10:15 AM IST | Updated On: Nov 22, 2016 05:39 PM IST

मदरसों की मां: दारुल-उलूम देवबंद

उत्तर भारत स्थित देवबंद का मदरसा इस्लामी शिक्षा का सबसे बौद्धिक और प्रभावशाली केंद्र है. हालांकि इस तथ्य पर अलग-अलग मत हो सकते हैं.

इस मदरसे को अब उम्मुल-मदारिस यानी देश-भर में फैले हज़ारों मदरसों की मां कहा जाता है. 1866 में सिर्फ 21 विद्यार्थियों के साथ शुरू किया गया मदरसा आज दारुल-उलूम (विश्वविद्यालय) कहलाता है.

आज यहां 5000 विद्यार्थी हैं. खाने-रहने और पढ़ने की सारी सुविधाएं बिल्कुल मुफ्त हैं. 2017 में ये 150 वर्ष का हो जाएगा.

दिल्ली से महज 150 किलोमीटर पर स्थित देवबंद तक की यात्रा निजी वाहन से पांच-साढ़े पांच घंटे में पूरी होती है.

रोडवेज जरूर 7 घंटे से ऊपर समय लेती होगी. देवबंद यूं तो सहारनपुर जिले में है, लेकिन दिल्ली से जाने के लिए मुजफ्फरनगर होकर ही जाना पड़ता है.

देवबंद तक का मुश्किल सफर 

अब हाइवेज अच्छे बन गए हैं इसलिए मुजफ्फरनगर तक की यात्रा कमोबेश सुखद रहती है लेकिन मुजफ्फरनगर से आगे देवबंद तक की यात्रा जो मात्र 27-28 किलोमीटर की है,लगभग सवा घंटे में तय होती है.

Darul

देवबंद के अंदर एक फ्लाइओवर का निर्माण हो रहा है जो सवा घंटे को दो और तीन घंटे में बदलने की पूरी क्षमता रखता है.

चूंकि हमने वर्तमान मोह्तमिम (कुलपति) मौलाना मुफ्ती अबुल कासिम नोमानी साहब से फोन पर इजाजत ले ली थी इसलिए पहले गेट पर खड़े दरबान ने अंदर आने दिया. अब हमारा अगला पड़ाव था, मेहमानखाना (गेस्टहाउस).

हम टेढ़े-मेढ़े रास्तों और कई फाटकों से गुजर रहे थे. दोनों तरफ पूरा कैम्पस साथ-साथ चल रहा था.

होस्टल, मस्जिद, विभाग, कुर्ते-पायजामे और टोपी में लिपटे विद्यार्थियों के झुंड. ये छोटा सा सफर आपको पूरे दारुल-उलूम कैम्पस से वाकिफ करा देता है.

यहां लगभग हर गेट पर दरबान नियुक्त हैं जो काफी चौकन्ने हैं. बिना किसी आशय के कैम्पस में घूमना-फिरना नामुमकिन लगता है.

देवबंद का अनोखा अनुभव 

बहरहाल हम चूंकि एक डॉक्यूमेंट्री बनाने के लिए यहां आए हैं इसलिए दरबानों की एक्स-रे करती हुई निगाहों के बावजूद अंदर-बाहर आ जा रहे हैं.

कुछ ही देर में हम यहां के वर्तमान मोह्तमिम (कुलपति) के दफ्तर में दाखिल हो रहे थे, जो मेहमानखाने से 50 कदम पर है. कमरे का फर्श लाल रंग के कारपेट में लिपटा हुआ है.

तीन मसनदें (फर्श पर गाव-तकिये के साथ बैठने का स्थान और सामने रखी डेस्क जिसके सामने पालथी मार के बैठते हैं), एक कुलपति के लिए और दो उप-कुलपति के लिए. साज-सज्जा साधारण सी और माहौल गंभीर. मोह्तमिम साहब ने मुसाफह किया(हाथ मिलाया) और हम करीब ही अपने घुटनों पर बैठ गए. हमने चन्द शब्दों में अपना आशय बताया तो उन्होंने इंकार में अपना सर हिलाया ‘हमारे यहां वीडियोग्राफी ममनूह (मना) है.’

एक फोन मिलाकर किसी से बात की, ‘आपलोग मुहम्मदुल्लाह साहब से मिल लीजिए. वही मीडिया वालों के जवाब देते हैं. यहां के इंटरनेट विभाग के इंचार्ज हैं.’ उनका मतलब साफ था. मोह्तमिम साहब, जो यहाँ के सबसे ज़िम्मेदार व्यक्ति हैं, कैमरे पर बात नहीं करेंगे. खैर देखते हैं आगे क्या होता है?

