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शराबी चूहों ने कहा, 'आज हम मयकश बने तो शहर प्‍यासा है.....'

नीतीश कुमार अब भली-भांति जान गए हैं कि दवा का अपना महत्‍व है तो दारू का अपना.

Shivaji Rai | Published On: May 08, 2017 01:15 PM IST | Updated On: May 08, 2017 01:15 PM IST

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शराबी चूहों ने कहा, 'आज हम मयकश बने तो शहर प्‍यासा है.....'

हरिवंश राय बच्‍चन की 'मधुशाला' ने न जाने कितने झरोखों में झांका...न जाने कितने तवों का सामना किया...न जाने कैसे-कैसे आरोप झेले...पर इस बार तो हद हो गई...बिहार के चूहों ने तो 'मधुशाला' की समग्रता को ही कुतर दिया. बिहारी चूहों का औचक चरित्र परिवर्तन बच्‍चन साहब के समझ के दायरे से भी बाहर हो गया.

बच्‍चन साहब अब तक यही समझ पाए थे कि शराब, मनुष्‍य और कविता के बीच का सेतु है, श्रमिक और थकान के बीच का सेतु है, दिलों की दूरियां मिटाने और जाति-धर्म, ऊंच-नीच की खाई पाटने का जरिया है शराब पर इन चूहों ने तो 84 लाख योनियों के बीच का फर्क मिटा दिया.

पुलिस मालखाने को मयखाने में तब्‍दील कर दिया, पटना को पुरुषार्थ से पटियाला बना दिया, चूहों ने भले ही माइकल की तरह दारू पीकर दंगा नहीं किया...पर ऐसा जाम छलकाया कि 'पटियाला पैग' भी प्‍यादा लगने लगा. नौ लाख लीटर शराब चट कर जाने की खबर सुनकर बड़े-बड़े मयकश बेसुध हो गए.

खुशवंत सिंह स्‍वर्ग में भी शर्म के मारे दांतों तले अंगुली काटने लगे. ऐसा नहीं है कि चूहों ने सिर्फ शराबबंदी तोड़ी. चूहों ने पुलिसिया समझ की हदबंदी को भी तार-तार कर दिया.

शराबबंदी के लिए सरकार ने क्‍या-क्‍या जतन नहीं किए तीन करोड़ लोगों की मानव श्रृंखला बनाकर वर्ल्‍ड रिकॉर्ड बनाया आम से लेकर खास तक सभी ने न्‍यायोचित कदम बताते हुए अपनी सहमति का 24 कैरेट हॉलमार्क चिन्‍ह लगाया...मंत्री और विधायकों ने दिल पर पत्‍थर रखकर सदन में शराब हाथ न लगाने की कसम खाई.

इस सफलता से उत्‍साहित बिहार सरकार और पुलिस को लगने लगा था कि उन्‍होंने बिल्‍ली के गले में घंटी बांध दी है लेकिन चूहों ने तो खाद्य निगम की रसद की तरह पूरे उत्‍साह को ही देखते-देखते चट कर दिया. चूहों से मिली चुनौती से पुलिस-प्रशासन का दिमाग चकरा रहा है. पुलिसवाले समझ नहीं पा रहे हैं कि इन पियक्‍कड़ चूहों पर कानून का डंडा चलाएं कैसे?

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शराब पीते चूहे की प्रतीकात्मक तस्वीर (ट्विटर)

बेवड़े चूहों का 'ब्रेथ एनालाइजर' टेस्‍ट कराएं कैसे? किसको पकड़ें और किसको छोड़ें. अपराधी की रंगत देखकर ही गुनाह का स्‍तर जान लेने वाली बिहार पुलिस चूहों के मद्देनजर दंड संहिता के पन्‍ने पलट रही है.

वो ये समझ नहीं पा रही है कि सभी को एक श्रेणी में डालुं या डेली, वीकली, मंथली और ओकेजनली पियक्‍कड़ी की श्रेणी के लिए दंड संहिता में संशोधन की सिफारिश करूं. किकर्तव्‍यविमूढ़ करने वाली की स्थिति है.

ओकेजनली पीने वाले चूहों को शराबी कहना सर्वोच्‍च अदालत के आदेश की भी अवमानना होगी. सर्वोच्‍च अदालत ने तो यहां तक कह दिया है कि पत्‍नी का पति को शराबी कहना भी शोषण और प्रताड़ना के दायरे में है, फिर चूहों को शराबी कहना तो प्रताड़ना के साथ वन्‍यजीव अधिनियम का भी उल्‍लंघन होगा.

