S M L

रागदारी: इस राग पर आधारित गाने को मिला था पहला फिल्मफेयर अवॉर्ड

इस अवॉर्ड के लिए अब दर्जनों गायकों को लता मंगेशकर का शुक्रिया अदा करना चाहिए

Shivendra Kumar Singh Updated On: Jun 27, 2017 03:37 PM IST

0
रागदारी: इस राग पर आधारित गाने को मिला था पहला फिल्मफेयर अवॉर्ड

फिल्मफेयर अवॉर्ड आज हिंदी फिल्मी दुनिया का प्रतिष्ठित सम्मान बन चुका है. 1954 में शुरू किए गए इस अवॉर्ड की एक दिलचस्प कहानी आपको सुनाते हैं.

1959 तक फिल्मफेयर अवॉर्ड में गायकों को शामिल ही नहीं किया गया था यानी ‘अवॉर्ड्स’ की ‘कैटेगरी’ में ‘प्लेबैक सिंगर’ ने नहीं होते थे. ‘प्लेबैक’ गायकों की लड़ाई लड़ी लता मंगेशकर ने. उनके कहने पर ही आयोजकों ने 1959 में जब फिल्मफेयर अवॉर्ड की ‘ज्यूरी’ बनाई तो उसमें ‘प्लेबैक सिंगर’ के लिए भी नाम चुने जाने को कहा.

इसके बाद अगले आठ साल तक यानी 1967 तक इस ‘कैटेगरी’ में ‘अवॉर्ड’ तो मिलते थे लेकिन ‘मेल’ और ‘फीमेल’ सिंगर को अलग अलग नहीं बल्कि किसी एक को चुना जाता था. 1967 से ये बदलाव हुआ जब इस ‘अवॉर्ड’ के लिए ‘मेल’ और ‘फीमेल सिंगर’ को अलग अलग चुना जाने लगा.

लता को मिला था पहला अवॉर्ड 

खैर, दिलचस्प कहानी ये है कि 1959 में जब पहली बार किसी गायक को फिल्मफेयर अवॉर्ड के लिए चुना गया तो वो कोई और नहीं इस अवॉर्ड में गायकों की लड़ाई लड़ने वाली लता मंगेशकर ही थीं. इस पूरी कहानी को और तफसील से बताएंगे पहले आपको वो गाना सुनाते हैं और ये बताते हैं कि हिंदी फिल्म के इतिहास में पहली बार फिल्म फेयर अवॉर्ड जीतने वाला गाना किस राग पर आधारित था?

ये गाना 1958 में आई फिल्म मधुमती का है. इस फिल्म का निर्देशन बिमल रॉय ने किया था. ऋत्विक घटक और राजिंदर सिंह बेदी की लिखी इस फिल्म में दिलीप कुमार और वैजयंती माला थे. फिल्म के लिए गीत शैलेंद्र ने लिखे थे.

ऐसा भी कहा जाता है कि इस फिल्म के लिए बिमल रॉय एसडी बर्मन को बतौर संगीतकार लेना चाहते थे लेकिन बर्मन दादा ने खुद ही इसके लिए सलिल चौधरी का नाम ‘रिकमेंड’ किया था. इस फिल्म को जबरदस्त कामयाबी मिली. फिल्म में दस से ज्यादा गाने थे. आजा रे परदेसी मैं तो कब से खड़ी इस पार के लिए लता मंगेशकर को फिल्मफेयर अवॉर्ड मिला.

जब लता ने किया था गाने से मना 

ये गाना शास्त्रीय राग बागेश्री पर आधारित था. राग बागेश्री को राग बागेश्वरी भी कहा जाता है हालांकि शुद्ध नाम बागेश्री ही माना गया है. की बात करें इससे पहले आपको एक और बेहद दिलचस्प किस्सा बताते हैं. साल 1957 की बात है.

फिल्म ‘चोरी चोरी’ के लिए शंकर जयकिशन को फिल्मफेयर अवॉर्ड के लिए चुना गया. जिस गाने के लिए उन्हें ये अवॉर्ड दिया जा रहा था वो गाना था- ‘रसिक बलमा’. अवॉर्ड से पहले जयकिशन ने लता मंगेशकर से फरमाइश की कि वो अवॉर्ड सेरेमनी में ‘रसिक बलमा’ गाना गा दें.

लता जी ने यह कहकर गाने से इंकार कर दिया कि फिल्मफेयर अवॉर्ड गाने के संगीतकार को मिल रहा है ना कि गायक को इसलिए वो ये गाना कार्यक्रम के दौरान नहीं गाएंगी. शंकर जयकिशन चाहें तो ‘सेरेमनी’ में गाने की धुन बजा लें. इस बात को लेकर शंकर जयकिशन और लता जी में मनमुटाव भी हुआ.

