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गंगा मैया नहीं हमारा राष्ट्रीय डस्टबिन है

हमने गंगा को जमा मूर्तियों से लेकर रिश्वत और बेईमानी के पैसों से उपजे गिल्ट को डम्प करने वाला डस्टबिन बना दिया है

Animesh Mukharjee | Published On: Jun 03, 2017 07:51 AM IST | Updated On: Jun 03, 2017 09:02 AM IST

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गंगा मैया नहीं हमारा राष्ट्रीय डस्टबिन है

लोग अक्सर बताते हैं कि गाय का दूध अमृत होता है. मेरा मन करता है कि पूछूं कि क्या सड़क पर डस्टबिन में पड़ी पॉलिथीन भी गाय के पेट में जाकर अमृत बन जाती है. खैर गाय पर सवाल पूछने के कई ‘पहलू’ हो सकते हैं तो उसपर बात न करके गंगा पर बात करते हैं.

अगर गाय की तरह गंगा पर स्कूल में निबंध लिखना होता तो पहली लाइन होती कि गंगा दुनिया का सबसे पवित्र डस्टबिन है. घर में जमा मूर्तियों से लेकर रिश्वत और बेईमानी के पैसों से उपजे गिल्ट को डम्प कर आने वाला डस्टबिन.

अब आप कहेंगे नहीं गंगा तो मैया है. गंगा को मैया कहने का उसकी वास्तविक भलाई करने से उतना ही संबंध है जितना मां और बहन की इज्जत करने से मां-बहन करने का. इसीलिए गाय की रक्षा की खातिर खोलने वाला खून गंगा की सफाई के लिए गुनगुना भी नहीं होता. उदाहरण के साथ समझिए.

गंगा किनारे बसे एक शहर में नमामि गंगे नामक कार्यक्रम हुआ. गंगा पर चिंतित नेता का शहर में आना हुआ. एक डिग्री कॉलेज में सभा हुई. गंगा की रक्षा की शपथ ली गई. कविताएं पढ़ी गई.

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'जमीन में दबाना मुसलमानों का रिवाज है, इसलिए...'

दूसरे कॉलेज की लड़कियों ने आकर गंगा गीत गाया. और शाम को शंख और फूल के साथ आरती हुई. इसके बाद तीसरी कसम की नौटंकी कंपनी की तरह पूरा डेरा अगले शहर की ओर चल पड़ा. और हीरामन की तरह तमाम लोग सवाल करते रह गए कि इन सब से गंगा कैसे साफ हो गई.

अब इन तर्क वाले लोगों की बात करें जो सिस्टम को गाली देते हैं. कहते हैं. कि इन नेताओं से कुछ नहीं होता. फलां-फलां. इसी बीच बताते हैं. कि साब, हम तो साल भर के सारे शादियों के कार्ड, भगवान की छवि वाले कैलेंडर जमा करते हैं. और एक बार दूर 15 किलोमीटर जाकर कटरी के पास डाल आते हैं.

लगे हाथों एक और घटना सुन लीजिए. हमारे शहर की दुर्गा पूजा और गणेश चतुर्थी में अब भू-विसर्जन होता है. कुछ को कानूनी आदेश से मनवाया गया है, कुछ अपनी मर्जी से ऐसा करते हैं.

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इस साल दुर्गा पूजा के समय एक नया तर्क सुना कि जमीन में दबाना मुसलमानों का रिवाज है और अगले साल से हम माता रानी को मैया में ही डुबोएंगे ताकि माता का इसलामीकरण न हो सके. यकीन मानिए ऐसा होगा भी क्योंकि आज के लोकतंत्र में रैडिकल होते ऐसे सच्चे धर्म-गो रक्षकों की तादाद सबसे ज्यादा है.

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दरअसल गंगा हमारे देश में धर्म-संस्कृति का जामा पहना कर सारी गंदगी को जायज ठहराने वाली हिपोक्रेसी का सबसे अच्छा उदाहरण है. और यकीन मानिए इस खेल में सब शामिल हैं.

अभी हाल ही में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने एक फैसला देते हुए गंगा को जीवित बॉडी माने जाने का फैसला सुनाया. न्यूजीलैंड की माओरी कम्युनिटी लगभग 150 साल के संघर्ष के बाद अपने यहां ‘व्हांगहुई’ नदी के लिए इस फैसले पर पहुंची थी. हमने उसको यहां दोहरा लिया. क्या किसी ने सवाल पूछा कि भारतीय परिस्थितियों में इस फैसले का क्या मतलब है.

निजाम गंगा सफाई में कितना उत्सुक है

इससे पहले नेशनल ग्रीन ट्रिब्युनल ने उत्तर प्रदेश जल निगम और केंद्र सरकार के जल मंत्रालय पर मिलाकर 1500 करोड़ का जुर्माना लगाया था. फैसले में बताया गया था कि दोनों विभाग मिलकर पूरा गड़बड़झाला चला रहे थे. दो विशुद्ध विरोधी सरकारों का एक साथ मिलकर इसपर आना दिखाता है कि हम गंगा के प्रदूषण के लिए कितना उत्साहित हैं.

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अगर प्लानिंग के स्तर पर बात करें तो 2015 में वित्तमंत्री अरुण जेटली ने कहा था कि गंगा के किनारे रहने वाले तमाम लोगों को टॉयलेट इस्तेमाल करने चाहिए. गंगा के किनारे स्वच्छ भारत अभियान के तहत तमाम टॉयलेट बने भी हैं. मगर इनमें ज्यादातर में कोई सीवेज सिस्टम नहीं है. टॉयलेट का मतलब चार दीवारें खड़ी करके उसमें एक सिरेमिक सीट रखना नहीं होता.

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अगर प्रदूषण पर काम करने वाली संस्थाओं की माने तो इन तुरत-फुरत बने शौचालयों से गंगा का प्रदूषण बढ़ा ही है कम नहीं हुआ हैं. ऊपर से जब गंगा की सफाई का जिम्मा उठाए उमा भारती कहती हैं कि विद्युत शवदाह की व्यवस्था लोगों की आस्था के चलते नहीं की जाएगी तो अंदाजा हो जाता है कि हमारे निजाम गंगा सफाई के लिए कितना उत्सुक है.

छोड़िए ये सब जब तक गंगा जल डुबकी लगाने लायक लगता रहे तब तक उसमें पाप धोते रहिए, हो सकता है कि किसी दिन काशी के घाट पर क्योटो मिल जाए. तब तक जय गंगा मैया.

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