वैसे भी गोहत्‍या की तरह 'मूषक हत्‍या' को भी राष्‍ट्रीय अपराध की श्रेणी में रखने की मांग हो रही है. पशुप्रेमियों का कहना है कि 'यारों मुझे माफ करो...मैं नशे में हूं' की सुक्ति जब मदिरा प्रेमियों के लिए 'रक्षा कवच' हो सकती है तो इसके दायरे में मदिरा प्रेमी चूहे क्‍यों नहीं आ सकते?

फिलहाल चूहों की मदहोशी से बिहार सरकार और पुलिस के होशफाख्‍ता हैं. शराबबंदी से नाराज होकर अभिनेता ऋषि कपूर भले ही बिहार नहीं जाना चाहते हों पर पड़ोसी राज्‍यों के चूहे तो पटियाला पैग के लिए पटना में प्रवास के लिए लालायित हैं.

बिहार में अस्तित्‍व की लड़ाई लड़ रही शराब को चूहों की वजह से नया जनाधार मिल गया है या यह कहें तो ज्‍यादा सटीक होगा कि जिस्‍मानी स्‍वभाव का रूहानी रुपांतरण हो गया है. चूहों की कारगुजारियों को सुनकर अवध गुरू का नशा तो बिना नींबू चाटे ही छू हो गया है.

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सामासिक जुड़ाव

गुरू को शराब और शौर्य का सामासिक जुड़ाव समझ आने लगा है. चूहों के साहस को देखकर गुरु समझने लगे हैं कि सेना के जवानों को समानभाव से शराब क्‍यों परोसी जाती है. 'वीरो भोग्‍या वसुंधरा' की तर्ज पर चूहे छप्पन इंच का सीना फुलाए घूम रहे हैं और इधर मानव शरीरधारी लाचार बेवड़े शराब के अभाव में साबुन खा रहे हैं.

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शराब पीकर झूमते गाते चूहों की प्रतीकात्मक तस्वीर (विकीमीडिया)

दोस्‍त की बारात में नागिन डांस की जगह 'ओपेरा' गा रहे हैं और दबंग चूहे पुलिस की नाक के नीचे ही 'रेव पार्टी' का लुत्‍फ उठा रहे हैं. फिलहाल गुरू इस बात को समझने में लगे हैं कि चूहे खुशवंत सिंह की तरह शौक में शराब पी रहे थे या भगवंत मान की तरह गम को भुलाने की कोशिश कर रहे थे.

जो भी हो बिना चखना जाम छलकाने को लेकर गुरू चूहों के प्रति जज्‍बाती हो गए हैं. गुरू को मलाल हो रहा है कि चिड़ियों को दाना डालने की जगह इन चूहों को चखना डाले होते तो दिल से ज्‍यादा दुआ मिली होती.

सियासी मंच पर भी चूहों को लेकर चर्चा गर्म है. पूर्व सीएम मांझी खुश हैं कि जिन चूहों को उन्‍होंने बचपन में अपना ग्रास बनाया, वही चूहे मौजूदा सीएम के गले की फांस बन गए हैं. चूहों की वजह से नीतीशजी को दवा-दारू का फर्क और महत्‍व समझ आने लगा है.

नीतीश कुमार अब भली-भांति जान गए हैं कि दवा का अपना महत्‍व है तो दारू का अपना. अब समझने लगे हैं कि दवा गर्लफ्रेंड की तरह होती है जिसकी एक्‍सपायरी डेट होती है, जिससे ब्रेकअप किया जा सकता है लेकिन दारू बीवी की तरह होती है जिसे एकबार अपनाया तो छोड़ना असंभव हो जाता है.

साथ ही दारू जितनी पुरानी होगी उतना ही सिर चढ़कर बोलती है फिर चाहे चूहा हो या आदमी दारू के लिए कोई भी 'माउंटेन मांझी' बन सकता है. मालखाने की दीवार में सुराग क्‍या, पहाड़ खोद सकता है.

फिलहाल सर्वत्र चर्चा से खुश चूहे सरकार को ठेंगा दिखाते हुए, झूम-झूमकर गा रहे हैं....

'आज हम मयकश बने तो शहर प्‍यासा है... तुम्‍हारे दौर में खाली कोई गिलास न था....'

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