कुछ ही पल में हम मौलाना मुहम्मदुल्लाह कासिमी के दफ्तर में थे. ये कमरा ऑफिस जैसा महसूस हुआ. कुर्सी-मेज, वर्क-स्टेशन, कंप्यूटर. मुहम्मदुल्लाह साहब सज्जनता से मिले.

उन्होंने बातें सुनीं और काफी कहने-सुनने के बाद इस बात की इजाजत दे दी कि आपलोग इमारतों की तस्वीरें बना लें लेकिन यहां की किसी एक्टिविटी को न फिल्माएं.

‘ऐसे प्रतिबंधों में फिल्म बनाना कैसे मुमकिन है?’ जैसे सवाल पर मुस्कुराए, ‘देखिए हमारी मजबूरी है ये, शरई तौर पर ऐसी चीजें हमारे यहां सख्ती से मना हैं.’ मैं सोच रहा था कि ये लोग पासपोर्ट कैसे बनवाते होंगे?

हो सकता है ऐसी बातों के लिए शरा में 'ज़रूरत' के नाम पर छूट हो, लेकिन हम जो फिल्म बना रहे हैं वो भी तो इनके मकसद के लिए जरूरी होगी. ऐसे कामों में प्रचार-प्रसार की कितनी जरूरत होती है?

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ऐसा लगा जैसे मुहम्मदुल्लाह साहब मेरे मन की बात पढ़ गए. ‘देखिए हम तो कभी किसी मीडिया वालों को नहीं बुलाते. अगर कोई खुद आ जाए तो मना भी नहीं करते. अच्छा आप बाहर-बाहर से कैमरा चला सकते हैं. अब जो उसमें आ जाए, आ जाए.’

हमें लगा कि हमारी दलीलों का वो अंदर से समर्थन कर रहे थे लेकिन शरई बातों में 'मन की बात' की कोई गुंजाइश शायद नहीं होती.

हालांकि कोई थोड़े से समय में किसी जगह को भली-भांति जांच-परख नहीं सकता, फिर भी अनुभव के आधार पर जो लगा वो ये कि दारुल-उलूम में लोग सादगी और अनुशासन के साथ रहते हैं. खुश-अखलाक यानी व्यवहार-कुशल हैं.

लेकिन दिल्ली युनिवर्सिटी या जेएनयू जैसे माहौल से इसकी तुलना करें तो लगता है कितनी मुश्किल जिंदगी जीते हैं. विज्ञान को बस उतना ही अपनाया है जिसके बिना सांस लेना मुश्किल हो. ऐसा लगता है जैसे 21वीं सदी से एक बुलेट-ट्रेन के जरिए आप 12वी सदी में फेंक दिए गये हों.

किसी ने बातचीत में बताया कि तस्वीरें खिंचवाना, मजारें बनवाना हमारे यहां 'बिदअत' है. इस्लामी शिक्षा में 'बिदअत' का मतलब वो विचार या वो काम जो आपको धर्म के रास्ते से भटका दे. हमें याद आया, शायद तभी तालिबानियों ने अफगानिस्तान की बामियान वैली में 1700 वर्ष पुरानी बुद्ध की मूर्ति को डायनामाइट से उड़ा दिया था.

बिना ये सोचे-समझे कि अगर वो मूर्तियां बनाने या गढ़ने को नहीं मानते तो बौद्ध लोग तो मानते हैं. और फिर कोई ऐतिहासिक धरोहर किसी समय-काल की पहचान बन जाती है. पुरातत्व अवशेष इतिहास के विद्यार्थियों के लिए जमीन पर गढ़ी हुई किताबें हैं.

अपने ईमान को अपने ईष्ट, अपने अल्लाह से जोड़ना आपका अधिकार है लेकिन उसी ईष्ट उसी अल्लाह के बनाए हुए दिलों को तोड़ना कहां तक जायज है?

दिमाग में अल्लाह की अजीम किताब का वाक्य गूंजने लगा 'दूसरे के खुदाओं को बुरा न कहो नहीं तो वो तुम्हारे खुदा को बुरा कहेंगे'. हमारी कल्पना में तालिबानियों का जिक्र इसलिए आया कि हम 'देवबंद का इतिहास' (जो मक्तबा दारुल-उलूम से प्रकाशित हुई है) पढ़ रहे थे जिसमें पृष्ठ 223 पर लिखा था कि

‘अमरीका में 9-11 हमलों के बाद तालिबान के देवबंदी विचारों के कारण दारूल-उलूम का नाम वैश्विक मीडिया में आने लगा. इसी कारण बहुत से विदेशी और इंटरनेशनल मीडिया के लोग दारुल उलूम आने लगे.’

