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रागदारी: जब मन्ना डे की डांट पर फूट-फूट कर रोने लगी थीं कविता कृष्णमूर्ति

ऐसा गाना जो बहुत हिट हुआ था लेकिन उस गाने के बोल सुन मन्ना डे को गुस्सा आ गया था

Shivendra Kumar Singh Updated On: Jul 09, 2017 10:47 AM IST

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रागदारी: जब मन्ना डे की डांट पर फूट-फूट कर रोने लगी थीं कविता कृष्णमूर्ति

महान गायक मन्ना डे, कविता कृष्णमूर्ति को बहुत प्यार करते थे. मन्ना दा की बेटी और कविता कृष्णमूर्ति दोस्त थीं, लिहाजा कविता कृष्णमूर्ति को भी मन्ना डे से हमेशा पिता की तरह प्यार मिला.

कविता कृष्णमूर्ति के पिता की मौत के बाद तो ये स्नेह और भी बढ़ गया. कई बड़े स्टेज शो पर कविता कृष्णमूर्ति को मन्ना डे के साथ गाने का सौभाग्य भी मिला. इसके अलावा कुछ दूसरी भाषाओं के गाने भी दोनों कलाकारों ने साथ में गाए. ये मन्ना डे का स्नेह ही था कि कविता बड़े आराम से जब मन चाहे तब उनके यहां चली जाती थीं.

दोनों देर-देर तक संगीत का रियाज करते. मन्ना डे कविता कृष्णमूर्ति को संगीत की बारीकियां सिखाते और दोनों देर तक गाते-बजाते रहते थे. संगीत में दोनों इस कदर डूबे रहते थे कि मन्ना डे की पत्नी सुलोचना जी को आकर खाने की याद दिलानी पड़ती थी. मन्ना डे अपनी पत्नी को प्यार से सुलू बुलाते थे. उन्होंने कई मौकों पर इस बात का जिक्र किया है कि वो सुलू ही थीं, जो हमेशा इस बात को सुनिश्चित करती थीं कि उनका समय खराब ना हो.

खैर, मन्ना डे और कविता कृष्णमूर्ति दोपहर का खाना खाने के बाद थोड़ी देर आराम करते थे और फिर दोबारा गायकी की बात शुरू हो जाती थी. मन्ना डे जैसे गुणी और महान कलाकार से सीखने में कविता कृष्णमूर्ति भी पूरी तन्मयता से वक्त देती थीं.

हिट गाने पर मन्ना डे की डांट सुनकर रो पड़ी थीं कविता कृष्णमूर्ति

मन्ना डे अपने गानों के बोल पर बहुत ध्यान देते थे. उन्हें हल्के शब्दों वाले गानों से बड़ा परहेज था. वो ऐसे किसी भी गाने को गाने से साफ इंकार कर देते थे जिसमें कहीं से भी कोई फूहड़ता हो या द्विअर्थी शब्द हों. फिल्म इंडस्ट्री को इस बात का पता भी था. खैर, एक रोज यूं हुआ कि कविता कृष्णमूर्ति बहुत खुशी खुशी उत्साह में मन्ना डे के घर गईं. उन्होंने मन्ना डे को ये खुशखबरी दी कि उनका गाया एक गाना फिल्मी चार्ट्स में धमाल मचा रहा है.

कविता कृष्णमूर्ति खास तौर पर इसलिए भी मन्ना डे के पास ये खुशखबरी सुनाने गई थीं क्योंकि वो अपने ‘दादा’ को धन्यवाद देना चाहती थीं. कविता कृष्णमूर्ति जानती थीं कि मन्ना डे को इस बात की थोड़ी तकलीफ थी कि इंडस्ट्री के कई बड़े गायकों ने उनसे संगीत की बारीकियां सीखीं थीं लेकिन कोई उन्हें इस बात का ‘क्रेडिट’ नहीं देता था.

कविता कृष्णमूर्ति ये गलती नहीं करना चाहती थीं. उन्होंने बाकयदा इस बात को हमेशा कहा कि वो मन्ना डे की आभारी हैं, जिन्होंने उन्हें लंबे समय तक संगीत सिखाया. खैर, दादा ने बड़े प्यार से कविता कृष्णमूर्ति से पूछा कि उनका कौन सा गाना हिट हुआ है? कविता ने भी बड़ी मासूमियत से बता दिया कि गाने के बोल हैं- ‘तू चीज बड़ी है मस्त मस्त’. ये गाना 1994 में आई फिल्म मोहरा का था.

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कविता कृष्णमूर्ति के मुंह से गाने के बोल निकले ही थे कि मन्ना दा भड़क गए. उन्होंने कविता कृष्णमूर्ति को खूब डांटा. मन्ना डे ने यहां तक कह दिया कि तुमने इस गीत को गाकर स्त्री जाति को कलंकित किया है. दादा यहीं चुप नहीं हुए उन्होंने कविता को डांटते हुए कहा कि तुम स्वयं एक स्त्री होते हुए एक भारतीय नारी को अपमानित करने की सोच भी कैसे सकती हो? तुम्हें क्या लगता है कि भारतीय लोग स्त्रियों को भोग की वस्तु समझते हैं?

