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रागदारी: मजरूह सुल्तानपुरी को फैज़ से क्यों लेनी पड़ी थी एक लाइन उधार

सुनील दत्त-आशा पारिख पर फ़िल्माए गए सुपरहिट गाने की दिलचस्प कहानी.

Shivendra Kumar Singh Updated On: May 28, 2017 04:34 PM IST

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रागदारी: मजरूह सुल्तानपुरी को फैज़ से क्यों लेनी पड़ी थी एक लाइन उधार

उर्दू शायरी में फैज अहमद फैज का मुकाम बहुत बड़ा है। 1943 में उनकी पहली किताब आई थी- ‘नक्श-ए-फरयादी’. इस किताब में एक नज्म थी- 'मुझ से पहली-सी मोहब्बत मेरे महबूब न मांग'. पहले इस नज्म को पढ़ते हैं और फिर इसे सुनते भी हैं.

मुझ से पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब न मांग मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शां है हयात तेरा गम है तो गम-ए-दहर का झगड़ा क्या है तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आंखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है तू जो मिल जाये तो तकदीर निगूं हो जाये यूं न था मैं ने फकत चाहा था यूं हो जाये और भी दुःख हैं जमाने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा

इस नज्म को गुजरे जमाने की मशहूर कलाकार नूरजहां ने गाया भी था. उसके बाद इस कलाम की लोकप्रियता और भी बढ़ गई. आपको नूरजहां की आवाज में उस नज्म को भी सुनाते हैं.

असली कहानी अब शुरू होती है. इस नज्म के लिखे जाने के करीब 26 साल बाद हिंदुस्तानी डायरेक्टर राज खोसला एक फिल्म बना रहे थे. फिल्म का नाम था- चिराग. फिल्म का संगीत तैयार हो ही रहा था कि एक रोज राज खोसला कहीं से ये नज्म सुन आए. ये नज्म उनकी जुबान पर चढ़ गई.

अब नज्म के दिमाग पर चढ़ने का किस्सा भी दिलचस्प है फिल्म की यूनिट वाले ऐसा कहते थे कि दरअसल इस नज्म की एक लाइन पर राज खोसला का दिल अटक गया था. वो लाइन थी- तेरी आंखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है. कहते हैं इन लाइनों ने राज खोसला के पुराने प्यार को उन्हें याद दिला दिया था. खैर, फिल्म चिराग का संगीत मदन मोहन तैयार कर रहे थे. गीत लिखने की जिम्मेदारी मजरूह सुल्तानपुरी जैसे बड़े शायर पर थी.

राज खोसला ने एक रोज कहा कि उन्हें भी अपनी फिल्म में एक ऐसा गाना चाहिए जिसके बोल हों तेरी आंखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है. मुसीबत ये हुई कि मजरूह सुल्तानपुरी साहब इस बात के लिए राजी ही नहीं थे कि वो किसी और शायर की लिखी लाइनों को अपने कलाम का हिस्सा बनाएंगे.

मजरूह साहब उम्र में फैज अहमद फैज से भले ही छोटे थे लेकिन अदबी दुनिया में उनका नाम भी बहुत बड़ा था. उन्होंने डायरेक्टर राज खोसला को इस लाइन के इर्द-गिर्द कई दूसरी लाइनें लिखकर दीं लेकिन राज खोसला के दिलो दिमाग पर तो फैज साहब की लाइनें चढ़ चुकी थीं. लिहाजा उन्हें कुछ पसंद ही नहीं आ रहा था. आखिर में डायरेक्टर की जिद को देखते हुए मजरूह सुल्तानपुरी ने फैज अहमद फैज से उस लाइन को इस्तेमाल करने की इजाजत ली और एक नया नगमा लिखा, जिसके बोल थे-

तेरी आंखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है, ये उठे सुबह चले, ये झुकें शाम ढले मेरा मरना, मेरा जीना, इन्हीं पलकों के तले.

मोहम्मद रफी साहब की आवाज और सुनील दत्त और आशा पारिख पर फिल्माया गया ये गाना जबरदस्त हिट हुआ. इस गाने को सुनिए और फिर इस गाने के रास्ते से रागों की अपनी कहानी पर आते हैं.

दरअसल इस गाने को राग झिंझोटी पर कंपोज किया गया था. इस बात में कोई दोराय नहीं है कि इस गाने में मजरूह सुल्तानपुरी के शब्दों का जादू तो था ही संगीत ने गाने में और चार चांद लगा दिए. ‘झिंझोटी’ राग का जादू भी कुछ ऐसा ही था पचास-साठ-सत्तर के दशक में संगीतकारों ने इस राग को अपनी ‘कंपोजिशन’ में जमकर इस्तेमाल किया.

