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रागदारी: किस धुन को बनाने की खुशी में लुंगी में ही मन्ना डे के घर पहुंच गए थे एसडी बर्मन

मन्ना डे सचिन देव बर्मन के सहायक के तौर पर काम करते थे.

Shivendra Kumar Singh | Published On: May 21, 2017 09:28 AM IST | Updated On: May 21, 2017 09:28 AM IST

रागदारी: किस धुन को बनाने की खुशी में लुंगी में ही मन्ना डे के घर पहुंच गए थे एसडी बर्मन

मन्ना डे और सचिन देव बर्मन में बहुत गहरा रिश्ता था. मन्ना डे सचिन देव बर्मन के सहायक के तौर पर काम करते थे. यहां तक कि मन्ना डे उनके लिए परचून का सामान तक खरीद कर लाते थे.

इसके अलावा सुबह-सुबह बर्मन दादा के नाश्ते का इंतजाम करना, रिकॉर्डिंग के दौरान बर्मन दादा के लिए बीच-बीच में पान लाना ये सब मन्ना दादा की ही जिम्मेदारी थी. मन्ना दादा ये सारे काम इसलिए नहीं करते थे कि वो बर्मन दादा के सहायक थे बल्कि इसलिए करते थे क्योंकि वो बर्मन दादा की बहुत इज्जत करते थे.

बर्मन दादा की शख्सियत भी बेहद सरल और सहज थी. कहते हैं कि बर्मन ‘दा’ इतने सीधे-सच्चे थे कि वो अपने कपड़ों की भी परवाह नहीं करते थे. कहने का आशय ये है कि उन्हें घर से बाहर जाने के लिए कोई बेहतरीन ड्रेस नहीं चाहिए होती थी.

एक बार का किस्सा बड़ा दिलचस्प है. एक दिन मन्ना डे अपने घर में बैठे हुए थे. रात के करीब नौ बजे का वक्त था. अचानक बैठक में हलचल हुई. मन्ना डे ने देखा तो सामने बर्मन ‘दा’ खड़े हुए थे. बिना बांह की बनियान और नीचे लुंगी पहने हुए. जी हां लुंगी. बर्मन ‘दा’ के हाथ में एक कागज था.

उनके चेहरे पर गजब की खुशी झलक रही थी. मन्ना दादा कुछ पूछते इससे पहले ही बर्मन ‘दा’ ने कहा, माना- अपना हारमोनियम निकालो. सचिन देव बर्मन मन्ना डे को ‘माना’  बुलाते थे. खैर, मन्ना डे साहब अपना हारमोनियम लेकर आए. बर्मन दा ने कहा ये धुन समझो और गाकर सुनाओ.

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जब तक मन्ना डे ने उस धुन को गा नहीं दिया तब तक सचिव देव बर्मन वहीं बैठे रहे. आखिर में जब उन्हें धुन पसंद आ गई तो वो अपने घर चले गए. पहले वो गाना सुन लेते हैं उसके बाद इस कहानी को आगे बढ़ाएंगे.

पूछो ना कैसे मैंने रात बिताई’ 1963 में आई फिल्म ‘मेरी सूरत तेरी आंखे’ में अशोक कुमार पर फिल्माया गया ये गाना राग अहीर भैरव पर आधारित था. जो कहानी हमने आपको सुनाई वो इसी गाने की थी.

संगीत सचिव देव बर्मन का था और बोल शैलेंद्र के. गाने के पहले अशोक कुमार का अपने बाबा के साथ भावनात्मक संवाद भी दिल को छू लेने वाला है. जिसमें उन्होंने पूजा इबादत को संगीत से जोड़ने की बात कही है. सचिन देव बर्मन और मन्ना डे ने फिल्म संगीत में कई ऐसे लोकप्रिय गाने दिए. यहां तक कि अगर रिकॉर्डिंग स्टूडियो में देर होती थी तो मन्ना डे से पहले बर्मन ‘दा’ नाराज होने लगते थे. खैर, किस्से कहानी के साथ साथ आज हम राग अहीर भैरव की बात करेंगे.

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राग अहीर भैरव उस दौर के संगीतकारों के पसंदीदा रागों में से एक रहा है. पूछो ना कैसे मैंने रात बिताई’ के अलावा भी कई लोकप्रिय फिल्मी गाने इसी राग में तैयार किए गए हैं. 1967 में आई फिल्म ‘दिल ने पुकारा’ का ये गाना भी राग अहीर भैरव में कंपोज किया गया था. मुकेश की आवाज में गाया गया ये गाना कल्याण जी आनंद जी ने तैयार किया था.

