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तन डोले मेरा मन डोले में ‘बीन’ बजी ही नहीं थी, तो इतने साल हम क्या सुनते रहे

राग पीलू में बनाए गए गाने मन डोले, मेरा तन डोले में मशहूर नागिन धुन बीन से नहीं निकली.

Shivendra Kumar Singh | Published On: May 07, 2017 08:06 AM IST | Updated On: May 07, 2017 08:06 AM IST

तन डोले मेरा मन डोले में ‘बीन’ बजी ही नहीं थी, तो इतने साल हम क्या सुनते रहे

राग पीलू में भारतीय फिल्मी संगीत में एक से बढ़कर गाने कंपोज किए गए हैं.

आज राग की कहानी सुनाने से पहले आपको गाना इसलिए सुनाया क्योंकि ये गाना भारतीय फिल्मी संगीत के एतिहासिक गानों में से एक है. भारतीय फिल्मी गीतों में कुछ गाने ऐसे हुए हैं जो बरसों बरस उतने ही लोकप्रिय रहे जितने कि पहले थे.

ये एक ऐसा ही गीत है- ‘तन डोले मेरा मन डोले मेरे दिल का गया करार रे’. 1954 में आई फिल्म ‘नागिन’ के इस गीत को लता मंगेशकर ने गाया है. फिल्म में प्रदीप कुमार और वैजयंती माला ने अभिनय किया था और संगीत हेमंत कुमार का था.

हेमंत कुमार के बारे में कम ही लोग जानते हैं कि शुरुआती नाकामी के बाद हेमंत दा ने संगीत निर्देशन का ख्याल छोड़कर कहानियां लिखना शुरू कर दिया था. खैर, बाद में जब उन्हें मौका मिला तो उन्होंने एक से बढ़कर एक हिट गाने तैयार किए.

नागिन फिल्म के इस गाने में आपको सबसे पहले जो चीज अपनी ओर आकर्षित करती है वो इस गाने में इस्तेमाल की गई सपेरों की बीन की आवाज. आज का किस्सा इसी बीन की आवाज से जुड़ा हुआ है. आपको जानकर ताज्जुब होगा कि इस गाने में बीन की जो आवाज सुनाई देती है वो दरअसल बीन नहीं है. इस आवाज को ‘क्ले वॉयलिन’ नाम के एक वाद्य यंत्र से तैयार किया गया था.

इसे तैयार किया था कल्याण जी-आनंद जी की जोड़ी वाले कल्याण जी ने, जिसमें उनके सहयोगी थे संगीतकार रवि. उन दिनों कल्याण जी हेमंत कुमार के सहयोगी हुआ करते थे. मजे की बात ये है कि बाद में जब कल्याण जी ने स्वतंत्र रूप से हिंदी फिल्मों में संगीत देने का काम शुरू किया तब तक यह बीन वाली कहानी पूरी फिल्म इंडस्ट्री में फैल चुकी थी.

हर कोई कल्याण जी से कहता था कि वो वैसी ही बीन की आवाज निकालकर उनके लिए गाना तैयार कर दें. ये उस गाने की लोकप्रियता को भी बताता है. खैर, इस गाने के जरिए आज हम जिस राग की चर्चा करने जा रहे हैं वो राग है- पीलू.

बीते जमाने के एक और ऐसे ही बेहद लोकप्रिय गाने ‘ऐ मेरी जोहरा जबी तुझे मालूम नहीं’ को सुनिए. 1965 में फिल्म आई थी- वक्त. इस फिल्म में साहिर लुधियानवी के लिखे और मन्ना डे के गाए इस गाने ने बहुत धूम मचाई थी. ये गाना भी राग पीलू पर ही आधारित था.

वैसे इस गाने का भी एक दिलचस्प किस्सा है. इस गीत का संगीत तैयार करने वाले अब्दुल गफूर ब्रेश्ना काबुल के रहने वाले थे. उन्हें चित्रकारी, कविता और फिल्मों का शौक था. उनकी पेंटिंग्स की प्रदर्शनी दुनिया भर के कई देशों में लगाई गई थी. इसी में से एक देश भारत भी था, जहां 1954 में पहली बार उनकी प्रदर्शनी लगाई गई थी.

यश चोपड़ा के निर्देशन में बनी इस फिल्म में इस गाने को छोड़कर बाकि सभी गीत संगीतकार रवि के तैयार किए गए थे. जो काफी हिट हुए थे.

