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संकट मोचन संगीत समारोह: यों संपन्न हुआ संगीत का लोक-पर्व

संगीत का यह महाकुंभ अब अगले बरस 4 से 9 अप्रैल तक होगा.

Avinash Mishra | Published On: Apr 21, 2017 12:37 PM IST | Updated On: Apr 21, 2017 12:42 PM IST

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संकट मोचन संगीत समारोह: यों संपन्न हुआ संगीत का लोक-पर्व

लौटने में एक उल्लास नहीं, एक उदासी-सी महसूस हो रही है.

राजन-साजन मिश्र के गायन से ‘संकट मोचन संगीत समारोह’ का नवीनतम संस्करण संपन्न हो चुका है. इन पंक्तियों के लिखे जाने से कुछ देर पहले उन्होंने राग भैरवी में ‘आज राधा ब्रज को चली, संग लिए बरसाने को...’ गाकर इस 6 दिनी संगीत-उत्सव को बेहद शालीनता से संपूर्ण किया.

संगीत का यह महाकुंभ अब अगले बरस 4 से 9 अप्रैल तक होगा.

छठवें दिन की शुरुआत थोड़ी निराशा से हुई, जब ज्ञात हुआ कि रतिकांत महापात्र अपनी 3 शिष्याओं के साथ ओडिसी नृत्य प्रस्तुत करेंगे, सुजाता महापात्र के साथ नहीं. सुजाता आ नहीं पाईं और इस वजह यह प्रस्तुति बहुत फीकी रही.

Ratikant Mahaptra

रतिकांत महापात्र

बहरहाल, इन गए 6 दिनों या कहें 6 रातों में संगीत सुनने की सभ्यता को समझने के कई अवसर मिले.

विक्टोरियन युग के दार्शनिक हर्बर्ट स्पेंसर ने The Origin and Function of Music शीर्षक अपने प्रबंध में इस प्रकार के दिनों की कल्पना की है, जब हम संगीत में ही बातचीत करेंगे. सभ्यता जब इतनी उन्नत होगी कि हमारे हृदय की अंगहीन, रुग्ण, मलिन वृत्तियों को फिर सशंकित भाव से छुपा कर नहीं चलना पड़ेगा. वे परिपूर्ण, स्वस्थ और सुमार्जित हो उठेंगी.

स्पेंसर की कल्पना बिल्कुल मूर्त रूप में न सही, लेकिन एक हद तक बनारस के आमजन में नजर आती है. संगीत का संस्कार यहां की सभ्यता का एक उन्नत पक्ष है, लेकिन इसके भी कुछ विरोधाभास हैं. इन विरोधाभासों को समारोह की अंतिम निशा की दूसरी प्रस्तुति में पधारीं विदुषी गायिका गिरिजा देवी ने उजागर किया. उनका मानना है कि शास्त्रीय संगीत, उपशास्त्रीय संगीत, गीत, गजल, कव्वाली... इन सबको इस समारोह में आपस में मिलाना ठीक नहीं है. सबके लिए अलग-अलग दिन तय होने चाहिए, जिससे श्रोताओं को सहूलियत हो. मिलाप जरूरी है, लेकिन इस तरह नहीं जिस तरह यहां होने लगा है.

अप्पाजी के नाम से समादृत गिरिजा देवी 22 बरस बाद संकट मोचन में गाने के लिए आईं. वह 88 बरस की हैं और संभवत: भारत की सबसे बुजुर्ग कलाकार हैं. उन्हें ज्यादा देर बैठने में अब दिक्कत होती है, लेकिन फिर भी करीब 1 घंटे तक उन्होंने गाया और फरमाया कि मैं उम्र में 88 बरस की जरूर हूं, लेकिन संगीत में 8 बरस की ही हूं. मुझे अब भी बहुत कुछ सीखना शेष है.

Girija Devi

गिरिजा देवी

संकट मोचन में सब तरफ कुछ बनने की महक है. समय भी यहां नए सिरे से बन रहा है. शुद्ध घी से प्रसाद बन रहा है और रंग-बिरंगे कुरतों, अजीब-सी हेयर स्टाइल, सोने की जंजीरों और रत्नजड़ित अंगूठियों से संगीतकार. लेकिन इस सबके बीच ही भारत भर में पतन की पराकाष्ठा छू चुके सांस्कृतिक उत्सवों के संभ्रांत शोर में सच्ची जन-भागीदारी वाला एक लोक-पर्व भी बन रहा है.

