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संकट मोचन में अमेरिकन सेक्सोफोन और बनारसी तबले की जुगलबंदी

बनारस में जारी ‘संकट मोचन संगीत समारोह’ के 94वें संस्करण की दूसरी शाम

Avinash Mishra | Published On: Apr 17, 2017 01:02 PM IST | Updated On: Apr 17, 2017 01:03 PM IST

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संकट मोचन में अमेरिकन सेक्सोफोन और बनारसी तबले की जुगलबंदी

प्रख्यात नर्तक बिरजू महाराज कहते हैं कि अपने आनंद के लिए नहीं, जगत के आनंद के लिए नाचना चाहिए. बनारस में जारी ‘संकट मोचन संगीत समारोह’ के 94वें संस्करण की दूसरी शाम की शुरुआत दिल्ली से आईं रागिनी महाराज और सिंहिनी कुलकर्णी के कथक नृत्य से हुई. इन दोनों नृत्यांगनाओं ने संगीत-रसिकों को अपने-अपने ढंग से भरपूर आनंदित किया.

सांप-सीढ़ी का खेल, कम कद वाले व्यक्ति का मंदिर के घंटे बजाने का संघर्ष, पटाखे का जलना, ट्रेन की धक्क-धक्क, गंगा का पहाड़ से नीचे समतल पर उतरना, हाथी और घोड़े की चाल और यहां तक कि जियो के खराब नेटवर्क की वजह से कैसे टूट-टूट कर बात होती है... इसे भी कथक की भाव-मुद्राओं और बोल-पढ़ंत के सहारे बता कर रागिनी और सिंहिनी दोनों ने ही संकट मोचन में अपनी पहली हाजिरी लगाई. यह दोनों के लिए एक यादगार अवसर था. सिंहिनी ने कहा भी कि इस शहर ने अगर सराह दिया तो हम नृत्यांगना हो जाएंगे.

इस नृत्य-प्रस्तुति के बाद रविंद्र नारायण गोस्वामी के सितार की स्वर-वल्लरियां थीं और तबले पर उनके साथ रजनीश तिवारी.

जैसे-जैसे रात उतरती है, संकट मोचन मंदिर के परिसर में संगीत का आलोक बिखरता जाता है. केंद्र में बहुत पीला — सूरजमुखी के रंग-सा — प्रकाश है. देश-दुनिया के कोने-कोने से आकर संगीत-प्रेमी मंदिर के कोने-कोने में फैले हुए हैं. मुख्य मंच के सामने से लेकर सब तरफ लगीं छोटी-बड़ी स्क्रींस के सामने वे संगीत की शास्त्रीयता को समझने के लिए व्याकुल-से हैं.

sankat mochak

जार्ज ब्रुक और दीपक पंडित

अंजलि पोहनकर का गायन अगली प्रस्तुति है. वह ‘जबसे श्याम सिधारे...’ (ठुमरी), ‘कोयलिया मत कर पुकार...’ (दादरा), ‘चैत मास बोले रे कोयलिया...’ (चैती) और ‘पायो जी मैंने राम रतन धन पायो...’ (भजन) गाती हैं. जानकार श्रोता इस प्रस्तुति को बेहद औसत पाते हैं और अमेरिका से आने वाले जॉर्ज ब्रुक का इंतजार करने लगते हैं. उन्हें यहां सेक्सोफोन बजाना है. मुंबई से आए दीपक पंडित (वायलिन), भवानी शंकर (पखावज) और साबिर खां (तबला) को उनका साथ निभाना है. सेक्सोफोन-वायलिन और तबला-पखावज की जुगलबंदी में राग चारु केशी से शुरू होकर लगभग ढाई घंटे चलने वाली यह प्रस्तुति मुहावरे में नहीं, सच में मंत्र-मुग्ध करती है.

संगीत का खुमार कुछ इस कदर चढ़ रहा है कि ढलती हुई रात में हर प्रस्तुति पहली प्रस्तुति से अधिक युवा लग रही है.