इस राग की खूबी ही यही थी इसे हिंदी फिल्मों में हर दौर में जमकर इस्तेमाल किया गया. साथ ही इसे अलग-अलग संगीतकारों ने अलग-अलग मूड के गानों में पिरोया. कुछ और फिल्मी गानों में राग पीलू की चमक देखिए.

1961 में आई फिल्म गंगा जमुना में नौशाद साहब के संगीत में लता जी का गाया यह गीत सुनिए- 'ढूंढो ढूंढो रे साजना, ढूंढो रे साजना मेरे कान का बाला'. वैजयंती माला और दिलीप कुमार पर फिल्माया गया यह गाना भी भारतीय फिल्म संगीत के बेहद लोकप्रिय गानों में से एक हैं.

फिल्म सदमा में येसुदास की आवाज में- 'सुरमई अंखियों में नन्हा मुन्ना एक सपना दे जा रे' भी राग पीलू में ही कंपोज किया गया था.

इसी राग को 1973 में आई फिल्म यादों की बारात में आर डी बर्मन ने बेहद खूबसूरती से इस्तेमाल किया. आशा भोंसले और मोहम्मद रफ़ी की आवाज में गाया गया ये गाना ‘चुरा लिया है तुमने जो दिल को’ आज भी उतना ही हिट है.

और तो और 1984 में प्रकाश मेहरा की सुपरहिट फिल्म शराबी में संगीतकार बप्पी लाहिरी ने इस राग के बिल्कुल ही नए रूप को पेश किया. गाना था- दे दे प्यार दे, प्यार दे. किशोर कुमार की जबरदस्त आवाज में और अमिताभ बच्चन के अभिनय ने इस गाने की पॉपुलैरिटी को हमेशा से ही अलग मुकाम पर रखा.

इस राग की खूबी ही थी कि सत्यजीत रे ने अपनी फिल्म जलसाघर में भी अख्तरी बाई यानि बेगम अख्तर से यह ठुमरी गवाई थी. जलसाघर में उनकी गाई राग पीलू में यह ठुमरी सुनिए

चलिए अब आपको इस राग के शास्त्रीय पक्ष के बारे में बताते हैं. इस राग के आरोह अवरोह को देखते हैं...

आरोह- सा रे ग॒ म प ध॒ प नी॒ ध प सां

अवरोह- नी॒ ध प म ग नी सा

जैसा कि रागों की इस सीरीज में हम पहले भी बता चुके हैं कि आरोह अवरोह सुरों की एक सीढ़ी जैसा है. सुरों के ऊपर जाने को आरोह और नीचे आने को अवरोह कहते हैं. इसी तरह हम यह बता चुके हैं कि किसी भी राग में वादी और संवादी सुर अहमियत के लिहाज से बादशाह और वजीर जैसे हैं.

इस राग की पकड़ हैं- ग॒ म ध॒ प ग॒ नी सा. इस राग का वादी संवादी स्वर ‘ग’ और ‘नी’ है. इस राग की जाति संपूर्ण है. दिन के तीसरे पहर में गाई जाने वाली इस राग को चंचल किस्म का राग माना गया है. हालांकि इस राग में कई भक्ति के गाने भी गाए गए हैं. कई ठुमरियां गाई गई हैं.

ऐसी ही एक ठुमरी- ‘कटे ना बिरहा की रात’. बड़े गुलाम अली खान साहब की आवाज में इस ठुमरी को सुनिए. दूसरी ठुमरी शास्त्रीय गायक राशिद खान की गाई हुई है. जिसके बोल हैं- अब मान जाओ सैंयां.

पद्म विभूषण से सम्मानित शास्त्रीय गायिका गिरिजा देवी की आवाज में राग पीलू की इस ठुमरी को सुनिए. साथ ही गुलाम अली खान साहब की एक लोकप्रिय ठुमरी ‘बरसन लागी सावन बुंदिया राजा' भी इसी राग में है, इसे भी सुनते हैं. जिसमें गुलाम अली साहब ‘टप्पे’ की परंपरा के बारे में भी बता रहे हैं.

राग पीलू को शास्त्रीय गायकों ने जिस प्यार से गाया है उतनी ही मुलायमियत के साथ तमाम बड़े-बड़े शास्त्रीय वादकों ने इस राग को अपने साज पर उतारा भी है.

तो ये थी राग पीलू की कहानी. अगले रविवार को कुछ और बेहद दिलचस्प कहानियों के साथ एक राग का ताना-बाना लेकर फिर हाजिर होंगे.

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