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मैं भी मरूंगा, और भारत भाग्य विधाता भी मरेंगे

व्यवस्था को गाली बकता रहा और हां कविता लिखता रहा.

Piyush Raj Piyush Raj | Published On: Dec 08, 2016 07:55 PM IST | Updated On: Dec 09, 2016 03:51 PM IST

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मैं भी मरूंगा, और भारत भाग्य विधाता भी मरेंगे

8 दिसंबर 2016 को रमाशंकर यादव ‘विद्रोही’ को गुजरे ठीक एक साल हो गए. पर ये विद्रोही थे कौन भला और इनके बारे में जानना जरूरी क्यों है?

अगर आपकी आज के हिंदी साहित्य और इसकी राजनीति जानने की इच्छा हो तो विद्रोही बढ़िया जरिया हैं. इसके अलावा विद्रोही एक हिंदी कवि है. इनके बारे में जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के छात्र खूब बात करते हैं लेकिन जेएनयू में विद्रोही को पढ़ा चुके नामवर सिंह और मैनेजर पांडेय जैसे बड़े विद्वान चुप ही रहते हैं. कभी-कभार भाषणों में जिक्र करना और बात है.

मैं भी मरूंगा

और भारत भाग्य विधाता भी मरेंगे

मरना तो जन-गण-मन अधिनायक को भी पड़ेगा

लेकिन मैं चाहता हूं

कि पहले जन-गण-मन अधिनायक मरें

फिर साधू के काका मरें

यानी सारे बड़े-बड़े लोग पहले मर लें

फिर मैं मरुं- आराम से, उधर चलकर बसंत ऋतु में

जब दानों में दूध और आमों में बौर आ जाता है

या फिर तब जब महुवा चुने लगता है

या फिर तब जब वनबेला फूलती है

नदी किनारे मेरी चिता दहक कर महके

और मित्र सब करें दिल्लगी

कि ये विद्रोही भी क्या तगड़ा कवि था

कि सारे बड़े-बड़े लोगों को मारकर तब मरा

तो विद्रोही का किस्सा दरअसल यूं है कि गरीब घर का एक लड़का वकालत की पढ़ाई छोड़ कर हिंदी साहित्य में पढने के लिए जेएनयू आ गया. जल्द ही जेएनयू में आंदोलन करने के कारण इसे निकाल दिया गया. लेकिन ये लड़का यहां से गया नहीं.

ये लड़का यहीं जेएनयू के मैदान में, जंगलों में, गलियारों में पड़ा रहा लड़कों में से जिसने बात की उससे बतियाता रहा. व्यवस्था को गाली बकता रहा और हां कविता लिखता रहा.

यह नाम सुनते ही आपको लग रहा होगा कि आखिर यह आदमी कौन है? जिसके बारे में यहां लिखा जा रहा है. आप में से कुछ लोगों ने, खासकर सेंट्रल यूनिवर्सिटियों में हिंदी पढ़ने वाले या वे जिनकी हिंदी साहित्य के बारे में थोड़ी रुचि है; शायद उन्होंने यह नाम सुना हो. फिर भी इनमें से अधिकतर लोग इन्हें जेएनयू में रहने वाले एक खानाबदोश कवि के रूप में ही जानते हैं.

कई लोगों का यह भी मानना हो सकता कि हिंदी साहित्य में यह कवि बहुत चर्चित नहीं है और जेएनयू के कुछ वामपंथी सिरफिरे लोग इसका गुणगान करते रहते हैं.

मौखिक परंपरा का आधुनिक कवि

हालांकि यह भी एक तथ्य है कि हिंदी ही नहीं विश्व के कई बड़े कवि-साहित्यकारों की प्रतिभा का लोहा इस संसार ने बहुत बाद में चलकर माना है. हिंदी साहित्य में ही कबीर, तुलसी, निराला जैसे कवियों को उनके जीते-जी वह सम्मान नहीं मिला, जिसके वे हकदार थे. यह अलग बात है कि इन्हें इसकी कोई विशेष इच्छा भी नहीं थी.

