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अश्लीलता का विरोध होगा तभी बचेगा लोकसंगीत: विजया भारती

पॉपुलर बिहारी संगीत में अश्लीलता के खिलाफ आवाज उठाने की बात कर रही हैं विजया

Arun Tiwari Arun Tiwari | Published On: Jan 03, 2017 02:01 PM IST | Updated On: Jan 03, 2017 02:01 PM IST

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अश्लीलता का विरोध होगा तभी बचेगा लोकसंगीत: विजया भारती

रीजनल सिनेमा और लोकसंगीत की सीरीज का दूसरा इंटरव्यू हमने लोकप्रिय गायिका विजया भारती का किया. कई भाषाओं में लोकगीत गाने वाली विजया भारती पॉपुलर भोजपुरी संगीत में अश्लीलता के खिलाफ आवाज उठाने के लिए भी जानी जाती हैं.

भोजपुरी में लोकगीतों को शुचिता के साथ गाने में आप और शारदा सिन्हा जैसे गायकों ने रास्ता बनाया है. आप लोग भोजपुरी गीतों में अश्लीलता के खिलाफ आवाज उठाने वालों में अगुआ हैं. इससे उलट युवा पीढ़ी में गायकों की एक पूरी जमात है जो लोगों की मांग के नाम पर कैसा भी गाने को तैयार है. ये बहुसंख्यक हो गए हैं. ये लोग कैसे प्रभावित कर रहे हैं पूरे भोजपुरी संगीत के परिदृश्य को?

मैं ये तो नहीं कहूंगी कि इनकी संख्या इतनी ज्यादा हो गई है. मेरा मानना आपसे अलग है. हाल के सालों में जो नए गायक आ रहे हैं उनमें से ज्यादातर का रुझान अश्लीलता के खिलाफ है. ऐसा भी है कि लोग थक-हार चुके हैं अश्लील गीत गाकर. अब चर्चा के लिए और नाम बचाए रखने के लिए भी लोग अब साफ-सुथरे गीत गाने की तरफ आगे बढ़ रहे हैं.

हां, ये भी है कि इन गायकों के समझ में आने लगा है कि ऐसे गीतों का कोई मूल्य नहीं होता. थोड़े समय के लिए आपको भले ही लोकप्रियता मिल जाए लेकिन ये लंबे समय तक नहीं टिकने वाला.

 लेकिन आर्थिक तौर पर तो ऐसे गायक बेहतर कर रहे हैं. लोकप्रियता भी ज्यादा है.

ऐसा नहीं है. अब पहले जैसा बाजार नहीं रहा है कि कंपनियां आप की कैसेट या सीडी निकाल रही हैं. कुछ कंपनियां हैं जो ऐसे गीतों को बाजार में उतार रही हैं. और कुछ पैसे भी बना रही हां. 

ये समझ लीजिए की जो साफ सुथरे गीत गाते हैं उनको मंच भी वैसा मिलता है और आर्थिक तौर पर भी कोई परेशानी का सामना नहीं करना पड़ता है.

एक और बात ये भी है कि लोग भी इसका विरोध कर रहे हैं. मसलन आपको हाल का ही एक वाकया बताती हूं. बड़ौदा में मेरा एक कार्यक्रम था. जिस दिन उन्होंने मेरा कार्यक्रम रखा था उसी दिन उन्होंने एक और गायक का भी कार्यक्रम भी रखा था. उसका नाम नहीं लूंगी. मैंने गाना गाया. लोगों ने खूब पसंद किया.

थोड़ी देर बाद वो गायक मेरे पास आया और कहा कि दीदी मुझे माफ कीजिएगा मैं मंच पर जा रहा हूं और गाना थोड़ा अश्लील होगा. मैंने उसे मना किया लेकिन वो नहीं माना.

अब आप लोगों की प्रतिक्रिया जानकर हैरान होंगे कि उसने जैसे ही गाना शुरू किया तो लोगों ने उसका विरोध करते हुए मंच से उतार दिया.

तो आप ये कह रही हैं कि पब्लिक डिमांड जैसी कोई चीज नहीं होती? अगर आप साफ सुथरे गीत गाते हैं तो आम लोग अपने आप उन गायकों को बाहर का रास्ता दिखा देंगे जो सस्ती लोकप्रियता के लिए कुछ भी गाने को तैयार हैं.

देखिए मैं कह रही हूं कि अगर आप किसी को थाली में सिर्फ दाल-चावल दें तो उसको वही खाना पड़ेगा. वो आपसे डिमांड करे कि कुछ और खिलाओ तो आप अपने हाथ खड़े कर दीजिए कि जी हमारे पास तो बस यही है. कुछ लोगों ने सिर्फ यही किया.

आप बताइए दुनिया में कौन सी ऐसी बात है जो शालीनता के साथ नहीं कही जा सकती है. आप बताइए शारदा सिन्हा जी ने कौन से अश्लील गीत गाए हैं. और उनकी लोकप्रियता भी देख लीजिए.

