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व्यंग्य: मुझे ही राष्ट्रपति चुन लो, आम आदमी का भी हक बनता है...

पार्टियों में कंफ्यूजन है कि किसे राष्ट्रपति बनाया जाए? ऐसे में मैं अपना नाम पेश करना चाहता हूं

Piyush Pandey Updated On: May 04, 2017 09:00 AM IST

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व्यंग्य: मुझे ही राष्ट्रपति चुन लो, आम आदमी का भी हक बनता है...

भारत एक चुनावधर्मी देश है. यहां हर वक्त किसी न किसी चुनाव का न सुनाई देने वाला बिगुल बजता रहता है. कभी लोकसभा, कभी विधानसभा और अब तो एमसीडी और पंचायत चुनावों का भी बिगुल बजता है. फिलहाल राष्ट्रपति चुनाव का बिगुल बजने लगा है. राष्ट्रपति चुनाव में जनता की भले सीधी हिस्सेदारी न हो लेकिन बतौर रायचंद देश का हर शख्स राष्ट्रपति चुनाव में भी हिस्सा लेता है.

लोग कंफ्यूज हैं कि कौन राष्ट्रपति बनेगा? नाम उछालने वाले अमिताभ बच्चन, रजनीकांत, नारायण मूर्ति तक का नाम उछाल रहे हैं, लोग लपक रहे हैं. पार्टियों के अपने नेता कंफ्यूज हैं कि किसका नंबर लगेगा. जैसे बीजेपी में आडवाणी जी, जोशी जी, सुषमा जी, सुमित्रा जी समेत इतने लोगों का नाम चल रहा है कि फैसला पर्ची उछालकर ही हो सकता है, सहमति से तो होने से रहा. कांग्रेस की समस्या यह है कि वो किसी को पकड़कर राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बना भी दे तो उसे खुद कांग्रेसी विधायक-सांसद वोट करेंगे या नहीं- इसकी गारंटी कोई नहीं ले सकता.

President

दरअसल, पार्टियों में घनघोर कंफ्यूजन है कि किसे राष्ट्रपति बनाया जाए? देश का सच्चा, कर्तव्यनिष्ठ और संवेदनशील नागरिक होने के नाते मुझे लगता कि मुझे राजनीतिक दलों की समस्या सुलटानी चाहिए. ऐसे में मैं अपना नाम राष्ट्रपति पद के लिए पेश करना चाहता हूं. किसी भी विचारधारा से मेरा कोई लेना देना नहीं लिहाजा वाम और दक्षिणपंथी पार्टियां मुझे विचार निरपेक्ष होने के चलते समर्थन दे सकती है.

यूं सच कहूं तो राष्ट्रपति बनने के अपने कुछ दूसरे उद्देश्य भी हैं. अरे नहीं, भ्रष्टाचार नहीं. भ्रष्टाचार की कोयल तो पक्ष-विपक्ष के नेताओं के आंगन में ही इत्ती कूक लेती है कि राष्ट्रपति भवन कायदे से पहुंच ही नहीं पाती.

New Delhi: President Pranab Mukherjee walks in Mughal Gardens at Rashtrapati Bhavan during its press preview in New Delhi on Saturday. PTI Photo by Manvender Vashist(PTI2_4_2017_000158B)

अपना टारगेट कुछ और है. एक तो इत्ते बड़े घर में अपन कभी रहे नहीं हैं. रहे क्या गए भी नहीं हैं. बच्चे कबड्डी या क्रिकेट सब घर में ही खेल लेंगे. अभी सोसाइटी में बने पार्क तक जाते हैं तो भी उनके साथ उनकी मम्मी को जाना पड़ता है. राष्ट्रपति भवन में पहुंच जाएंगे तो चुन्नू-मुन्नी की मम्मी संग कुछ रोमांटिक गूटरगूं का वक्त मिल जाएगा.

फिर ‘वर्क फ्राम होम’ का कॉन्सेप्ट भी पूरी तरह समझ आ जाएगा. घर में ही होगा दफ्तर तो कर लो पेट्रोल का दाम रुपए पांच सौ. हमारे ठेंगे से!

एक बड़ी समस्या और हल होगी. वो यह कि अगले दो तीन साल में परिवार के 17 छोरे-छोरियों को शादी का लड्डू चखना है. तो मौसा-चाचा-बुआ वगैरह सारे लोग "दिल्ली वाले इंटेलीजेंट कम मालदार रिश्तेदार" यानी मेरी तरफ आंख लगाए बैठे हैं. उन्हें क्या मालूम दिल्ली शहर में पचास-साठ हजार में महीने भर में पचास किलो आलू-प्याज और टमाटर तक नहीं आ रहा. इत्ता बड़ा घर होगा तो सारी बारातें यहीं निपट लेंगी. धर्मशाला-होटल का तो चक्कर ही नहीं. इत्ते बड़े कमरों में बाराती-घराती मस्ती से रहेंगे.

President-House

निठल्ला चिंतक हूं तो कविताएं लिखना मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है. कविताएं पेल रहा हूं सालों से. 84 बार प्रकाशकों ने मुझे आधा कप चाय और एक किलो आश्वासन के साथ वापस भेजा है. बेइज्जती जैसे प्रगति विरोधी और घटिया शब्द को मैंने अपनी डिक्शनरी में कभी रखा ही नहीं, इसलिए कह सकता हूं कि ये इंसल्ट नहीं थी अलबत्ता उसके नीचे की कोई चीज रही होगी. राष्ट्रपति बन गया तो कविता संग्रह झटके में आ जाएगा. हो सकता है कि कविताओं पर कोई एलबमनुमा आइटम भी बन जाए.

अपनी नौकरी में दिल्ली शहर ही कायदे से नहीं घूम पाया देश तो क्या खाक घूम पाता. पत्नी की वेदना से व्यथित होकर ससुर साहब ने एक बार दिल्ली-लखनऊ के बीच प्लेन का टिकट गिफ्ट न किया होता तो अंदर से प्लेन को भी हम उड़ने वाली बस ही समझते. कित्ते भले होते हैं न सास-ससुर? खैर, राष्ट्रपति बना तो यह ख्वाब भी पूरा हो लेगा. मेरी श्रीमतीजी ने भी इस ख्वाब की खूंटी पर अरमानों की लंबी लिस्ट टांग रखी है.

तो आम आदमी के नाम पर वोट मांगने वाले राजनीतिक दलों... तुम्हें एक आम आदमी का वास्ता. एक आम आदमी की कसम. मुझे सर्वसम्मति से राष्ट्रपति चुन लो. आखिर कॉमनमैन को भी राष्ट्रपति बनने का हक है.

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