किराना घराने के अजय पोहनकर प्रस्तुति की तैयारी में पर्याप्त वक्त लेते हैं. इतनी तैयारी के बावजूद उनके गायन पर ओजस अड़िया का तबला भारी पड़ रहा है. ओजस तबले की नई नस्ल हैं और बहुत जोश के साथ संगत कर रहे हैं. अंतत: अजय पोहनकर ‘ए मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया...’ गाकर महफिल को थोड़ा अर्द्ध-शास्त्रीय बनाते हैं. उनके सुपुत्र अभिजीत पोहनकर जो विद्युत वीणा संभाले हुए हैं, पहले ही कह चुके हैं कि हम क्लासिकल गायन को नए साजों के साथ पेश करेंगे. सुशांत शर्मा गिटार पर हैं और तेजस विंचुरकर बांसुरी पर... अजय पोहनकर ‘पिया बावरी...’ गा रहे हैं.

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कुमार बोस, देवज्योति बोस और भवानी शंकर

हाथ उठा कर ‘हर हर महादेव’ कहते हुए कलाकारों का अभिवादन करना संकट मोचन में मौजूद संगीत-रसिकों की एक खास शैली है. उद्घोषक यहां संगतकारों का परिचय यह कह कर नहीं कराते कि यह मुख्य कलाकार का सहयोग करेंगे, बल्कि यह कह कर कराते हैं कि यहां संगतकार मुख्य कलाकार के सहयोगी नहीं उसके पूरक होते हैं. लिहाजा अगली प्रस्तुति में पता ही नहीं चल पाता कि मुख्य कलाकार कौन है— सरोद बजाते हुए देवज्योति बोस या पखावज बजाते हुए भवानी शंकर या तबला बजाते हुए कुमार बोस?

यहां तक आते-आते यों लगता है कि संकट मोचन संगीत समारोह की यह दूसरी रात तबले के नाम होती जा रही है. क्रमशः अणुब्रत चटर्जी, रजनीश तिवारी, ओजस अड़िया, साबिर खां, कुमार बोस और सबसे आखिर में संजू सहाय का एकल तबला-वादन.

युवा और धुरंधर संगीत-प्रेमी सिद्धांत मोहन संकट मोचन में संगीत सुनने का तरीका कुछ यों बयान करते हैं :

‘अणुब्रत चटर्जी से तबला शुरू करिए, साफ हाथ देखिए. हाथ चूमने की नई इच्छा से बैठे रहिए. फिर कुमार बोस का गुस्सा देखिए और आखिरी ऊंचाई पर संजू सहाय का धैर्य देखिए.'

Sankat Mochak Saneget Samaroh

तबले पर संजू सहाय

भारतीय शास्त्रीय संगीत में बनारस के तबले को बहुत लाउड माना जाता है. इसे बजाने में बहुत शक्ति लगती है. संजू सहाय कहते हैं कि वह मोटे-ताजे नहीं हैं, जब वह बजा कर उठते हैं तब उनके कंधे बहुत दर्द करते हैं. लेकिन प्रस्तुति की शक्ति उन्हें इस परिवेश से मिलती है. बनारस घराने के युवा तबला-वादक मंच पर उन्हें घेर कर बैठते हैं. वह संकट मोचन में स्टार-सरीखे हैं और बला का बजाते हैं. धर्मनाथ मिश्र हारमोनियम पर उनके साथ लहरा देने के लिए हैं.

संजू सहाय किशन महाराज के शिष्य और कंठे महाराज, गुदई महाराज, अनोखेलाल, शारदा सहाय जैसे तबला-वादकों की परंपरा के उत्तराधिकारी हैं. आत्मविश्वास और विनम्रता से एक साथ लबरेज संजू सहाय को सुन लेने के बाद केवल एक ही विकल्प बचता और वह है उनका हमेशा के लिए मुरीद हो जाना.

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