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लक्ष्मी और सरस्वती के बीच बैर को दूर करने के विराट संकल्प का नाम है भारत

अबनीन्द्रनाथ टैगोर के चित्र से उठते भावबोध ने आगे चलकर भारतीय मध्यवर्ग को जीवन का मंत्र दिया. यह मंत्र था- सादा जीवन, उच्च विचार का

Chandan Srivastawa Chandan Srivastawa Updated On: Oct 19, 2017 10:25 AM IST

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लक्ष्मी और सरस्वती के बीच बैर को दूर करने के विराट संकल्प का नाम है भारत

आटा-दाल का भाव जोड़ने और जुटाने के फिक्रमंद इस देश में बहुत हैं. पढ़ाई-लिखाई से जीविका कमाने वाले ऐसे लोग जब किराने की दुकान की उधारी समय पर नहीं चुका पाते तो बेचारगी में उनके मुंह से निकलता है- ‘क्या करें! ‘लक्ष्मी’ और ‘सरस्वती’ में बैर होता है. ये दो देवियां किसी के घर एक साथ नहीं विराजती.’

लक्ष्मी और सरस्वती के बैर की सनातन कथा

इस बेचारगी को परंपरा के भीतर पढ़ना हो तो कौरवों-पांडवों को धनुर्विद्या की शिक्षा देने वाले गुरु द्रोणाचार्य की कथा याद कर लीजिए. द्रोणाचार्य का गुरुकुल (पढ़ाई) का जीवन भारी गरीबी में बीता. कहते हैं, वेद-वेदांग में पारंगत इस विद्वान का यश जब चारों ओर फैल चुका था, तब भी उन पर धनलक्ष्मी की इतनी कृपा नहीं हो पाई थी कि भूख से बिलखते बालक अश्वत्थामा की भूख मिटाने के लिए एक कटोरी दूध खरीद सकें.

द्रोणाचार्य की दीन-दशा का अनुमान लगाइए कि जब भूख से अकुलाते अश्वत्थामा ने अपनी मां कृपी से दूध मांगा तो उन्होंने पानी में आटा घोला और उसे ही दूध बताकर पीने को दे दिया. धन की कमी का यह दृश्य धनुर्विद्या के इस आचार्य के हृदय को वेध गया. कहते हैं, मर्माहत द्रोणाचार्य ने राजा द्रुपद को उनका दिया हुआ वचन याद दिलाया था. द्रुपद भारद्वाज मुनि के आश्रम में द्रोण के सहपाठी थे और अपने मित्र से वादा किया था कि मांगने पर द्रोण को अपना आधा राज्य सौंप देंगे. कथा कहती है कि दीन द्रोण ने राजा द्रुपद को अपनी तरफ से वचन याद दिलाया और राजा की तरफ से पाया केवल अपमान भरा कटु वचन!

लक्ष्मी की कृपा से वंचित सरस्वती साधकों की इस पुरातन कथा का विस्तार बीसवीं सदी तक चला आया है. क्या गरीबी में बीते महाकवि ‘निराला’ के जीवन की कोई गूंज उनकी कविता ‘राम की शक्तिपूजा’ की इन पंक्तियों में नहीं सुनी जा सकती- ‘धिक् जीवन को जो पाता ही आया है विरोध, धिक् साधन जिसके लिए सदा ही किया शोध..?’

द्रोण की कथा में जो ‘अपमान’ है, राम की शक्तिपूजा की इन पंक्तियों में उसी भाव ने ‘धिक्कार’ का रुप ले लिया है. और दोनों प्रसंगों का साझा सवाल एक है- प्रयत्न पुरस्कारहीन क्यों?

भारतस्थिरलक्ष्मी की खोज

लक्ष्मी और सरस्वती के आपस बैर को दूर करने के विराट संकल्प का नाम है भारत. आजादी की आधी रात नेहरू अपने भाषण में यही तो कह रहे थे- ‘एक नया सूरज उग रहा है, पूरब के आकाश में स्वतंत्रता का सूरज और एक नई आशा जन्म ले रही है’... यह आशा है- ‘हरेक आंख से हर आंसू’ पोछने के लिए प्रयत्नशील होने की. और आजादी की उस विहान-वेला में शब्द चाहे नेहरू के रहे हों लेकिन उनके मुंह से स्वतंत्रता-संग्राम की भावराशि ही बोल रही थी. इस भावराशि ने भारत की कल्पना ‘स्थिर लक्ष्मी’ के रुप में की.

lakshmi saraswati

शास्त्रों में आता है कि तमोगुणी होकर लक्ष्मी महाकाली कहलाती हैं और सतोगुणी होकर महासरस्वती. सत् और तम का आपसी विरोध तो शाश्वत है. लेकिन भारत विरुद्धों के बीच सामंजस्य खोजने के ही प्रयत्न का नाम है. शास्त्रों में तमोगुणी महाकाली और सतोगुणी सरस्वती के संयुक्त रुप को ‘स्थिरलक्ष्मी’ कहा गया है. शायद, इसलिए लक्ष्मी की पूजा गणेश और सरस्वती के साथ भी की जाती है.

