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संकट मोचन में आईं सोनल मानसिंह, लेकिन नृत्य करने नहीं

संकट मोचन संगीत समारोह में चौथी रात

Avinash Mishra | Published On: Apr 19, 2017 11:25 AM IST | Updated On: Apr 19, 2017 11:26 AM IST

संकट मोचन में आईं सोनल मानसिंह, लेकिन नृत्य करने नहीं

बहुत मशहूर संतूर वादक पंडित शिव कुमार शर्मा कहते हैं कि राग समझने की नहीं, सुनने और महसूस करने की चीज है. एक श्रोता कहता है कि संगीत को उसके चक्रों और आवर्तनों में समझना चाहिए. युवा तबला वादक संजू सहाय कहते हैं कि मुझे आंखें बंद करके और दिल खोल कर सुनिए. कुछ प्राचीन-सा नजर आता एक संगीत-प्रेमी कहता है कि कथक कर रहे कलाकार के पैरों को देखना चाहिए और तबला वादक के हाथों को.

‘संकट मोचन संगीत समारोह’ के 94वें संस्करण की चौथी निशा में कुछ रसिकों से बात करने पर यों लगता है कि जैसे बनारस संगीत में ही रहता है और यह जानता है कि संगीत का कोई अंत नहीं है, वह एक अनंत साधना है. वह भर रात सुनता रहता है. उजाला उस पर उतर आता है, लेकिन वह तृप्त नहीं होता और डेढ़ घंटे गा चुके उल्हास कसालकर से भैरवी से पहले ‘एक कोई और राग’ सुना देने को कहता है.

देश-काल के अनुरूप किए गए इस आग्रह पर इस संगीत-उत्सव से साल 1960 से जुड़े हरिराम द्विवेदी कहते हैं कि देखिए एक मर्यादा होती है. रोज यह कोशिश रहती है कि सुबह की आरती से पहले संकट मोचन संगीत समारोह की निशा समाप्त हो जाए, लेकिन यह हो नहीं पाता और यह निशा उषा के आर-पार फैल जाती है.

बहरहाल, उल्हास कसालकर संकट मोचन संगीत समारोह की उस चौथी निशा को राग भैरवी से विराम देते हैं जो हैदराबाद से आए वाई बाल मुरली के गायन से शुरू हुई. मुरली का गायन कर्नाटक संगीत में ढला हुआ है. उन्होंने राग रेवती एक ताल में ‘शिव शंभू... शंभू शिव...’ और राग शिवरंजनी आदि ताल में ‘श्रीराम जय राम जय जय राम...’ गाया.

बाद इसके एक इंतजार खत्म और पद्मविभूषण शिव कुमार शर्मा का संतूर शुरू होता है.

Shiv Kumar Sharma

संतूर बहुत नाजुक वाद्य है और शिव कुमार शर्मा की प्रस्तुति का समय संकट मोचन में आरती का समय भी है. शिव आवाजों को व्यवस्थित करने में इतना ज्यादा वक्त लेते हैं कि वह प्रतीक्षा की परीक्षा-सा लगता है. राग बागेश्वरी में आलाप भरने से पूर्व वह कहते हैं :

‘संगीत का उद्गम मंदिरों से हुआ है और यह परंपरा केवल भारत में रही है. अध्यात्म और संगीत एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. संगीत जब राजा-महाराजाओं के दरबारों से जुड़ा तब उसमें मनोरंजन का तत्व तो आया, लेकिन उसने अपनी अंतर्मुखता खोई नहीं. आज जब संगीत का अर्थ सिर्फ मनोरंजन ही रह गया है, हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि संगीत सबसे पहले आत्मरंजन है. वह कोई द्वंद्व-युद्ध नहीं है कि उसे क्रिकेट-मैच की तरह देखा जाए.’

शिव कुमार शर्मा ने तैयारियों में खासा वक्त लेते हुए लगभग दो घंटे तक प्रस्तुति दी और अंत में दादरा ताल में राग पहाड़ी की धुन पर लाकर अपने संतूर को रोका.

इस तरह देखें तो यह संतूर इतनी देर तक बजा कि सोनल मानसिंह का ओडिसी नृत्य संभव नहीं हो पाया, क्योंकि उनके संगतकारों को मुगलसराय से ट्रेन पकड़नी थी. लिहाजा सोनल ने उनका परिचय करा कर उन्हें विदा किया और नृत्य के स्थान पर केवल वक्तव्य प्रस्तुत किया.

इस पर आश्चर्य होना ही था, लेकिन सोनल ने कहा कि वह आज संकट मोचन के दरबार में बजरंगबली को निमंत्रण देने आई हैं. उनके संगीत संस्थान के 2 मई को 40 बरस पूरे हो रहे हैं और उन्हें यकीन है कि स्वयं हनुमान जी इस मौके पर वहां उपस्थित रहेंगे और कार्यक्रम को सफल बनाएंगे. सोनल ने एकाध अतिरंजित किस्से और हनुमान चालीसा सुना कर विदा ली.

इसके बाद पुणे से पधारे सुरेश तलवलकर का एकल तबला वादन हुआ और उसके बाद मुंबई से आए हरिहरन का गायन.

हरिहरन ने राग अभोगी कानड़ा से शुरुआत की और फिर धीमे-धीमे भजन तक आए. हरिहरन के गायन को सुन कर एक मुग्ध कर देने वाला तत्काल प्राप्त होता है. हरिहरन आएं और गजल न गाएं, यह मुमकिन नहीं है. उन्होंने मीर तकी मीर की गजल ‘पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है...’ गा कर दिल जैसी किसी चीज को जीत लिया.

बेंगलुरू से आए एस आकाश की बांसुरी और चेन्नई से आईं पद्मा शंकर के वायलिन की जुगलबंदी इस चौथी निशा की एक और प्रस्तुति रही.

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