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रमजान 2017: जानिए रमजान से जुड़े सभी सवालों का जवाब

दुनिया भर के मुसलमान पहली बार कुरान के उतरने की याद में पूरे महीने रोजे रखते हैं

FP Staff Updated On: May 27, 2017 05:55 PM IST

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रमजान 2017: जानिए रमजान से जुड़े सभी सवालों का जवाब

इस्लामी कैलेंडर का नौवां महीना रमजान है जिसे अरबी भाषा में रमादान कहते हैं. रमादान शब्द 'रमाधा' से आया है जिसका मतलब होता है कि 'सूरज की गर्मी.' इस महीने का यह नाम इसलिए रखा गया था क्योंकि इस महीने में 'मुसलमानों के पाप जल जाते हैं.'

लूनर कैलेंडर के अनुसार नौवें महीने यानी रमजान को 610 ईस्वी में पैगंबर मोहम्मद पर कुरान प्रकट होने के बाद मुसलमानों के लिए पवित्र घोषित किया गया था.

दुनिया भर के मुसलमान पहली बार कुरान के उतरने की याद में पूरे महीने रोजे रखते हैं. इस साल रमजान 28 मई से शुरू हो रहा है 27 जून (ईद उल फितर) को खत्म होगा. हालांकि, ये तारीखें हर साल लगभग 11 दिन खिसक जाती हैं.

रमजान में क्या होता है?

मुसलमान महीने भर सुबह से लेकर सूरज छिपने तक बिना खाए पिए रहते हैं- इस दौरान संयम का सिद्धांत लागू होता है. जो मुसलमान रोजे रखते हैं वे सवेरे बहुत जल्दी उठ जाते हैं और सुबह से पहले ही खा लेते हैं जिसे सहरी कहते हैं. और शाम को वे इफ्तार के साथ अपना रोजा खोलते हैं.

रोजे के ये घंटे दुनिया भर में अलग-अलग होते हैं. भारत में रोजा जहां लगभग 15 घंटे का होता है वहीं ऑस्ट्रेलिया में यह सिर्फ 11 घंटे का होता है.

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शिया और सुन्नी समुदाय दोनों ही सूरज के डूबने और चांद के निकलने पर ही रोजा तोड़ते हैं

शिया और सुन्नी समुदाय दोनों ही सूरज के डूबने और चांद के निकलने पर ही रोजा तोड़ते हैं

दान और सबाब का महीना

रमजान का महीना दान करने, पुण्य यानी सबाब कमाने और दरियादिली दिखाने के इस्लाम के बुनियादी सिद्धांतों से भी जुड़ा है. रमजान इस्लाम के पांच स्तंभों में से एक है. इसे सब्र यानी संयम को मजबूत करने और बुरी आदतों को छोड़ने का जरिया भी माना जाता है.

इस्लाम के पांच अन्य स्तंभों में धर्म पर सच्ची श्रद्धा रखना, नमाज पढ़ना, जकात यानी दान देना और हज करना शामिल है. मुसलमान रमजान के महीने में अक्सर दान देते हैं. इसके अलावा मस्जिदें और सहायता संगठन हर रोज रात को लोगों को मुफ्त में खाना खिलाते हैं.

रोजे रखने को आत्मसंयम के जरिए शारीरिक और आध्यात्मिक रूप से पवित्र होने के तरीके के तौर पर भी देखा जाता है. रमजान के महीने में दिन के दौरान महिला और पुरुष के बीच शारीरिक संबंध बनाने पर भी रोक है. इसके अलावा मुसलमानों को इस दौरान संयमित और अनुशासित व्यवहार करने के लिए प्रेरित किया जाता है.

इसका मतलब है कि उन्हें किसी की बुराई या गपशप..किसी को बुरा भला कहने और लड़ाई झगड़े में न पड़ने की हिदायत दी जाती है. रोजे रखने का मकसद मुसलमानों को यह याद दिलाना भी है कि गरीबों और जरूरतमंदों के प्रति दयाभाव रखना और उनकी मदद करना कितना जरूरी है.

क्या शिया और सुन्नियों के रमजान में कोई अंतर होता है?

दोनों के लिए रमजान के रीति रिवाज एक जैसे ही है. लेकिन कुछ थोड़े से अंतर भी हैं. मिसाल के तौर पर सुन्नी मुसलमान अपना रोजा सूरज छिपने पर खोलते हैं. मतलब उस वक्त सूरज बिल्कुल दिखना नहीं चाहिए. वहीं शिया लोग आकाश में पूरी तरह अंधेरा होने तक इंतजार करते हैं.

शियाओं के यहां रमजान के दौरान तीन दिन की छुट्टी अलग से होती है. ऐसा अली इब्न अबी तालिब की शहादत की याद में किया जाता है. वह इस्लाम के चौथे खलीफा और पैगंबर मोहम्मद के दामाद थे.

पैगंबर मोहम्मद की मौत के बाद बहुत से लोग उन्हें ही खलीफा बनाने के हक में थे लेकिन यह पद पैगंबर के ससुर और विश्वासपात्र अबु बकर को मिला. यहीं से इस्लाम में शिया-सुन्नी विवाद की बुनियाद पड़ी.

हालांकि, अबु बकर और उनके लिए दो उत्तराधिकारियों की मौत के बाद अली को खलीफा बनाया गया लेकिन तब तक दोनों धड़ों में मतभेद बहुत गहरे हो चुके थे.

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दुनियाभर के देशों में रह रहे मुसलमान रमजान के महीने में अलग-अलग नियमों का पालन करते हैं (प्रतीकात्मक तस्वीर)

दुनियाभर के देशों में रह रहे मुसलमान रमजान के महीने में अलग-अलग नियमों का पालन करते हैं

रमजान की परंपराओं में क्या अंतर है?

इंडोनेशिया के कुछ हिस्सों में मुसलमान लोग पवित्र महीना शुरू होने से पहले साफ पानी में खुद को जलमग्न कर देते हैं ताकि वे आध्यात्मिक और शारीरिक रूप से शुद्ध हो सकें. इस तरह के स्नान को वहां ‘पादुसान’ कहते हैं.

पश्चिमी एशिया में रमजान के चौथे दिन को गारांगाओ के तौर पर मनाया जाता है. इस दिन बच्चे पारंपरिक पोशाकों में सज धज कर कपड़े के थैले लिए पड़ोसियों के यहां जाते हैं और गारांगाओ गीत गाते हुए खजूर, टॉफी और बिस्किट जैसी छोटी मोटी चीजें जमा करते हैं.

मिस्र में रमजान के महीने के दौरान इफ्तार के समय सड़कों पर बड़ी-बड़ी लालटेनें लगाने की परंपरा है. इसके पीछे एक कहानी है कि मिस्र ने खलीफा मोएज एदिन अल्लाह का स्वागत काहिरा में लालटेन लटका कर ही किया था.

मध्य एशियाई देश ताजिकिस्तान में लोगों से गरीबों को सामान दान करने को कहा जाता है. इसके अलावा दुकानों से जरूरत की चीजें दाम कम करने की अपील भी की जाती है.

बोनस: यह सब तो बहुत बढ़िया है, लेकिन मैं तो मुसलमान नहीं हूं. तो मैं क्या करूं?

देखिए सबसे पहले तो आप अपने मुसलमान भाइयों और दफ्तर में काम करने वाले साथियों से इज्जत के साथ पेश आइए..उन्हें परेशान मत करिए...उनसे कुछ खाने पीने को मत कहिए और उनसे यह भी कभी मत कहिए कि 'टेक इट ईजी.'

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