विधानसभा चुनाव | गुजरात | हिमाचल प्रदेश
S M L

किस भजन ने कराई थी लता मंगेशकर और संगीतकार जयदेव में दोबारा दोस्ती

अगर लता वो भजन नहीं गातीं तो देव आनंद ने संगीतकार को ही बदलने की ठान ली थी

Shivendra Kumar Singh Shivendra Kumar Singh Updated On: Sep 10, 2017 09:38 AM IST

0
किस भजन ने कराई थी लता मंगेशकर और संगीतकार जयदेव में दोबारा दोस्ती

साल 1961 की बात है. मशहूर अभिनेता देव आनंद एक फिल्म बना रहे थे. इस फिल्म में उनके साथ नंदा, साधना शिवदासानी, लीला चिटनिस और ललिता पवार अभिनय कर रहे थे. यूं तो फिल्म के निर्देशक के तौर पर नाम अमरजीत का लिया जाता है लेकिन देव आनंद का दावा रहा कि फिल्म का निर्देशन उनके भाई विजय आनंद ने किया था. इस फिल्म के एक गाने की कहानी बहुत ही दिलचस्प है.

हुआ यूं कि देव आनंद और विजय आनंद ने इस फिल्म में संगीत बनाने का जिम्मा जयदेव को दिया था. देव आनंद अपनी फिल्मों के संगीत को लेकर बहुत मेहनत किया करते थे. गीत लिखने का जिम्मा साहिर लुधियानवी पर था. साहिर ने इस फिल्म के लिए एक से बढ़कर एक गीत लिखे. मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया, अभी ना जाओ छोड़कर, कभी खुद पे कभी हालात पे रोना आया जैसे सुपरहिट नगमे इस फिल्म में थे.

इसी फिल्म में एक और गाना था जिसे लेकर बड़ी दिलचस्प कहानी है. आप पहले उस गाने को सुनिए फिर उसके बनाए जाने की कहानी भी आपको सुनाते हैं.

करीब पचास साल से भी ज्यादा पुराने इस गाने को आज भी लोग भूले नहीं हैं. किस्सा यूं हुआ कि इस गाने के लिए देव आनंद और विजय आनंद ने तय किया कि इसे लता मंगेशकर ही गाएंगी. परेशानी ये थी कि उन दिनों लता मंगेशकर और फिल्म के संगीतकार जयदेव के बीच बातचीत बंद थी.

दरअसल इस फिल्म से पहले किसी बात पर जयदेव और लता जी में मतभेद हो गया था. लता मंगेशकर ने जयदेव के संगीतबद्ध गानों को गाने से मना कर दिया था. मुसीबत तब और बढ़ गई जब देव आनंद और विजय आनंद ने तय किया कि अगर इस गाने को लता जी से गवाने के लिए संगीतकार को बदलना पड़ा तो उससे भी वो चूकेंगे नहीं. अपनी बात को लता मंगेशकर के साथ साझा करने के लिए वो दोनों उनके घर पहुंच गए. दोनों भाइयों ने लगभग जिद करने जैसी हालत में लता जी को बता भी दिया कि अगर वो गाना नहीं गाएंगी तो वो संगीतकार को ही बदल देंगे.

राग गौड़ सारंग पर था ये भजन

लता मंगेशकर ने लिए बड़ी दुविधा का वक्त था. वो ये नहीं चाहती थीं कि छोटी सी बात पर हुए मतभेद के लिए जयदेव को फिल्म से हटा दिया जाए. नतीजा ये हुआ कि उन्होंने गाने के लिए अपनी हामी भर दी. इस गाने को तैयार करने के दौरान ही जयदेव और लता मंगेशकर में फिर से बातचीत शुरू हुई. इस गाने की लोकप्रियता के बारे में कुछ भी कहा जाए वो कम है. लता मंगेशकर ने अपने लगभग ज्यादातर स्टेज शो में इस गाने को गाया है.

इस गाने की रिकॉर्डिंग के बाद जयदेव और लता मंगेशकर ने काफी फिल्मों में साथ काम किया. जयदेव के संगीत निर्देशन में लता मंगेशकर ने बाद मे ‘ये दिल और उनकी निगाहों के साए’ (फिल्म प्रेम पर्बत) और ‘तू चंदा मैं तेरी चांदनी’ (फिल्म रेशमा और शेरा) जैसे कई और सुपरहिट गाने गाए.

वापस लौटते हैं अल्लाह तेरा नाम पर. ये भजन संगीत निर्देशक जयदेव ने राग गौड़ सारंग पर कंपोज किया था. इस शास्त्रीय राग पर यूं तो कई फिल्मी गाने कंपोज किए गए हैं लेकिन शायद ही कोई और गीत ‘अल्लाह तेरो नाम’ जैसा लोकप्रिय हुआ हो. 1952 में आई फिल्म आसमां का ‘देखो जादू भरो मोरे नैना’, 1953 में आई फिल्म हमदर्द का ‘ऋतु आए ऋतु जाए’ और फिल्म सोसाइटी का ‘लहरों में झूलूं’ पसंद किया जाता है. फिल्म एकादशी में अविनाश व्यास के संगीत में लता मंगेशकर ने राग गौड़ सारंग में ये गीत भी गाया था. जिसके बोल थे ‘झूलो झूलो रे झुलना झुलाऊं’. आप भी इस गीत को सुनिए.

फिल्मी गीतों से अलग इस राग में विश्वविख्यात ग़ज़ल गायक जगजीत सिंह की गाई एक ग़ज़ल भी काफी लोकप्रिय हुई थी. 90 के दशक में आई जगजीत सिंह की एल्बम ‘फेस टू फेस’ के लिए ये ग़ज़ल खामोश गाजीपुरी ने लिखी थी, जिसके बोल थे- दैरा हरम में बसने वालों. आइए जगजीत सिंह की मखमली आवाज में इस ग़ज़ल को सुनते हैं.

आइए अब आपको राग गौड़ सारंग के शास्त्रीय पक्ष के बारे में बताते हैं. इस राग की उत्पत्ति कल्याण थाट से हुई है. इस राग में दोनों ‘म’ यानी शुद्ध ‘म’ और तीव्र ‘म’ दोनों का इस्तेमाल होता है. तीव्र म का वक्र प्रयोग किया जाता है. राग गौड़ सारंग में ‘ग’ ‘रे’ ‘म’ ‘ग’ स्वर समुदाय मुख्य अंग है. राग गौड़ सारंग के आरोह अवरोह में सात-सात स्वर इस्तेमाल किए जाते हैं इसलिए इसकी जाति संपूर्ण है. राग गौड़ मल्हार में वादी स्वर ‘ग’ है और संवादी स्वर ‘ध’ है. आसान भाषा में हम आपको पहले भी बता चुके हैं कि किसी भी राग में वादी और संवादी स्वर का वही महत्व होता है तो शतरंज के खेल में बादशाह और वजीर का होता है. राग गौड़ मल्हार के गाने का समय दोपहर का होता है. आइए राग गौड़ मल्हार का आरोह अवरोह देख लेते हैं.

आरोह- सा, ग रे म ग, प म(तीव्र) ध प, नी ध सां

अवरोह- सां ध नी प, ध म(तीव्र) प, ग म रे ग रे म ग, प रे सा

पकड़- ग रे म ग, प रे सा, नी सा ग रे म ग

हमेशा की तरह इस राग की और बारीकियों को समझने के लिए एनसीईआरटी का ये वीडियो देखिए, जिसमें राग गौड़ सारंग के बारे में विस्तार से बात की गई है.

हमेशा की तरह इस राग की कहानी के अंत में आपको कुछ जाने माने शास्त्रीय कलाकारों के गाए राग गौड़ सारंग को सुनाते हैं. भारत रत्न से सम्मानित किराना घराने के दिग्गज कलाकार पंडित भीमसेन जोशी और पद्म भूषण से सम्मानित शास्त्रीय गायकों की जोड़ी पंडित राजन साजन मिश्र का गाया राग गौड़ सारंग सुनिए.

राग गौड़ सारंग की कहानी को खत्म करने के लिए भारतीय शास्त्रीय वाद्ययंत्रों पर भी इस राग को सुनते हैं. पेश है विश्वविख्यात कलाकार पंडित पन्नालाल घोष का बांसुरी वादन और हरदिल अजीज कलाकार उस्ताद अमजद अली खान का बजाया राग गौड़ सारंग

उस्ताद अमजद अली खान का बजाया ये राग उनकी एल्बम पोर्ट्रेट ऑफ ए लीजेंड से लिया गया है.

अगले रविवार एक और राग की कहानी के साथ हाजिर होंगे.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi