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आया मौसम दलबदल का !

दलबदल का खेल इन दिनों पूरे शबाब पर है. दो चार किलो नेता रोज इधर से उधर जा रहे हैं.

Piyush Pandey | Published On: Jan 18, 2017 11:56 AM IST | Updated On: Jan 18, 2017 12:55 PM IST

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आया मौसम दलबदल का !

जिस तरह आम का एक मौसम होता है, लीची का एक मौसम होता है ठीक वैसे ही दलबदल का भी एक मौसम होता है. वो मौसम है चुनाव का!

चुनाव के मौसम में राजनीतिक दलों के पेड़ पर दलबदलू नामक फल पकता है, इस कदर पकता है कि कभी खुद ही टपकता है तो कभी ज़रा सा कंकड़ मारने भर से टपककर दूसरे दल की टोकरी में जा गिरता है.

दलबदलू फल पाने वाला हर दल इसे मीठा, स्वादिष्ट और उपयोगी बताता है, अलबत्ता जिस दल रुपी पेड़ से दलबदलू फल टपकता है वो इसे सड़ा हुआ बताकर खारिज करता है.

दलबदलुओं की इस रसभरी व्याख्या के बाद आपका मन इनके बारे में और अधिक जानने के लिए उत्सुक होगा. तो जनाब दलबदलू वो प्राणी हैं, जो हर राजनीतिक दल में इफरात में पाए जाते हैं.

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दलबदलुओं की चारित्रिक विशेषता यह है कि ये बहुत संयमी होते हैं, इस कदर कि कयामत से पहले कि कयामत तक यानि टिकट बंटवारे के ऐलान से ऐन पहले तक ये पार्टी में बने रहते हैं.

सिद्धांत की राजनीति

लेकिन-जिस दिन आलाकमान इनका टिकट काट देता है, उसी दिन यह पार्टी की जड़ काट देने का प्रण लेकर दलबदल कर 'सिद्धांत की राजनीति' कर डालते हैं. इस सिद्धांत की राजनीति को कई वाक्यों में समेटा जाता है, मसलन-

-धर्मनिरपेक्षता की रक्षा के लिए

-भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग के लिए

-राज्य या राष्ट्र हित के लिए

-जिन लोगों ने वोट देकर जिताया था, उनके प्रति निष्ठा के लिए

दलबदलू धर्म और शर्म की राजनीति से कहीं ऊपर होते हैं. वैसे हर दलबदलू सिर्फ टिकट के लिए दलबदल नहीं करता. निष्ठा और समर्पण भी एक वजह है. निष्ठा ठेका मिलने की संभावनाओं तो समर्पण कमीशन मिलने की गारंटी के प्रति.

मतलब यह कि 'माईबाप' ही दलबदल रहे हों तो फिर दल में रह क्या जाता है,सो बंदरों की फौज चल पड़ती है अपने-अपने 'राम' के पीछे. पत्थरबाजी, विरोध प्रदर्शन, नारेबाजी जैसे जो काम बंदरों की फौज के इस दल में होते हैं, वो ही काम उस दल में होते हैं तो उन्हें दल-वल से कोई लेना देना होता नहीं.

जो नेता दल बदल करते हैं वो अक्सर इसे अपने समर्थक की मर्जी बताते हैं

जो नेता दल बदल करते हैं वो अक्सर इसे अपने समर्थक की मर्जी बताते हैं

आर्थिक पक्ष

दलबदल का आर्थिक पक्ष यह है कि इससे राजनीतिक जीडीपी बढ़ती है. एक नेता पार्टी में आता है तो अपने साथ अपने एजेंट, कारोबारी मित्र और पैसा बनाने के नए तरीके भी साथ लाता है इस तरह पैसा तेजी से घूमता है.

दलबदल का खेल इन दिनों पूरे शबाब पर है. दो चार किलो नेता रोज इधर से उधर जा रहे हैं.

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मैंने भी एक दल बदलने वाले नेताजी को पकड़ा, वो नेताजी अरसे तक एक पार्टी में रहे और फिर दूसरी पार्टी में गए तो बोले मैं जन्म से इसी पार्टी का हूं. मैंने पूछा, महाराज ऐसे कैसे- आप जन्म से इस नयी पार्टी के हो गए... तो जवाब में वो बोले - गुरु, जिस तरह इस धरा में रहने वाला हर शख्स 'वसुधैव कुटुम्बकम्' का राग जपता है, उसी तरह हर राजनेता पार्टी कुटुम्बकम का राग जपता है, नेता के लिए हर पार्टी अपना परिवार है...हर पार्टी में दो चार अपने मिल ही जाते हैं, लगता ही नहीं है कि नयी पार्टी में आए हैं.

मैंने पूछा - दलबदल का कोई नुकसान नहीं है? वो बोले-फायदे तो बहुत है. इससे मेल जोल बढ़ता है. यानी सामाजिकता का दायरा विस्तृत होता है. हां, एक नुकसान है और वो है स्कूली बच्चे, जो बड़ी मुश्किल से जनरल नॉलेज की किताब पढ़कर हम जैसे नेताओं का नाम याद करते हैं, कई बार इम्तिहान आते आते तक हम इधर-उधर हो लेते हैं तो उन्हें बड़ी परेशानी होती है.

मैं दबलदलू नेताजी से सहमत था !!!

पीयूष पाण्डेय एक व्यंगकार हैं और उनकी किताब 'धंधे मातरम्' हाल ही में प्रभात प्रकाशन से आई है.

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