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लुगदी साहित्य: फिल्मों से लेकर रेलवे स्टेशन तक का सफरनामा

बॉलीवुड को एक हिट फार्मूला मिल गया और गुलशन नंदा एक ब्रांड बन गए.

Rajan Pandey | Published On: Jan 08, 2017 07:52 AM IST | Updated On: Jan 13, 2017 11:11 PM IST

लुगदी साहित्य: फिल्मों से लेकर रेलवे स्टेशन तक का सफरनामा

इस सीरीज के पहले भाग में आपने 'लुगदी साहित्य का जादुई संसार' पढ़ा था. यहां इस सीरीज का दूसरा हिस्सा दिया जा रहा है. 

1960 के दौर में लुगदी साहित्य अपराध, जासूसी और तिलिस्म के चंगुल से बाहर निकलकर रोमांस, सामाजिक मुद्दों और भावनाओं के नए बाजार को फतह करने निकल पड़ा. इस दौर के सितारे थे गुलशन नंदा और रानू जैसे लेखक.

रानू और नंदा दोनों ने सामाजिक गैरबराबरी और जीवन के संयोगों के बीच नायक-नायिका के प्यार को आधार बनाकर लिखना शुरू किया.

हालांकि इसमें बाजी मारी गुलशन नंदा ने. अमीर लड़के का गरीब लड़की से या फिर गरीब लड़के से अमीर लड़की का प्यार या फिर इसी तरह की जन्म-जन्मांतर के सच्चे प्यार कहानियों को गुलशन नंदा ने खूबसूरत भाषा में पिरोया.

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एन डी सहगल एंड संस प्रकाशन से 1962 से उनके छपने का सिलसिला शुरू हुआ.  नंदा के छपने का सिलसिला स्टार पॉकेट बुक्स के अमरनाथ वर्मा के साथ परवान चढ़ा.

उस जमाने में रोमांस के रॉक स्टार थे गुलशन नंदा  

ड्रामेटिक और रोमांटिक भावनाओं से भरे इन उपन्यासों में बॉलीवुड को अपार संभावनाएं दिखीं.

उनके उपन्यास ‘माधवी’ पर निर्देशक राम महेश्वरी ने 1965 में ‘काजल’ नाम की फिल्म बनायी.

धर्मेन्द्र, मीना कुमारी, पद्मिनी और राजकुमार के अभिनय से सजी ये फिल्म सिनेमाघरों में उतरी तो टिकट के लिए कोहराम मच गया.

बॉलीवुड को एक हिट फार्मूला मिल गया और नंदा एक ब्रांड बन गए. आने वाले कई वर्षों तक प्रकाशक और निर्देशक उनके इर्द गिर्द चक्कर लगाते रहे ताकि उनका उपन्यास छापने या फिल्म बनाने को मिल सके.

गुलशन नंदा

तस्वीर: विशी सिंहा

1973 में उनके उपन्यास ‘झील के उस पार’ पर फिल्म और उपन्यास, दोनों लगभग साथ साथ आए थे. इस उपन्यास की लगभग 5 लाख प्रातियां बिकी थीं.

नंदा और रानू की देखा देखी ‘सामाजिक उपन्यास’ कही जाने वाली एक नई केटेगरी ही बन गयी. जिसके तहत दहेज, प्यार, मजहब जैसे विषयों पर भावनात्मक और साफ-सुथरे उपन्यास लिखे जाने लगे.

उस दौर में छात्र-छात्राएं और गृहणियां इन उपन्यासों को जम कर पढ़ते और जार-जार रोते.

बाद में जासूसी और अपराध साहित्य की दुनिया में नाम कमाने वाले लेखकों- वेद प्रकाश शर्मा और सुरेन्द्र मोहन पाठक ने भी शुरुआत में सामाजिक उपन्यास लिखे थे. राजहंस, प्रेम वाजपेयी, समीर इसी विधा के अन्य नामचीन लेखक थे.

