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कहानी कोई भी हो ट्विंकल खन्ना ही हैं असल किरदार

ट्विंकल खन्ना जब स्टेज पर होती हैं तो फिर अपने असल अंदाज में होती है.

Rohini Nair | Published On: Nov 21, 2016 07:34 AM IST | Updated On: Nov 21, 2016 02:22 PM IST

कहानी कोई भी हो ट्विंकल खन्ना ही हैं असल किरदार

मुंबई के किसी भी दूसरे इलाके की तरह जुहू भी भीड़-भाड़ और शोर-शराबे से भरपूर है.

यहीं की एक सकरी सी गली के आखिरी छोर पर अरब सागर किनारे एक बंगला है. यहां जुहू से अलग शांति का एहसास होता है.

यह बंगला है अक्षय कुमार और ट्विंकल खन्ना का. बॉलीवुड के ये सितारे अपने दो बच्चों के साथ यहां रहते हैं. ट्विंकल डिजाइनर और लेखक भी हैं.

इस बंगले की दूसरी मंजिल पर मैं ट्विंकल खन्ना का इंतजार कर रही हूं. यह अक्षय के प्रोडक्शन हाउस 'ग्रेजिंग गोट' का दफ्तर है. यहीं पर ट्विंकल अपनी नई किताब ‘द लेजेंड ऑफ लक्ष्मी प्रसाद’ के बारे में मुझसे बात करने वाली है.

बालों को साधारण चोटी में बांधे, रिप्पड जिंस और जैकेट में ट्विंकल मेरे सामने आती हैं और टांग-पर-टांग रखे बैठ जाती हैं.

‘मिसेज फनीबोन्स’ के साथ साहित्य की दुनिया में सफल एंट्री करने वाली ट्विंकल की यह दूसरी किताब है. ‘द लेजेंड ऑफ लक्ष्मी प्रसाद’ चार छोटी कहानियों का संग्रह है. इनमें से एक असल जिन्दगी पर आधारित हैं. यह अरुणाचलम मुरुगनाथन पर आधारित है, जो महिलाओं के लिए सैनिटरी नैपकिन मुहैया कराने के अभियान के लिए जाने जाते हैं. बाकी तीनों ट्विंकल की सृजनात्मकता का नमूना हैं.

वैसे ट्विंकल भी कहती हैं कि उन्हें फिक्शन लिखना ज्यादा आसान लगता है. उनकी इस बात पर शायद ही कोई हैरान न हो. उनकी किताब का संपादन करने वाले भी.

नोनी अप्पा की कहानी

Twinkle Khanna at launch of her book 'The Legend of Lakshmi Prasad'. 'द लेंजेंट ऑफ लक्ष्मी प्रसाद' के लॉन्च पर ट्विंकल खन्ना। (फोटो: पीटीआई)

ट्विंकल कहती हैं,’कॉलम लिखने में समय सीमा और एक लाइन पकड़कर लिखने का दबाव होता है. हर कॉलम में आपको कुछ ऐसा भी देना होता है जो अलग हटके हो, क्योंकि एक विषय पर कॉलम लिखने वाले हजारों मिल जाएंगे. कॉलम लिखना अचानक होता है. इसे आपको एक बार में खत्म करना होता है. ’

लेकिन कहानियों में ट्विंकल बकायदा रिसर्च करती हैं. कभी-कभी दो-तीन हफ्ते का वक्त लेती हैं. अपनी कहानी की रूपरेखा तैयार कर आराम से खुले दिमाग से लिखती हैं.

‘द लेजेंड ऑफ लक्ष्मी प्रसाद’ लिखने के पीछे भी एक कहानी है. दरअसल इसकी शुरुआत ‘मिसेज फनीबोन्स’ लिखे जाने के भी दो दशक पहले हुई थी. तब ट्विंकल केवल 18 साल की थीं. ट्विंकल इसे एक उपन्यास की शक्ल देना चाहती थीं. तब इसका मुख्य किरदार भी अलग था.

इसमें कोई शक नहीं है कि ‘द लेजेंड ऑफ लक्ष्मी प्रसाद’ किताब की चारों कहानियों में से सबसे बेहतर है. यह एक ऐसी बुजुर्ग महिला की कहानी है जिसकी बदरंग जिन्दगी उसकी बहन से रंगीन होती है. नोनी अप्पा नाम की इस महिला की जिन्दगी में बहन के अलावा संगीत से लगाव रखने वाले एक पुरुष की भी दास्तां है.

भावनाओं और पात्रों का विस्तार से चित्रण ही इस कहानी की खूबसूरती है. महज चार लाइनों में इसका मर्म बयां करना नामुमकिन है.

बहन रिंकी से रिश्ता है किताब की प्रेरणा

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ट्विंकल बताती हैं,’इसे मैंने सबसे अंत में लिखा. नोनी अप्पा की कहानी को मैं 18 साल की उम्र से लिखने की कोशिश कर रही थी. पहले इस कहानी की मुख्य किरदार उनकी पोती थी. फिर मिसेज फनीबोन्स के बाद जब लिखना शुरू किया तो वही किरदार 40 पार थी. लेकिन आखिरकार ये बुजुर्ग महिलाएं इस कहानी की मुख्य पात्र बनी. अब लगता है कि इसे हमेशा से ऐसा ही होना था.’

ट्विंकल बताती हैं कि कैसे इस कहानी की प्रेरणा कहीं-न-कहीं उनकी छोटी बहन रिंकी के साथ रिश्ते से आती है.