मन्ना डे गुस्से में डांटे जा रहे थे, बड़ी देर बाद उन्हें अहसास हुआ कि कविता कृष्णमूर्ति रो रही हैं. कविता की आंख में आंसू तो शुरू में ही आ गए थे लेकिन जैसे जैसे मन्ना दा का गुस्सा बढ़ा उनकी आंखों के आंसू बढ़ते चले गए. बाद में कविता कृष्णमूर्ति वहां से बगैर कुछ कहे चुपचाप घर चली गईं.

आप भी इस गाने को सुनिए क्योंकि इस किस्से को सुनाने का मकसद था एक नई राग की जानकारी देना. आपको शायद जानकर ताज्जुब होगा कि एक किस्म का ये आइटम सॉन्ग शास्त्रीय राग भीमपलासी पर आधारित है.

राग भीमपलासी का ये तो सिर्फ एक उदाहरण है. इसके अलावा हिंदी फिल्मों में कई ऐसे लोकप्रिय और खूबसूरत गीत हैं जो राग भीमपलासी पर आधारित हैं. इसमें जिन गानों का जिक्र जरूरी है वो है- 1966 में आई फिल्म-मेरा साया का ‘नैनो में बदरा छाए’, 1971 में आई फिल्म- शर्मीली का ‘खिलते हैं गुल यहां’, 1979 में आई फिल्म-दादा का सुपरहिट गाना ‘दिल के टुकड़े टुकड़े करके मुस्करा के चल दिए’, 1992 में आई फिल्म-क्रिमिनल का ‘तू मिले दिल खिले और जीने को क्या चाहिए’, 1998 में रिलीज हुई फिल्म- दिल से का गाना ‘ऐ अजनबी तू भी कभी आवाज दे कहीं से’  और 1999 में रिलीज हुई फिल्म- पुकार का ‘किस्मत से तुम हमको मिले हो’ शामिल हैं. इनमें से कुछ गानों को सुनते भी हैं.

हिंदी फिल्मों के अलावा गजल गायकी में भी राग भीमपलासी में कई शानदार कम्पोजीशन तैयार किए गए हैं. जिन्हें गजल सम्राट मेंहदी हसन से लेकर हरिहरन तक ने गाया है. बेगम अख्तर की मशहूर गजल ये ना थी हमारी किस्मत, हरिहरन की ये आइने से अकेले में गुफ्तगु क्या है और मेहंदी हसन की लाजवाब गजल जिंदगी में तो सभी प्यार किया करते हैं भी काफी हद तक राग भीमपलासी पर ही आधारित है. आपको बेगम अख्तर की गजल सुनाते हैं.

हमेशा की तरह अब आपको राग भीमपलासी के शास्त्रीय पक्ष की जानकारी देने का वक्त है. राग भीमपलासी की रचना काफी थाट से मानी गई है. इसमें ‘ग’ और ‘नी’ को छोड़कर बाकी सभी स्वर शुद्ध लगते हैं. इस राग में वादी स्वर मध्यम है और संवादी स्वर षडज् है. आरोह में ‘रे’ और ‘ध’ वर्जित हैं और अवरोह संपूर्ण है. राग भीमपलासी की जाति औडव संपूर्ण मानी जाती है. इसको गाने बजाने का समय रात का तीसरा पहर है. इस राग की बड़ी विशेषता ये है कि इसे गंभीर प्रवृत्ति का राग माना जाता है इसलिए ख्याल गायकी और ध्रुपद जैसी गायकी तो इसमें चलती है लेकिन इस राग में ठुमरी नहीं गाई जाती है.

आरोह- नी म प नी सां

अवरोह-  सां नी ध प म रे सा

पकड़- नी स म, म प रे स

शास्त्रीय गायकी में भी राग भीमपलासी काफी लोकप्रिय है. ये राग है भी गंभीर प्रवृत्ति का. इस राग के बारे में एनसीईआरटी की बनाई गई इस वीडियो क्लिप को देखिए. इससे आपको इस राग की तमाम दूसरी बारीकियां पता चलेंगी.

आज राग भीमपलासी के शास्त्रीय पक्ष में जिस महान कलाकार को हम आपको सुनाने जा रहे हैं उनका भारतीय शास्त्रीय संगीत के इतिहास में बहुत ऊंचा नाम है, सुनिए डीवी पलुष्कर का राग भीमपलासी.

हाल ही में हमने आपको सितार के बड़े फनकार उस्ताद शाहिद परवेज के बारे में बताया था. आज उन्हीं की ऊंगलियों से निकले राग भीमपलासी को सुनिए.

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