‘विद्रोही’ भी कुछ ऐसे ही कवि थे. वे अपने को कबीर की मौखिक परंपरा से जोड़ते थे और जिस तरह कि ‘छपास’ प्रवृत्ति आजकल के कवियों में पाई जाती है, ‘विद्रोही’ के भीतर इसका नामोनिशान नहीं था. उन्हें सिर्फ अपनी ही नहीं बल्कि कालिदास, कबीर, सूर, जायसी, तुलसी से लेकर कई आधुनिक कवियों की कविताएं मुंहजबानी याद थीं. दिल्ली और जेएनयू के भीतर होने वाले प्रदर्शनों में अक्सर वे अपनी कविताएं मुंहजबानी सुनाया करते थे. बल्कि इन विरोध-प्रदर्शनों-कार्यक्रमों का समापन विद्रोही की कविताओं से होता था.

रमाशंकर यादव कुछ यूं बने विद्रोही

अक्सर शायर या कवि अपना उपनाम या तखल्लुस खुद रखते हैं.

लेकिन रामशंकर यादव को ‘विद्रोही’ का उपनाम उनके प्रशंसकों ने दिया था और उन्होंने यह उपनाम भाता भी था.

मेरे जैसे कई लोग उनके असली नाम को बहुत बाद में जान पाए थे.

विद्रोही का जन्म 3 दिसंबर 1957 को सुल्तानपुर जिले के एक ऐरी फिरोजपुर में हुआ था. उनकी पत्नी शांति देवी से उनका बाल-विवाह हुआ था. शांति जी पढ़ने जाती थीं और विद्रोही जी भैंस चराया करते थे. गांव के लोगों ने कहा कि रमाशंकर की पत्नी उसके जैसे अनपढ़ को छोड़ देगी. इस भय से विद्रोही ने पढ़ना शुरू किया. बी.ए. करने के बाद एल.एल.बी. करने की कोशिश की लेकिन पैसे के अभाव में उन्हें एल.एल.बी. की पढ़ाई छोड़कर नौकरी करनी पड़ी. लेकिन उन्हें यह नौकरी रास नहीं आई और 1980 में वे हिंदी साहित्य में एमए करने जेएनयू आ गए.

1983 में जेएनयू में एक बड़ा छात्र-आंदोलन हुआ और इसमें हिस्सा लेने के कारण उन्हें कैंपस से निकाल दिया गया. उनपर मुकदमा भी चला. इसके बाद जेएनयू के छात्र तो वे नहीं रहे लेकिन जेएनयू कैंपस को फिर वे कभी छोड़ नहीं पाए.

विद्रोही के रूप में खानाबदोश, फक्कड़ और फटेहाल जिंदगी की शुरुआत यहीं से हुई. यहीं से उनके बारे में कई तरह की कहानियों की शुरुआत भी हुई. वैसे भी कवियों और कविताओं एक खासियत उनका रहस्यमय होना भी है.

विद्रोही जेएनयू के शायद एकमात्र वैसे छात्र रहे हैं, जिसने जेएनयू में जीवनयापन के लिए जेएनयू के जंगलों से लकड़ी चुनकर खाना बनाने से लेकर पान और सब्जी की दुकान तक चलाई है.

हिंदी साहित्य की मुख्यधारा ने की उपेक्षा

विद्रोही से जुड़ी कहानियों में यह भी खूब प्रचलित है कि उन्हें जब टर्म पेपर लिखकर देने को कहा गया तो उन्होंने इसे बोलकर सुनाने की जिद की और इसी के आधार पर ग्रेड देने को कहा. भारतीय भाषा केंद्र, जेएनयू (जेएनयू में तब हिंदी और उर्दू की पढ़ाई इसी केंद्र में होती थी, अब हिंदी, उर्दू के साथ-साथ तमिल और कन्नड़ साहित्य भी इस केंद्र में पढ़ाया जाता है.) के शिक्षकों ने ऐसा करने से मना कर दिया और इस तरह विद्रोही को बतौर छात्र जेएनयू से निकाल दिया गया.

संभव है कि यह सिर्फ एक कपोल-कल्पित कथा हो लेकिन विद्रोही का मूल्यांकन करने में आजतक इस केंद्र के नामचीन विद्वान कतराते हैं. मैं यहां यह बात उनकी कविता के बारे में कह रहा हूं. हिंदी साहित्य के बड़े आलोचकों ने विद्रोही के बारे में कुछ खास नहीं लिखा है. हिंदी साहित्य की एक यह बुरी प्रवृत्ति ही कहूंगा कि यहां आलोचकों के चश्मे से कवियों को देखे जाने की प्रवृत्ति बढ़ गई है.

यह संभव है कि कुछ लोग यह तर्क दें कि विद्रोही लंबे समय तक कहीं छपे नहीं.

उनके कुछ प्रशंसकों और जनसंस्कृति मंच के प्रयास से 2011 में उनकी हिंदी और अवधी कविताओं की पहली और एकमात्र कविता संग्रह ‘नई खेती’ प्रकाशित हुई.

एक साल से भी कम के समय में इसकी 1000 से अधिक प्रतियां बिक गई और 2012 से ही यह आउट ऑफ प्रिंट है. अगर आप हिंदी साहित्य में पुस्तकों की बिक्री के हालत के बारे में थोड़ी सी भी जानकारी रखते हैं तो आप यह जान गए होंगे कि यह एक रिकॉर्ड बिक्री थी. हिंदी साहित्य में नामचीन साहित्यकारों, आलोचकों और विद्वानों की किताबें भी इतनी जल्दी और इतनी संख्या में नहीं बिकती हैं.

बिक्री हो सकता है कि एकमात्र पैमाना न हो लेकिन क्या लोकप्रियता कोई पैमाना नहीं. मैंने विद्रोही और वामपंथ से घोर वैचारिक असहमति रखने वालों को भी, विद्रोही की कविताओं की मुक्तकंठ से प्रशंसा करते सुना है. कोई तो कारण जरूर होगा कि विद्रोही के शिक्षकों ने उनकी कविताओं के प्रकाशित होने पर भी आज तक कुछ नहीं लिखा है. जनदबाब में बोलकर या भाषण में प्रशंसा करना अलग बात है.

लय का कवि

वैसे अक्खड़-फक्कड़ और खानाबदोश विद्रोही पर कई फिल्मों भी बन चुकी हैं. उन पर बनी और अंतरराष्ट्रीय सम्मान से सम्मानित फिल्म ‘मैं तुम्हारा कवि हूं’ को आप यूट्यूब पर देख सकते हैं.

दरअसल विद्रोही चाहते थे कि लोग उनके मरने के बाद उन्हें याद करते हुए कहें- ‘विद्रोही भी क्या तगड़ा कवि था.’ वे सचमुच में तगड़े कवि थे भी. पर इसके लिए वे किसी बड़े आलोचक का मुंह नहीं जोह रहे थे.

वे आम भाषा में आम इंसान की बात को कविता में कहते थे. एक पुरुष की कविता कैसे महिला-मुक्ति के साथ खड़ी होती है, यह उनकी कई कविताओं में देखा जा सकता है. ‘दादी’, ‘नानी’, मां और बेटी के जरिए वे अपनी कविताओं में नारी-मुक्ति के लिए प्रतिबद्ध कवि दिखते हैं.

उनकी कविता में खेती, पशुचारण से लेकर इतिहास, भूगोल, वेद, पुराण आदि से जुड़े शब्द, इमेज और कथाएं आती हैं. लेकिन यह कहीं से भी ऊपर से जबरन लादी हुई या ओढ़ी हुई नहीं लगती है. कविता की लय में यह बहुत ही सहज तरीके से आती है और कोई अनपढ़ भी इन्हें समझ सकता है.

उनकी व्यक्तिगत चौहद्दी भले ही जेएनयू या दिल्ली तक ही सीमित थी पर उनकी कविता इस चौहद्दी को कब का लांघ चुकी थी. सबूत के तौर पर इस लेख के अंत में उनकी कुछ कविताएं और कविताओं की कुछ पंक्तियां दी रही है, जो उनके कविता संग्रह ‘नई खेती’ से ली गई हैं.

1. ‘नई खेती’

मैं किसान हूं आसमान में धान बो रहा हूं कुछ लोग कह रहे हैं कि पगले! आसमान में धान नहीं जमा करता मैं कहता हूं पगले! अगर जमीन पर भगवान जम सकता है तो आसमान में धान भी जम सकता है और अब तो दोनों में से कोई एक होकर रहेगा या तो जमीन से भगवान उखड़ेगा या आसमान में धान जमेगा.

2. धरम

असल में हर महाभारत एक नए महाभारत की गुंजाइश पे रुकता है, जहां पर अंधों की जगह अवैधों की जय बोल दी जाती है. फाड़कर फेंक दी जाती है उन सब की अर्जियां जो विधाता का मेड़ तोड़ते हैं. xxx सदियां बीत जाती हैं, सिंहासन टूट जाते हैं, लेकिन बाकी रह जाती है खून की शिनाख्त, गवाहियां बेमानी बन जाती हैं और मेरा गांव सदियों की जोत से वंचित हो जाता है क्योंकि कागजात बताते हैं कि विवादित भूमि राम-जानकी की थी.

3. मोहनजोदड़ो की आखिरी सीढ़ी से...

मैं सोचता हूं और बारहा सोचता हूं कि आखिर क्या बात है कि प्राचीन सभ्यताओं के मुहाने पर एक औरत की जली हुई लाश मिलती है और इंसानों की बिखरी हुई हड्डियां मिलती हैं जिनका सिलसिला सीथिया की चट्टानों से लेकर बंगाल के मैदानों तक और सवाना के जंगलों से लेकर कांहा के वनों तक चला जाता है. xxx मैं इस औरत की जली हुई लाश पर सिर पटककर जान दे देता अगर मेरी एक बेटी न होती तो... और बेटी है, कि कहती है कि पापा तुम बेवजह ही हम लड़कियों के बारे में इतने भावुक होते हो! हम लड़कियां तो लकड़ियां होती हैं जो बड़ी होने पर चूल्हे में लगा दी जाती हैं. xxx इतिहास में पहली स्त्री हत्या उसके बेटे ने अपने बाप के कहने पर की. जमदग्नि ने कहा कि ओ परशुराम! मैं, तुमसे कहता हूं कि अपनी मां का वध कर दो, और परशुराम ने कर दिया. इस तरह पुत्र पिता का हुआ और पितृसत्ता आई. xxx इतिहासकारों का मत मत ये भी है कि राजा भी मरा, उसकी रानी भी मरी, और उसका बेटा भी मर गया. राजा लड़ाई में मर गया, रानी कढ़ाई में मर गई, और, बेटा कहते हैं कि पढ़ाई में मर गया.

4. औरतें

इतिहास में वह पहली औरत कौन थी, जिसे सबसे पहले जलाया गया, मैं नहीं जानता, लेकिन जो भी रही होगी, मेरी मां रही होगी. लेकिन मेरी चिंता यह है कि भविष्य में वह आखिरी औरत कौन होगी, जिसे सबसे अंत में जलाया जाएगा, मैं नहीं जानता, लेकिन जो भी होगी मेरी बेटी होगी और मैं यह होने नहीं दूंगा.

5. हमारी दुनिया, हमारी भैंस

मैं अहीर हूं, और ये दुनिया मेरी भैंस है. मैं उसे दुह रहा हूं, और कुछ लोग उसे कुदा रहे हैं. ये कौन लोग हैं जो कुदा रहे हैं, आपको पता है? क्यों कुदा रहे हैं, ये भी पता है?

6. इक आग का दरिया है...

औरत का तन और मुर्दे का कफन बिकता हुआ देखकर मेरे प्यार का सोता सूख गया, मेरे प्रेम का दूर्वांकुर मुरझा गया. मैंने समझा प्यार व्याभिचार है, शादी बर्बादी है, लेकिन जब प्रथम दृष्टया मैंने तुमको देखा, तो मुझे लगा कि प्यार मर नहीं सकता, वह मृत्यु से भी बलवान होता है.

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