‘हम 40 पार हैं. हम दोनों में डेढ़ साल का अंतर है. हमारा संबंध आज भी पहले जैसा अटूट है. हम अपने परिवार से साथ मशगूल हैं. मुश्किल वक्त में हम हर सूरत में एक-दूसरे के साथ होते हैं. हमें एक जैसी बातें पसंद हैं. हमें हंसी भी एक जैसी चीजों पर आती है. ठीक इसी तरह नोनी अप्पा और बिन्नी की रिश्ता भी अटूट है. एक दूसरे की खिंचाई भी दोनों ऐसे ही करतीं हैं जैसे मैं और रिंकी. ’

ट्विंकल की कहानियां भले ही असल जिंदगी से प्रेरित हों. लेकिन इसमें कई डीटेव्ल कड़ी रिसर्च का नतीजा हैं. जैसा कि वो बताती हैं, कहानी में हर लम्हे को विस्तार से चित्रण जरुरी है. इसीलिए कहानी लिखने से पहले वह एक डायरी में इससे जुड़े तमाम बिंदु नोट करके रखती हैं. फिर चाहे वह 80 के दशक के आईसीयू का चित्रण हो, दो रेलवे स्टेशनों के बीच दूरी या फिर एक स्टेशन पर ट्रेन कितनी देर रुकी, सब कुछ.

अनुशासन है सफलता का राज

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अभिनेत्री से लेखक बनी ट्विंकल की कहानियों में यह अनुशासन असल जिन्दगी से आता है. वह सुबह जल्दी उठकर बच्चों को 7 बजे स्कूल रवाना कर देती हैं. खाना बनाना भले न आए लेकिन उन्हें सबका पेट तो भरना ही है. अगर वॉक पर नहीं गईं तो वह 7.30 बजे लिखना शुरू कर देती हैं. नहीं तो, वॉक से लौटकर 8.30 बजे से अगले दो घंटे के लिए लिखती हैं. इस दौरान कोई डिस्टर्ब करने वाला नहीं होता क्योंकि किसी को उनसे कुछ चाहिए नहीं होता.

लेकिन पिछले डेढ़ महीने ट्विंकल का इस कार्यक्रम में बदलाव आया है. उन पर पब्लिशर की ओर से किताब जल्दी खत्म करने का दबाव था. इसलिए उन्हें दिन में सात-सात घंटे काम करना पड़ा.

एक आधी किताब और बीमारी के दौर में लिखी गई कुछ कविताओं के अलावा ट्विंकल ने पिछले 20 साल में कुछ लिखा नहीं था. लेकिन अब अचानक वह एक लेखिका बन चुकी हैं.

राजेश खन्ना की इस बड़ी बेटी ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि वह 60 की उम्र से पहले कभी कुछ लिखने लायक होंगी. दो बच्चों की मां ट्विंकल अपने आप को काफी खुशकिस्मत मानती हैं. उनकी छोटी बेटी महज 4 साल की है. बावजूद इसकी दो किताबें लिख लेना ट्विंकल के लिए भी चौकाने वाला है.

परिवार से बना व्यक्तित्व

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बचपन से ही अंग्रेजी उपन्यास पढ़ने की शौकीन ट्विंकल उन लेखकों की नकल नही करना चाहती थीं. हालांकि उनके जैसा अच्छा लिखने की ख्वाहिश हमेशा से ट्विंकल के मन में थी.

‘मैं एक महिला प्रधान परिवार में पली बढ़ी हूं. मेरी मां, मौसी और नानी सभी स्वतंत्र व्यक्तित्व वाली औरतें थीं. महिलाओं के लिए समाज में तय मानदंड से अलग हमारा परिवार बेहद सृजनशील था. हम रूढ़ियों से आजाद थे. इसका असर मुझ पर भी हुआ.’

बचपन में ट्विंकल जैसी दिखती थीं, उस पर उन्हें स्कूल में काफी सुनना पड़ता था. लेकिन मुंहफट और हाजिरजवाबी ने ट्विंकल को कभी दबने नहीं दिया.

बतौर ऐक्टर ट्विंकल अपनी असफलता को स्वाभाविक मानती हैं. उनका कहना है कि ऐक्टिंग में आपको किसी और से निर्देश लेकर किरदार की भावनाओं को प्रदर्शित करना होता है. लेकिन ट्विंकल का व्यक्तित्व पढ़कर समझने वाला है न कि सुनकर. वह असल जिन्दगी में काफी व्यावहारिक हैं. इस वजह से दूसरे के निर्देशन को सुनकर भावुक सीन करना उनके बस की बात नहीं थी.

ट्विंकल ऐक्टिंग की दुनिया से दूर डिजाइनिंग और लेखन में ज्यादा सुकून पाती हैं.

‘द लेजेंड ऑफ लक्ष्मी प्रसाद’ और ‘मिसेज फनीबोन्स’ के बाद अब ट्विंकल अपनी तीसरी किताब का विषय तलाश रहीं हैं.

ट्विंकल मानती हैं कि उन पर ‘मिसेज फनीबोन्स’ जैसी उम्मीद रखना बेमानी होगी. उन्हें शुरुआत में विषय चुनते समय जरुर थोड़ी घबराहट होती है. लेकिन एक बार वह स्टेज पर होतीं हैं तो फिर ट्विंकल खन्ना अपने असल अंदाज में होती है. आखिर ट्विंकल ही ट्विंकल हो सकती हैं.

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