यहां गुजरी पांच रातों की तुलना में यह छठवीं रात बहुत कम गर्म है. परिसर को घेरे खड़े पेड़ों को झकझोरती हवाओं ने रात सुहानी कर दी है. चप्पे-चप्पे में संगीत-रसिक पसरे हुए हैं. जो जहां से सुन सकता है, वो वहां से सुन रहा है.

आधी रात से कुछ पहले जब निलाद्री कुमार सितार को नई ऊंचाइयां दे रहे हैं, लगा कि आज रात बारिश भी हो सकती है, लेकिन यों हुआ नहीं. विजय घाटे तबले पर जो थे.

फरमाइश पर राग नट और तिलक कामोद के मिश्रण से तैयार प्रस्तुति देने से पूर्व ही निलाद्री और विजय की जोड़ी अपनी छटा बिखेर चुकी थी. उनसे पहले मीता पंडित ने बहुत बेजान-सा राग शंकरा में कुछ गाया और उनके बाद वही विरोधाभास दिखा जिसकी तरफ ऊपर इशारा हुआ है.

मंच पर भजन-विक्रेता अनूप जलोटा थे. उन्हें बुलाने में बहुत ड्रामे दरपेश आए, लेकिन वह आए और बोले, ‘ऐसे लागी लगन... मैं यह नहीं गाऊंगा.’ लेकिन उन्होंने यही गाया और जब वह इसे गा रहे थे दिबाकर बनर्जी की फिल्म ‘ओए लक्की लक्की ओए’ का सूरदास याद आ रहा था : ‘बंगाली बन गया भोपाली... गली गली गली गली गली गली गाने लगी...’

अनूप जलोटा ‘लागी लगन...’ को बहुत खींचते हैं और कहते हैं कि यह जो लंबी सांस है, बाबा रामदेव के प्राणायाम की वजह से है. आप भी करें फायदा होगा.

अनूप जलोटा की प्रस्तुति से गुजर कर लगता है कि उन्होंने अब तक कुछ खास अर्जित नहीं किया है. वह अब तक वहीं हैं, जहां से उन्होंने शुरू किया था— जागरण शैली, महंत की चाटुकारिता, फरमाइशों का आह्वान, ‘अगले साल फिर आना है और मेरे साथ गाइए’ जैसे बाजारू, सस्ते, सड़े और जाली कुमार विश्वासियन टोटके.

इन टोटकों से विशुद्ध संगीत प्रेमियों को कुछ दिक्कत होती है. इस दिक्कत को समझ कर ही शायद गिरिजा देवी ने वह सुझाव दिया जिसके अंतर्गत जिस दिन अनूप जलोटा जैसे गाएंगे, राजन-साजन मिश्र जैसे नहीं आएंगे.

अनूप जलोटा के बाद हैदराबाद से आए येल्ला वेंकटेश्वर ने जब देर तक मृदंगम बजाया, संगीत प्रेमियों के समूह बिखर चुके थे. लोग इधर-उधर संगीत की थकान लिए आंखें मूंदे हुए पड़े थे. उजाला उतरने ही वाला था जब राजन-साजन मिश्र की जोड़ी ने आरती के बाद अपना गायन शुरू किया और लगने लगा कि लौटने में एक उल्लास नहीं, एक उदासी-सी महसूस होगी.

संकट मोचन संगीत समारोह के हर दिन का हाल यहां पढ़ें:

पांचवां दिन: संतूर के संगीत से तर संकट मोचन संगीत समारोह चौथा दिन: संकट मोचन में आईं सोनल मानसिंह, लेकिन नृत्य करने नहीं तीसरा दिन: निजामी बंधुओं की कव्वाली से सूफी हुआ संकट मोचन दूसरा दिन: संकट मोचन में अमेरिकन सेक्सोफोन और बनारसी तबले की जुगलबंदी पहला दिन: 27 बरस बाद मंच पर गाने आईं चित्रा सिंह, लेकिन खुल न सकें लब

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