उस दौर के कुछ और बेहद शानदार गाने आपको सुनाते हैं जिसमें राग झिंझोटी का इस्तेमाल किया गया है. इसमें 1959 में आई फिल्म ‘छोटी बहन’ का गाना ‘जाऊं कहां बता ऐ दिल’, 1961 में फिल्म ‘झुमरू’ का गाना ‘कोई हमदम ना रहा, कोई सहारा ना रहा’, 1963 में आई फिल्म ‘मेरे महबूब’ का गाना ‘मेरे महबूब तुझे मेरी मोहब्बत की कसम’, 1970 में ‘पागल कहीं का’ का गाना ‘तुम मुझे यू भूला ना पाओगे’ और 1974 में आई फिल्म ‘चोर मचाए शोर’ का गाना ‘घुंघरू की तरह बजता ही रहा हूं मैं’ प्रमुख हैं. इस राग की अगली कहानी सुनाने से पहले इस फेहरिस्त के दो गाने सुनिए.

राग झिंझोटी का एक और किस्सा बड़ा दिलचस्प है. जो फिल्म इंडस्ट्री दो बहुत बड़े कलाकारों के झगड़े से जुड़ा हुआ है. फिल्म इंडस्ट्री में एसडी बर्मन और लता मंगेशकर का झगड़ा बहुत मशहूर है. काफी समय तक खिंचे झगड़े के बाद जब दोनों ने दोबारा एक साथ काम करना शुरू किया तो सबसे कामयाब फिल्मों में ‘गाइड’ आई. उस फिल्म में ‘मोसे छल किए जाए हाय रे हाय सैयां बेइमान’ गाना भी बर्मन दादा ने राग झिंझोटी पर कंपोज किया था. आइए इस अमर गीत को सुनते हैं.

आइए अब आपको हमेशा की तरह राग के शास्त्रीय पक्ष के बारे में बताते हैं. राग झिंझोटी खमाज थाट से पैदा हुआ है, इसलिए इसका स्वरूप खमाज से काफी मिलता है. इस राग में निषाद कोमल और बाकी स्वर शुद्ध लगते हैं. आरोह और अवरोह दोनों में सातों स्वर इस्तेमाल होते हैं इसलिए इस राग की जाति संपूर्ण-संपूर्ण कहलाती है. इस राग को रात के दूसरे प्रहर में गाते बजाते हैं. इसका वादी है गंधार और संवादी है धैवत. इस राग में खयाल के अलावा ठुमरी और भजन भी गाए जाते हैं. राग झिंझोटी का विस्तार मंद्र और मध्य सप्तक में किया जाता है. इस राग के सबसे करीब का राग है खंभावती. अब जरा झिंझोटी के आरोह अवरोह पर भी नजर डाल लेते हैं-

आरोह- सा रे ग म प, ध नि सां

अवरोह- सां नि ध प, म ग, रे सा

मुख्य स्वर समूह- ध़ सा रे म ग, रे सा रे ऩि ध़ प़ ध़ सा

इस राग में कंपोज की गई एक भक्ति रचना ऐसी है जो शायद ही किसी ने ना सुनी हो. भारत रत्न लता मंगेशकर की आवाज में इस रचना को सुनते हैं।

चंचल प्रवृति का राग होने के कारण गायकी के साथ-साथ इस राग को बजाने में भी कलाकारों को बहुत आनंद आता है. यही वजह है कि शास्त्रीय कलाकारों ने भी राग झिंझोटी को खूब गया बजाया है. आज जिस कलाकार का गाया राग झिंझोटी आपको सुना रहे हैं उनकी कई दिलचस्प कहानियां है जो हम आपको इस कॉलम में जरूर सुनाएंगे. पहले सुनिए मल्लिकार्जुन मंसूर का राग झिंझोटी

राग झिंझोटी की खूबसूरती देखिए कि इस राग के नाम पर कहानियों में से कहानियां निकल रही हैं. अब हम आपको दो ऐसे शास्त्रीय वादकों का बजाया राग झिंझोटी सुना रहे हैं जो शास्त्रीय संगीत के शिखर पर हैं. साथ ही इन दोनों कलाकारों ने हिंदी फिल्मों में भी शिव-हरी के नाम से संगीत दिया है. आप समझ ही गए होंगे कि बात पूरी दुनिया में मशहूर बांसुरी वादक पंडित हरिप्रसाद चौरसिया और संतूर वादक पंडित शिवकुमार शर्मा की हो रही है.

आज के लिए अलविदा, अगले हफ्ते एक नई राग, कुछ नए किस्से, कुछ शानदार फिल्मी नगमों और शास्त्रीय संगीत के साथ फिर हाजिर होंगे.

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