पॉकेट बुक्स का दौर 

साठ, सत्तर और अस्सी के दशक लुगदी साहित्य के लिहाज से स्वर्णिम काल माने जा सकते हैं.

यही वह समय था जब ओम प्रकाश शर्मा, वेद प्रकाश कम्बोज, कुशवाहा कान्त, वेद प्रकाश शर्मा, सुरेन्द्र मोहन पाठक जैसे नए लेखकों की एक पूरी फौज ने लुगदी साहित्य के बाजार पर धावा बोला.

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तरह तरह के किरदार तथा प्लाट पाठकों के सामने आए. जब मख़मूर जालंधरी ने ‘कर्नल रंजीत’ के उपनाम से लिखना शुरू किया तो उनकी देखा-देखी कुछ अन्य लेखकों ने भी यही प्रथा अपनायी.

मेरठ, इलाहाबाद से चलने वाले प्रकाशनों ने पॉकेट बुक्स के माध्यम से सस्ते दाम में इन लेखकों की किताबें छापना शुरू की जो बहुत लोकप्रिय हुईं.

साथ ही साथ अंग्रेजी के लेखक जेम्स हेडली चेस और जेम्स बांड सीरीज के उपन्यास भी हिंदी में अनुवादित होकर लुगदी पर छपने लगे.

pulp literature

तस्वीर: विशी सिंहा

रेलवे स्टेशनों के एएच व्हीलर बुक स्टाल्स ने इन किताबों को देश के कोने कोने में पहुंचाया.

पान की गुमटियों और किराने वालों ने कस्बों में ये किताबें किराये पर देनी शुरू कीं और लाखों लाख पाठक लुगदी साहित्य में डूबने उतराने लगे.

कुशवाहा कांत बनारस से लिखने वाले एक लेखक थे. कुशवाहा कांत के बड़े प्रशंसक और एचसीएल में कंप्यूटर इंजीनियर तरविंदर सिंह बताते हैं, 'उन्होंने मूलतः सामाजिक और प्रेम उपन्यास लिखे. जिनमें अपराध का भी थोड़ा बघार होता था.'

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'साथ ही साथ सुभाष चन्द्र बोस पर एक उपन्यास और फंतासी को आधार बनाकर ‘दानव देश’ जैसी किताबें भी लिखी. कम उम्र में ही किसी विवाद में उनकी हत्या हो गयी, जिससे उनका रचना संसार करीब चालीस किताबों तक ही सीमित रह गया.'

मजदूरी करते-करते बने लेखक 

‘जनप्रिय लेखक’ का खिताब पाने वाले ओम प्रकाश शर्मा ने ‘जीवित भूत’, ‘ट्रेन डकैती के अपराधी’, ‘पाप की परछाई’ जैसे 400 से अधिक उपन्यास लिखे. जीवन के शुरुआती दौर में खुद मजदूरी करने वाले ओम प्रकाश शर्मा एक वामपंथी मजदूर संगठन से जुड़े हुए थे.

खाली समय में सस्ता मनोरंजन उपलब्ध कराकर मजदूरों को शराब-जुए जैसी बुराइयों से दूर रखने के उद्देश्य से उन्होंने लिखना शुरू किया तो फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा.

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लोग कहते हैं की शर्मा जी शर्त लगाकर किसी भी विषय या वस्तु पर लिख सकते थे. एक बार एक मजदूर की कटी उंगलियां दिखाकर उनके एक मित्र ने उन्हें इस पर उपन्यास लिखने की चुनौती दी और ओमप्रकाश शर्मा ने इस विषय पर भी उपन्यास लिख दिया.