बाद कार्यक्रम के आयोजकों तक पहुंची तो उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ. लता जी की बात बिल्कुल सही थी, लिहाजा अगले साल से ‘प्लेबैक सिंगर्स’ को भी फिल्मफेयर अवॉर्ड दिया जाने लगा. आज फिल्म इंडस्ट्री के दर्जनों गायक गायिकाओं को लता मंगेशकर जी का शुक्रगुजार होना चाहिए क्योंकि अगर उन्होंने ये आवाज नहीं उठाई होती तो शायद किसी और ने इस पर ध्यान भी नहीं दिया होता.

ये गाने भी थे राग बागेश्री पर आधारित  

खैर, हम वापस लौटते हैं हिंदी सिनेमा के इतिहास में पहला फिल्मफेयर अवॉर्ड जीतने वाले गाने की राग ‘बागेश्री’ पर.

इस गाने के अलावा और भी कई गाने हैं जो इसी राग पर संगीत निर्देशकों ने कंपोज किए. यहां तक कि मधुमती फिल्म का ही एक और गाना ‘घड़ी घड़ी मेरा दिल धड़के’ भी सलिल दादा ने राग बागेश्री में ही कंपोज किया था. उस गाने को भी लोगों ने खूब पसंद किया था.

इससे पहले 1957 में आई फिल्म ‘देख कबीरा रोया’ में मदन मोहन ने इसी राग को आधार बनाकर एक गाना कंपोज किया था- हमसे आया ना गया. इस फिल्म में सिर्फ यही एक गीत था जिसे तलत महमूद ने गाया था. राजिंदर कृष्ण के बोल थे. आप इस गाने को सुनिए:

राग बागेश्री के और किस्से कहानियों सुनाएं उससे पहले आपको इसी राग पर आधारित एक और फिल्मी गीत सुनाते हैं जो 1962 में आई फिल्म रंगोली की है. इस फिल्म का संगीत शंकर जयकिशन ने ही तैयार किया था. ये गाना वैजयंती माला पर फिल्माया गया था. लता जी का गाया ‘जाओ-जाओ नंद के लाला तुम झूठे’ सुनिए.

इस राग पर आधारित दो गजलें हैं जो खूब लोकप्रिय हुईं. करीब तीस साल पहले गुलाम अली साहब ने इसी राग में एक गजल गाई थी. वो गजल मुनीर नियाजी की लिखी हुई थी. बोल थे- चमन में रंग-ए-बहार उतरा तो मैंने देखा. आप भी इस गजल को सुनिए:

इसी राग में 80 के दशक में गुलाम अली ने एक और गजल गाई थी- पूछता जा.

राग बागेश्री का शास्त्रीय पक्ष 

आइए अब आपको राग बागेश्री का शास्त्रीय पक्ष बताते हैं. इस राग की रचना काफी थाट से मानी गई है. कहा जाता है कि राग बागेश्री मियां तानसेन ने सबसे पहले गाई थी. बागेश्री देर रात में गाया बजाया जाने वाला राग है.

इसके आरोह में ‘रे’ और ‘प’ वर्जित है. अवरोह में सातों स्वर प्रयोग किए जाते हैं. इस राग का वादी स्वर ‘म’ और संवादी स्वर ’स’ है. इसकी जाति औडव-संपूर्ण है. इस राग में ख्याल, ध्रुपद एवं तराना गाया जाता है. इस राग को भीमपलासी के करीब का राग माना जाता है.

इस राग का आरोह अवरोह भी देख लेते हैं.

आरोह- नी सा ग॒ म नी सां

अवरोह- सां नी  म प ध ग॒ म रे सा 

पकड़- ध नी स म, ध नी ध म, म प ध , म रे सा

हमेशा की तरह रागदारी के आखिरी हिस्से में हम आपको राग के शुद्ध रूप को बताने, समझाने और सुनाने के लिए शास्त्रीय कलाकारों के वीडियो शेयर करते हैं. आज राग बागेश्री में आखिर में सुनिए ग्रैमी अवॉर्ड से सम्मानित पंडित विश्व मोहन भट्ट का मोहनवीणा

अगली बार एक और नए राग के किस्से कहानियों के साथ हाजिर होंगे. आप हमारी इस सीरीज पर अपनी राय भी व्यक्त कर सकते हैं. हमें आपके सुझावों और प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi