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राम आडवाणी बुक सेलर्स : लखनवी नफासत की यादें

राम आडवाणी बुकसेलर्स की दुकान भी रविवार 6 नवंबर को बंद हो गई.

Ajay Singh Ajay Singh | Published On: Nov 08, 2016 07:23 AM IST | Updated On: Nov 21, 2016 01:06 PM IST

राम आडवाणी बुक सेलर्स : लखनवी नफासत की यादें

अस्सी के दशक तक लखनऊ वालों के लिए हजरतगंज की मेफेयर इमारत तफरीह मारने की मनपसंद जगह हुआ करती थी. इस इमारत में मेफेयर टॉकीज नाम का एक मूवी थियेटर, कुलीन वर्ग की छाप लिए क्वॉलिटी रेस्टोरेंट और एक क्लासी बुक शॉप राम आडवाणी बुकसेलर्स हुआ करती थी.

ये तीन ठिकाने मिलकर लखनऊ की जो पहचान बनाते हैं, उसे उर्दू में कुछ यूं कहा गया है- 'लखनऊ हम पर फिदा है और हम फिदा-ए-लखनऊ.'

ये तीनों ठिकाने मेफेयर इमारत की पहचान थी. इनमें से आखिरी राम आडवाणी बुकसेलर्स की दुकान भी रविवार 6 नवंबर को बंद हो गई.

अपने छात्र जीवन में मैं नियमित तौर पर 'योजना और सेमिनार' जैसी पत्रिकाएं खरीदने राम आडवाणी बुक स्टोर्स पर जाया करता था. अमूमन राम आडवाणी दुकान के एक कोने में बैठकर चुपचाप लोगों को सही टाइटल या मैगजीन के बारे में गाइड किया करते थे.

उन्हें लखनऊ और अवध की संस्कृति के बारे में काफी जानकारी थी, जिससे स्कॉलर्स को सही रिसोर्स हासिल करने में काफी मदद मिलती थी.

राम आडवाणी के साथ मेरी सबसे दिलचस्प मुलाकात 1990 के दशक में हुई थी. राम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद का आंदोलन अपने चरम पर था. टाइम्स ऑफ इंडिया के एक रिपोर्टर के तौर पर मैंने एक स्टोरी फाइल की थी. ये स्टोरी इस मामले के कानूनी पहलू को उजागर कर रही थी.

अगली सुबह मुझे राम आडवाणी का एक फोन आया. वह चाहते थे कि मैं उनकी दुकान पर आकर उनसे कुछ बात करुं. जब मैं वहां पहुंचा तो राम आडवाणी अयोध्या पर काम कर रहे एक विदेशी स्कॉलर के साथ थे. वो स्कॉलर अयोध्या के विवादित स्थल का ताला खोलने की कानूनी जटिलताओं के बारे में बता रहे थे.

बातचीत के दौरान मुझे यह अहसास हुआ कि समसामयिक, सामाजिक और राजनीतिक मामलों पर आडवाणी की समझ उस मामले पर किसी स्कॉलर्स से कहीं ज्यादा गहरी है. उनसे मेरी आखिरी मुलाकात भी उतनी ही दिलचस्प थी. करीब 8 साल पहले मैं उनकी बुक शॉप पर गया और उनका जोश देखकर मुझे सुखद आश्चर्य हुआ.

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शुरुआत में मुझे उनसे बात करने में थोड़ी हिचक हुई. मुझे लग रहा था कि शायद वह मुझे पहचान नहीं पाएंगे. लेकिन राम आडवाणी ने मेरी हिचक को भांप लिया. वह मेरे पास आए और पूछा कि क्या वो किताब ढूंढने में मेरी कुछ मदद कर सकते हैं ?

लेकिन जैसे ही उन्होंने मुझे पहचाना, मुझसे बोले, 'अगर आप कल लखनऊ में हैं, तो लंच पर आइए.’

हजरतगंज की मेफेयर इमारत में राम आडवाणी की मौजूदगी लखनऊ की पुरानी शान और इसकी 'नजाकत और नफासत' की याद दिलाता है.

अवध के कल्चर पर काम करने वाले स्कॉलर्स के लिए यह बुक शॉप खजाना थी. नब्बे के दशक से अब तक लखनऊ और अवध में पूरी तरह बदल चुका है. मंदिर और मंडल आंदोलन की वजह से लखनऊ की संस्कृति की जगह राजनीतिक लंपटगीरी ने ले ली.

लखनऊ के पुराने लोग हजरतगंज के आसपास तफरीह करते थे, जिसे 'गंजिंग' कहते है. हजरतगंज मार्केट के एक किलोमीटर दायरे में भगवती चरण वर्मा, अमृत लाल नगर, यशपाल जैसे हिंदी के नामी साहित्यकार या लखनऊ यूनिवर्सिटी और किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज के प्रोफेसर मिल जाएंगे.

अस्सी के दशक तक देश की सबसे ज्यादा आबादी वाले इस राज्य के मुख्यमंत्री अपने दोस्तों और पत्रकारों के साथ इंडिया कॉफी हाउस में बतियाते मिल जाते थे.

लेकिन एक नई राजनीतिक संस्कृति पनपने से लखनऊ के चरित्र और संस्कृति में तेजी से बदलाव आए और ये सारी यादें दफन हो गई. अब लखनऊ के कुलीन भी किसी दूसरे शहरों की तरह ही भावशून्य और चिड़चिड़े हो गए हैं.

ऐसी स्थिति में राम आडवाणी बुकसेलर्स की मौजूदगी पुराने लखनऊ की खामोश पहचान थी. रविवार को यह शॉप बंद होने के बाद इतिहास का एक महत्वपूर्ण पन्ना हमेशा के लिए खत्म हो गया.

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