राजेश, जगत, जगन जैसे पात्रों के रचनाकार ओम प्रकाश शर्मा के प्लाट काफी सरल होते थे. किसी एक जगह पर कुछ अपराधी अपराध करते थे और ‘केंद्रीय खुफिया ब्यूरो’ जैसी संस्थाओं से जुड़े उनके पात्र इस अपराध को हल करके दोषियों को सजा दिलवाते थे.

pulp fiction

तस्वीर: विशी सिंहा

वेद प्रकाश शर्मा का 'वर्दी वाला गुंडा' 

लुगदी साहित्य को लोकप्रियता के चरम तक पंहुचाने का काम किया सुरेंद्र मोहन पाठक और वेद प्रकाश शर्मा ने.

राजीव गांधी हत्याकांड पर आधारित शर्मा के उपन्यास ‘वर्दी वाला गुंडा’ ने लोकप्रियता के नए कीर्तिमान बनाये और इसकी लगभग पंद्रह लाख प्रतियां बिकीं.

‘विजय-विकास सीरीज’ के लेखक वेद प्रकाश कम्बोज से प्रेरणा लेने वाले शर्मा ने ‘विधवा का पति’, ‘सुलग उठा सिंदूर’, ‘आग लगे दौलत को’ जैसे ‘सामाजिक’ और थ्रिलर, दोनों ही तरह के उपन्यास लिखे.

पाठक का 'खोजी पत्रकार' सुनील 

वहीं सुरेन्द्र मोहन पाठक ने अपनी ‘विमल सीरीज’ के माध्यम से बम्बई माफिया को हिंदी पाठकों के बीच पहुंचाया.  इनके उपन्यासों में अपराध ओम प्रकाश शर्मा की कहानियों की तरह कुछ ‘बुरे लोगों’ की करतूत भर नहीं होता, बल्कि समाज और कानून के बड़े महंतों की मिलीभगत से चलने वाला सिस्टम होता है.

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जहां उनका उपन्यास ‘गवाही’ पुलिस महकमे में व्याप्त भ्रष्टाचार पर आधारित है. वहीं उनके किरदार भी ‘अच्छे’ और ‘बुरे’ के खांचों से बाहर के लोग हैं. कई हत्याओं का जिम्मेदार और कई राज्यों में वांछित ‘विमल’ उनका एक ऐसा किरदार है जो अपराधी होकर भी पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए कई बार अपनी जान दांव पर लगाता है.

‘टॉप का दिल्लीवाला हरामी’ सुधीर उनका एक दूसरा किरदार है जो ‘औरतखोर’ और ‘शराबखोर’ होने के बावजूद इंसानियत से लबरेज है.

‘खोजी पत्रकार’ को लुगदी साहित्य में पहली बार नायक बनाने वाले सुरेंद्र मोहन पाठक अब तक इसी पात्र ‘सुनील’ के लगभग दो सौ से अधिक उपन्यास लिख चुके हैं, जबकि उनकी कुल रचनाओं की संख्या 300 से अधिक है.

इसके अलावा ‘बैंक डकैत देवराज चौहान’ का किरदार रचने वाले अनिल मोहन जैसे लेखक भी बाद के दौर में खासे लोकप्रिय हुए.

साथ ही साथ अपने शरीर का इस्तेमाल करके देश के दुश्मनों को मात देने वाली सीक्रेट एजेंट ‘रीमा भारती’ के उपन्यास और परशुराम शर्मा के ‘डायना’, ‘बाज़ीगर’ जैसे पात्रों से सजे उपन्यास भी बाजार में आए. इनमें सेक्स प्रसंगों की भरमार होती थी.

नब्बे के दशक से पॉकेट बुक्स और लुगदी की उलटी गिनती शुरू हो चुकी थी. वैश्वीकरण के बाद केबल टीवी, स्मार्टफोन और सीडी के हमलों ने लुगदी की दुनिया उजाड़ दी, क्योंकि सस्ता मनोरंजन पाने के कई और आसन विकल्प सामने आ गए थे.

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लुगदी के इस अर्थशास्त्र के खेल को लेख के अगले और आखिरी हिस्से में दिया जाएगा.

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