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सलमान अख़्तर: एक शायर अनजाना सा...

इस कम पहचाने जाने वाले अव्वल दर्जे के शायर का वास्ता हिंदुस्तानी शायरी के एक आला घराने से है

Raajkumar Keswani Updated On: Mar 05, 2017 11:55 AM IST

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सलमान अख़्तर: एक शायर अनजाना सा...

खिड़कियां देर से खोलीं, ये बड़ी भूल हुई, मैं ये समझा था कि बाहर भी अंधेरा होगा

इन बंद खिड़कियों के पीछे बैठे शायर का नाम है, 'सलमान अख़्तर.' पेशे से मनोरोग विशेषज्ञ और तबीयत से शायर. वे अभी फ़िलाडेलफ़िया, अमेरिका के जेफ़रसन मेडिकल कॉलेज में प्रोफेसर के तौर पर काम करते हैं. इस कम पहचाने जाने वाले अव्वल दर्जे के शायर का वास्ता हिंदुस्तानी शायरी के एक आला घराने से है.

'अज़ीम शायर मजाज़' उनके मामू, जांनिसार अख़्तर उनके पिता और जावेद अख़्तर उनके बड़े भाई हैं. उनकी मां, सफ़िया अख़्तर के ख़ुतूत का ज़िक्र अदबी दुनिया में बड़े सम्मान से किया जाता है.

31 जुलाई 1946 को लखनऊ में जन्मे डॉक्टर सलमान अख़्तर अदबी माहौल में रचे-बसे थे. उन्होंने महज़ पांच साल की उम्र में ही डाक्टर बनने का इरादा कर लिया था और उनके इस फैसले की वजह उनकी मां सफ़िया अख़्तर की लम्बी बीमारी थी. ये उनके बचपन की मासूम चाहत थी कि वे डॉक्टर बनकर अपनी मां को दुख-दर्द से निजात दिलाएंगे.

इस घर के कोने-कोने में यादों के भूत हैं, अलमारियां न खोल, बहुत मत डरा मुझे

यादों के भूत, बहुत दिन तक अलमारियों में क़ैद नहीं रह सकते. वो अक्सर आज़ाद हो ही जाते हैं. सलमान अख़्तर की यादों में मां की बेवक़्त मौत गहरे धंसी है. वे ख़ुद कम लेकिन उनकी शायरी ख़ूब बोलती है.

दिल को कुछ ऐसे मसलती है वतन की यादें, तौलिया नम कोई जिस तरह निचोड़ा जाए

सलमान ने अलीगढ़ से मनोविज्ञान चिकित्सा में एम.डी. की डिग्री हासिल की और 1973 में अमेरिका चले गए. मानव मनोविज्ञान पर उनकी लिखी दर्जनों पुस्तकें प्रचलित हैं और वे काफी प्रसिद्ध डाक्टर हैं.

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डॉक्टर सलमान अपने बड़े भाई जावेद अख़्तर से काफी पहले से शायरी करते आ रहे हैं. 1976 में उनका पहला शायरी संग्रह प्रकाशित हुआ जिसके शुरूआत में आलेख उनके पिता जां निसार अख़्तर साहब का लिखा हुआ है.

अब से कोई दस बरस पहले उनके हिंदी-उर्दू में प्रकाशित पुस्तक ‘नदी के पास’ के रिलीज़ के मौके पर जावेद अख़्तर ने कहा था, ‘उम्र में तो ये मुझसे कोई डेढ़ साल छोटा है लेकिन शायरी में मुझसे पूरे दस साल बड़ा है’.

ये हक़ीक़त है कि जावेद अख़्तर से बहुत पहले ही सलमान शायरी कर रहे हैं. उनकी शायरी का पहला संग्रह जां निसार अख़्तर साहब की ज़िंदगी में ही आ चुका था. उर्दू में प्रकाशित इस पहले संग्रह का आमुख भी जांनिसार साहब ने ही लिखा है. उन्होंने दीगर बातों के अलावा यह कहकर सलमान की शायराना सलाहियत की दाद दी थी कि ‘हमारे बाद अंधेरा नहीं, उजाला है’.

उनकी शायरी में वतन से दूरी का दर्द, ज़िंदगी के तल्ख़ तजुर्बात का बयान और ज़माने की कड़वी सच्चाइयों के साथ ही मुहब्बत का जज़्बा भी शामिल है.

जावेद अख़्तर ने अपने छोटे भाई की किताब का पेश लफ़्ज़ सलमान को एक ख़त की शक्ल में लिखा है. जज़्बाती बयान के साथ ही भाई की शायरी की ख़ूबियों के बारे में लिखा है:

'तुम्हारा हर शेर, हर मिस्रा, शायरी की फर्सूदा रिवायात का नहीं, तुम्हारी अपनी नज़र, तुम्हारी अपनी सोच का पता देता है. तुम्हारे अशआर से झलकता तुम्हारे ग़म का रंग, तुम्हारे दर्द की महक, तुम्हारी तन्हाई का सन्नाटा ये सब कुछ तुम्हारी शायरी का फ़ैशन नहीं, तुम्हारी ज़िंदगी की सच्चाई है.

मुझे तुम्हारा एक शेर याद आ रहा है:

हम बहुत दिन जिये हैं दुनिया में हम से पूछो कि ख़ुदकशी क्या है

और एक शेर

हम समुंदर पे दौड़ सकते हैं हमने इतने सराब देखे हैं

मगर जिस बात का बे-इख़्तियार एहतराम करने को जी चाहता है, वो ये है कि तुम अपने आप को, अपनी ज़िंदगी को एक फ़ासले से और बड़े “ग़ैर जानिबदार” अंदाज़ से देखने की सलाहियत और हिम्मत रखते हो:

अगर सोचूं तो डर लगता है मैं कितने झूट हर पल जी रहा हूं.

सलमान अख़्तर के शायर का भीतरी अंतरद्वंद्व इंसानी ज़िंदगी का अंतरद्वंद्व है. उनकी एक ख़ूबसूरत ग़ज़ल है.

बनना पड़ा है आप ही अपना ख़ुदा मुझे किस कुफ्र की मिली है भला ये सज़ा मुझे निकले थे दोनों भेस बदल कर तो क्या अजब मैं ढूंढता ख़ुदा को फिरा और ख़ुदा मुझे तू मुतमईं नहीं है तो मुझे कब है ऐतराज़ मिट्टी को फिर से गूंध मेरी, फिर बना मुझे

एक और ग़ज़ल है :

तुम्हारी दोस्त नवाज़ी में गर कमी होती ज़मीन टूट कर तारों पे गिर गई होती बहुत से लोग पशेमान हो गए होते जो बात सच थी अगर वो कही गई होती ख़ुशी ने ठीक किया जो हमसे दूर-दूर रही हमारे पास जो आती तो रो पड़ी होती

डॉक्टर सलमान को पढ़ते हुए लगता है कि इंसानी दिमाग़ के भीतर उठती-बैठती हिलोरों के साथ ही साथ वे दिल में उठते तूफानों से भी बात करने के कोशिश करते हैं. बात क्या करते हैं, सीधे सवाल ही करते हैं.

‘ग़म लिखा है किसने मेरे चेहरे पर

और मुझको हंसा रहा है कौन ?

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