 

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आप 18 भाषाओं में गाती हैं. भोजपुरी-मैथिली बेल्ट से शायद आप इकलौती गायिका हैं जो इतनी भाषाओं में गाती हैं. क्या लगता है कि नए गायक उतनी रियाज भी नहीं करते? क्योंकि दूसरी भाषाओं के लोकगीतों या गीतों को गाना आसान भी नहीं है. जैसे पूर्वांचली गीतों को जो गायक बेहतर तरीके से गाता है तो उसे उपमा दी जाती है पूरबिया बहुत अच्छे से गा रहा है. दूसरी भाषा की आंचलिकता को पकड़ना कितना मुश्किल है?

ये बात सही है कि नए गायक उतना रियाज नहीं करते. दूसरी भाषाओं को समझने की ज़हमत नहीं उठाते. जहां तक 18 भाषाओं में गाने की बात है तो इसे लेकर एक तरीके का जुनून भी है मुझमें. भारत के लगभग सभी हिस्सों में गाया. तो जहां भी कहीं प्रोग्राम होता था तो वहां लोकगायकों और गीत लेखकों से मिलती थी. उनसे समझने की कोशिश करती थी. 1989 में यूपीएसी का इम्तिहान भी लोकगीतों को सब्जेक्ट के तौर पर रखकर किया. लोकगीतों पर रिसर्च की. वो मेरे बहुत काम आया.

हां, ये भी सही है कि जिस भाषा को जानते नहीं हैं उन गीतों की आंचलिकता समझने में दिक्कतें तो आती हैं. मेरी कोशिश रही है कि उसकी आंचलिकता को पूरी तरह उतारा जाए. इसी वजह से मैंने एक गीत को गाने को लेकर महीनों रियाज किया है. अब भी समय देती हूं. दरअसल मुझे इसका शौक भी है.

एक बात और है. मैं बिहार से हूं तो बिहार की जितनी भाषाएं हैं, उन पर तो मैंने जल्दी पकड़ बना ली थी. मैं गीत भी लिखती हूं. वो भी मुझे मदद करता है.

कई बार ऐसा भी होता है कि श्रोताओं की डिमांड पर भी सीखने की इच्छा होती है. जैसे मैं किसी ऐसी जगह पर गई जगह प्रोग्राम तो भोजपुरी या मैथिली का होता है लेकिन वहां पर लोग अपने आंचलिक गानों की डिमांड करते हैं. यह मुझे प्रेरित करता है कि इनकी भाषा में गाना सीखना है.

एक गायक को गायक बनाने में उसकी इर्द-गिर्द के वातावरण का भी प्रभाव होता है. आपके जीवन में वह प्रभाव कौन लेकर आया? पहली बार स्टेज का सामना कब हुआ?

लगभग ढाई साल की उम्र से मैं गीत गा रही हूं. कोई माहौल नहीं था. परिवार में भी कोई ऐसा नहीं था जो गीत-संगीत से जुड़ा हो. लेकिन मेरा शौक बढ़ता जा रहा था. आस-पास के लोग तारीफ करते थे. तो मैं कहती थी कि आप लोग माता-पिता जी को समझाइए. मैं 10वीं थी जब भागलपुर रेडियो स्टेशन से लोकगीतों पर गायकों के चयन के लिए फॉर्म निकले थे.

वहां पर फॉर्म भरा तो 283 कैंडिडट में मुझे चुना गया. कुछ महीने के बाद रिकॉर्डिंग के लिए लेटर आया तो उसमें लिखा था कि आपको पांच गीत भी लाने हैं. उसी समय मैंने पांच गीत लिखे. उसमें से मेरा पहला गानी हिट हुआ. वह गीत था हे हो पिया, दुखवा कहलो न जाए, फाटे जिया. इसी ने मुझे मंच भी दिया.

फिर मैंने बहुत सी महिलाओं से मिलकर फोक गीतों पर काम करना शुरू कर दिया. हां, मुझे सिविल सर्विसेज भी बहुत अट्रैक्ट करती थी. फिर मैंने लोकगीतों के माध्यम से तैयारी भी की. लेकिन फिर मैंने सोचा कि नहीं शायद मुझे सिंगर ही रहना है. यही सबसे बेहतर है. और आगे कहानी सभी जानते हैं.

फोक म्यूजिक का आपने नाम लिया. अब के समय में आप उसकी स्थिति क्या देख रही हैं.

देखिए मुश्किल ये है कि जो भोजपुरी फिल्में बन रही हैं, उनमें पारंपरिक गीतों का ख्याल नहीं रखा जाता है. ज्यादातर तो वो आइटम सॉन्ग से काम चला रहे हैं. कुछ गीत बनाते भी हैं तो सुगम संगीत होता है न कि लोकगीत. दरअसल लोग खुद को रिपीट कर रहे हैं. नई क्रिएशन कम हो रही है. देखिए हमें भोजपुरी और मैथिली के क्लासिकल लेखकों को भूलना नहीं चाहिए. उस स्तर पर गड़बड़ियां हो ही रही हैं.

एक और बात है. लोगों को भी अश्लीलता का विरोध करना होगा. लोग विरोध करेंगे तो कलाकार भी अपनी जड़ों की ओर लौटेंगे.

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