दारूल उलूम की पहली इमारत है नौ-दरा

हम ऑफिस से निकले और दो कदम पर नौ-दरा के सामने खड़े थे. नौ-दरा, ये दारूल उलूम की पहली इमारत है.

मोलसरी के दो पेड़ इस प्रांगड़ की खूबसूरती को बढ़ाते हैं. इस विश्वविद्यालय के ज्यादातर विभागों के ऑफिस यहीं अलग-अलग कमरों में हैं. साथ ही कुछ क्लास-रूम भी. हम (बिना कैमरे के) एक क्लास में गए जहां एक मौलवी साहब मन्तिक (दर्शन-शास्त्र) पढ़ा रहे थे.

यहां जो विभाग के बोर्ड हैं उनसे यहां के काम-काज का अंदाजा बखूबी लगाया जा सकता है. अरबी, फारसी, उर्दू, अंग्रेज़ी, कुरआन की व्याख्या, किताबत यानी सुलेख और दस्तकारी के विभाग हैं.

कुछ विभाग बड़े दिलचस्प हैं. जैसे शोबा-ए-रद्दे-ईसाइयत यानी ईसाई धर्म को नकारने वाला विभाग (इस पर हम अगले लेख में विस्तार से चर्चा करेंगे), फतवा विभाग, धार्मिक-प्रचार विभाग. इसके अलावा ऑल इंडिया रबता मदारिस विभाग यानी देश में जो हजारों मदरसे चल रहे हैं उनकी देख-रेख और उनकी नेटवर्किंग का संचालन यहां से होता है.

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यहां भवन निर्माण के कुशल कारीगर रहते हैं. इसका अंदाजा यहां की मुख्य आकर्षण 'जामे-रशीद' मस्जिद की भव्यता को देखकर महसूस किया जा सकता है. इसमें किसी बाहरी दक्षता को शामिल नहीं किया गया.

इसी मस्जिद के तहखाने में दारुल-उलूम की सबसे बड़ी क्लास लगती है जिसमें एक साथ 2000 तालिबे-इल्म पढ़ते हैं. यहां पढ़ने वालों का अनुशासन देखते बनता है.

मेरे साथी आसिफ खान ने बड़ी पते की बात नोटिस की, ‘नाजिम भाई आपने एक बात देखी? यहां के बच्चों में किसी का पेट नहीं निकला हुआ है. सब बड़े तंदरुस्त दिखते हैं.’ वाकई आसिफ़ भाई की बात में दम था. शाम को कुछ बच्चे वॉलीबाल खेलते हुए दिखे. ये गेम कम कसरत ज्यादा लग रही थी क्योंकि एक बॉल के साथ कोई 25-30 लड़के अपने मुक्के आजमा रहे थे.

हां, याद आया यहां का मखबत यानी रसोई-घर भी देखने की चीज़ है. पांच हजार लोगों का खाना बारहों महीने पकाना आश्चर्यजनक लगता है. दिन में दाल-रोटी, सब्जी और शाम को नॉन-वेज. हफ्ते में एक बार बिरयानी. चारों तरफ रेस्टोरेंट, चायखाने और होटल तादाद में हैं. जहां बच्चों की भीड़ दिखाई देती है. जाहिर है एक जैसा खाना कुछ दिन के बाद कितना बे-स्वाद लगने लगता है. इतना बे-स्वाद कि एक जैसी दुनिया बनाने की तालीम लेने वाले बच्चे भी इमरती, पकौड़ी और चाय के चटखारों पर टूटे पड़ते हैं.

ये मदरसा 1866 में शुरू तो हुआ था छत्ता मस्जिद से. बढ़ते-बढ़ते आज ये अपने आप में एक टाउन-शिप है. किसी प्रॉपर-प्लानिंग के बगैर यहां का कैम्पस और बस्ती आपस में गड-मड हैं. एक बहु-मंजिला भवन (लाइब्रेरी) का निर्माण अपने अंतिम चरण में है. यहां करीब दस लाख किताबों को एक साथ रखा जाएगा.

पश्चिमी उत्तर प्रदेश का बेहद उपजाऊ ये इलाका. खेतों खलिहानों के बीच एक बस्ती देवबंद और उसमें इस्लामी शिक्षा का ये अद्भुत केंद्र. तीन दिन के अनुभव की अगली किस्त. हो सकता है आपको प्रतीक्षा हो. हमें भी एक बार फिर यहा. आने की तमन्ना है. (जारी)…

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