स्वतंत्र भारत की खोज ‘स्थिरलक्ष्मी’ की खोज है, उस लक्ष्मी की खोज जो सबके लिए सर्वदा वर्तमान रहे, आज की भाषा में कहें तो यह समानता की खोज है. आश्चर्य नहीं कि भारतमाता की परिकल्पना स्थिरलक्ष्मी के रुप में की गई. इस कल्पना को वंदे मातरम् गीत में खोजा जा सकता है, भारतमाता के नाम से मिलने वाले मूर्ति-चित्रों में खोजा जा सकता है.

भारत माता का वह चित्र और वंदेमातरम्

याद करें ‘वंदे मातरम्’ गीत की आखिर की पंक्तियां- ‘त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी, कमला कमलदलविहारिणी, वाणी विद्यादायिनी, नमामि त्वाम्, नमामि कमलां अमलां अतुलाम्, सुजलां सुफलां मातरम्.’

दशप्रहरणधारिणी (दस हथियार धारण करने वाली) दुर्गा का नाम बंकिम के इस गीत में एक बार आया है, कमलदल पर विहार करने वाली कमला (लक्ष्मी) का नाम दो दफे और साथ में आया है एक और शब्द-- ‘अमला’.

‘अमला’ का कौन-सा अर्थ ग्रहण किया जाए? क्या इसका एक संकेत गीत में ऊपर ही नहीं है जहां वंदे मातरम् गीत के रचयिता ने भारतमाता (तब का बंगप्रदेश) का विग्रह गढ़ते हुए ‘शुभ्रज्योत्स्ना’ शब्द का प्रयोग किया है?

जरुरी नहीं कि ज्योत्सना का अर्थ चांदनी ही करें. उसकी अर्थच्छटाओं में संकेत छुपा हो सकता है- कुंदेंदुतुषारहारधवला, शुभ्रवस्त्रावृता सरस्वती का. फिर, ‘कमला कमलदलविहारिणी’ के तुरंत बाद ‘वाणी विद्यादायिनी’ भी तो कहा है!

कवि की कल्पना में ‘भारतमाता’ का अवतरण स्थिरलक्ष्मी के रुप में होता है- इस बात को स्पष्ट करने के लिए इस कविता को थोड़ा और जमीन पर उतारें.

abnindra

भारतमाता को चित्रकार की तुलिका से उकेरने के जो शुरुआती प्रयास हुए उसमें एक प्रयत्न अबनीन्द्रनाथ टैगोर का है. उनका बनाया ऐसा एक चित्र 1905 का है- ‘बंगमाता’ का. चित्र इतिहास प्रसिद्ध बंग-विभाजन के दौर का है और अध्येताओं का कहना है कि यह चित्र बाद को भारतमाता के चित्रण का आधार बना.

टैगोर के चित्र ने मध्यवर्ग को जीवन का मंत्र दिया

अबनीन्द्रनाथ टैगौर के रचे इस चित्र में बंकिम का ‘वंदे मातरम्’ अपने असली अर्थ में शायद सबसे बेहतर तरीके से व्यक्त हुआ है. बंगमाता के चित्र में देवी के वस्त्र ना तो लाल (लक्ष्मी) हैं ना उजले (सरस्वती). वस्त्र का रंग गेरुआ है- शायद लाल और उजले को एक में मिलाने का प्रयत्न.

मुखमंडल श्वेत- आभायुक्त है और बंगमाता के इस चतुर्भुजी विग्रह ने हाथ में धारण कर रखा है- वस्त्र, दूर्वादल, माला और पुस्तक. यह संकेत है, कि भारतमाता अपनी संतानों के लिए शिक्षा-दीक्षा-अन्न-वस्त्रदायिनी है. क्या भारतमाता (या फिर कह लें बंगमाता) का यह रुप समृद्धि (लक्ष्मी) और संस्कार (सरस्वती) को एक में समेटने का प्रयत्न नहीं है?

वंदे मातरम् गीत में बंकिम ने देश को देवी-रुप में देखा तो लक्ष्य उसे ‘स्थिरलक्ष्मी’ के रुप में देखने का था और अबनीन्द्रनाथ टैगोर के चित्र में उनकी कल्पना और ज्यादा ठोस हुई. कहने का मन होता है कि चित्र से उठते भावबोध ने आगे चलकर भारतीय मध्यवर्ग को जीवन का मंत्र दिया. यह मंत्र था- सादा जीवन, उच्च विचार का.

‘सादा जीवन उच्च विचार’ का यह मुहावरा वैसे तो किसी और देश और भाषा (अंग्रेजी और इंग्लैंड) से आया है लेकिन भारत ने इस पंक्ति का अनुवाद अपनी मनीषा के अनुरुप किया. यह बात ठीक है कि बाद को परिस्थितिवश भारतमाता का चित्रण बदले रुपों में भी हुआ. और, यह बदलाव इस हदतक हुआ कि अब लोगों को ‘सिंहवाहिनी’ और ‘त्रिशूलधारिणी’ भारतमाता ही याद रह गई हैं, भारत के भीतर बगैर अपना संस्कार किए विश्वशक्ति बनने की कल्पना जो उभार मार रही है!

आज जब एक तरफ भारत में महाधनिकों की संख्या लगातार बढ़ रही है और दूसरी तरफ सामान्य नागरिक की थाली में पड़ने वाला रोजाना का भोजन लगातार कम हो रहा है तो जरुरत बंकिम चंद्र के वंदे मातरम गीत में झंकृत और अबनीन्द्रनाथ टैगोर के बनाए चित्र में अवतरित उसी ‘स्थिरलक्ष्मी’ को पूजने और साधने की है!

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