1975 में आई फिल्म ‘उलझन’ का किशोर कुमार की आवाज में गाया गया ये गाना भी काफी लोकप्रिय हुआ था- अपने जीवन की उलझन को कैसे मैं सुलझाऊं’. इसी दौरान 80 के शुरूआती दशक में फिल्म आई ‘एक दूजे के लिए’.

इस फिल्म का संगीत लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने तैयार किया था. इस फिल्म में पहली बार एसपी बालासुब्रमनियम को बहुत डर-डर कर हिंदी गाने के लिए आजमाने का प्रयोग किया गया था. उस फिल्म का बेहद लोकप्रिय गाना ‘सोलह बरस की बाली उमर’ को सलाम भी राग अहीर भैरव में कंपोज किया गया था. लता जी की आवाज में इस गीत को सुनिए.

फिल्मी गानो में दो और बेहद लोकप्रिय गाने ध्यान आ रहे हैं जो राग अहीर भैरव में कंपोज किए गए थे. ये दोनों ही गाने जबरदस्त हिट हुए थे. राम तेरी गंगा मैली हो गई का ‘टाइटिल ट्रैक’ और फिल्म हम दिल दे चुके सनम का अलबेला साजन.

अब आपको हमेशा की तरह राग अहीर भैरव के शास्त्रीय पक्ष के बारे में बताते हैं. इस राग को राग भैरव और काफी या राग भैरव और राग अभीरी का मिश्रण भी माना जाता है. इस राग का विस्तार तीनों सप्तकों यानि मंद्र, मध्य और तार में किया जा सकता है.

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इस राग की जाति संपूर्ण-संपूर्ण है. भैरव थाट के इस राग में ‘रे’ और ‘नी’ कोमल लगता है बाकि सभी शुद्ध स्वर लगते हैं. इस राग का वादी संवादी मध्यम षड्ज है. दिन के पहले प्रहर में गाया जाने वाला ये राग गंभीर किस्म का माना गया है. वादी संवादी स्वर को आसानी से परिभाषित करने के लिए हम आपको बता चुके हैं कि शतरंज के खेल में जो महत्व बादशाह और वजीर का होता है वही महत्व किसी राग में इन सुरों का होता है. इस राग का आरोह अवरोह देख लेते हैं

रे ग म प ध नी

नी ध प म ग रे

ख्याल गायकी और तराने के लिए इस राग को सटीक माना जाता है. बिसर गई रे सुध बुध सारी’, ‘पीयु पीयु करत पुकार’, ‘पिया परदेसवा ना जा’, मन की चिंता दूर करो रे’, ‘पतित पावन राम’ और ‘हे करतार कर दो बेड़ा पार’ जैसी बंदिशे, ख्याल और बड़ा ख्याल इस शास्त्रीय राग में खूब गाई जाती है. यहां हम आपको भारत रत्न से सम्मानित कलाकार पंडित भीमसेन जोशी का राग अहीर भैरव सुना रहे हैं. बोल हैं- ‘आस लागी मैं को तुमरी’

हाल ही में दुनिया को अलविदा कहने वाली विश्वविख्यात गायिका किशोरी अमोनकर जिन्हें हर कोई प्यार और सम्मान से किशोरी ताई बुलाता था का राग अहीर भैरव सुनिए.

राग अहीर भैरव को शास्त्रीय वाद्यंत्रों पर भी खूब बजाया गया है. पद्मविभूषण से सम्मानित संतूर वादक पंडित शिवकुमार शर्मा की संतूर लहरियों में सुनिए राग अहीर भैरव.

संतूर के बाद एक और खूबसूरत साज सरोद पर इसी राग को सुनिए. इसे विश्वविख्यात कलाकार उस्ताद अमजद अली खान ने बजाया है. सरोद के बारे में दिलचस्प जानकारी ये है कि ये एक बेपरदा साज है. उस्ताद अमजद अली खान कहते हैं कि ये बेपरदा साज है इसीलिए इसे बजाने में अगर कोई बेसुरा है तो ये साज उसे भी बेपरदा कर देता है. खैर उनका राग अहीर भैरव सुनिए.

नेशनल काउंसिल ऑफ एजुकेशन रिसर्च एंड ट्रेनिंग यानि एनसीईआरटी ने भी अपनी एक खास सीरीज में इस राग की तमाम बारिकियां बताई हैं. जानकारी दिलचस्प हैं, इस वीडियो को देखिए.

शास्त्रीय रागों की बारीकियों और कहानियों पर आधारित हमारी ये सीरीज आपको कैसी लग रही है, हमें जरूर बताएं. अगले सप्ताह एक नए राग के साथ हम फिर हाजिर होंगे.

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