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नूतन: एक कलाकार, एक पत्नी और एक बेहतरीन गायिका

अस्सी के ही आखिरी सालों मे नूतन पहले ब्रेस्ट कैंसर से पीड़ित हुईं जो बाद में फेफड़े तक फैल गया

Satya Vyas | Published On: Jun 04, 2017 05:45 PM IST | Updated On: Jun 04, 2017 05:51 PM IST

नूतन: एक कलाकार, एक पत्नी और एक बेहतरीन गायिका

अभिनय की विभिन्न पद्धतियों में एक पद्धति 'स्तानिस्लास्की' भी है. इस विधि में कलाकार खुद को चरित्र में पूरी तरह उतार लेता है. यानी अभिनय करते वक्त पूरी तरह चरित्र बन जाना पड़ता है.

इस विधि की अभिनेत्रियों में ‘नूतन’ का नाम पहले आता है. वह किरदार निभाते वक्त खुद किरदार हो जाया करती थीं . फिल्म सीमा की गौरी हो या बंदिनी की कल्याणी, ऐसा प्रतीत होता था कि आप किरदार को ही देख रहे हैं. लेकिन नूतन को महज अभिनेत्री के खांचे में रखना भी उनके साथ ज्यादती ही होगी. वह  संपूर्ण थीं.

नूतन कलाकार के रूप में

कुमारसेन और शोभना समर्थ की बेटी नूतन का जन्म 04 जून 1936 को हुआ था. उन्होंने मात्र 14 साल की उम्र में ही ‘हमारी बेटी’ फिल्म में काम किया था. अत्यधिक दुबली होने के कारण उनकी मां और गुजरे वक्त की मशहूर अदाकारा ‘शोभना समर्थ’ को यह भी डर लगा रहता था कि उन्हें टीबी न हो. 1952 में मिस इंडिया चुने जाने के बावजूद शोभना ने उन्हें स्विट्जरलैंड भेज दिया.

फिल्मालय स्टूडियो के मालिक एस. मुखर्जी ने जब नूतन को लेकर शोभना समर्थ से बात की तो उन्हें लगा कि यह नूतन के लिए एक बड़ा ब्रेक हो सकता है. नूतन लौट आई. तब तक वह थोड़ी फिल्मों के लिहाज से थोड़ी भरी-पूरी दिखने लगी थीं. फिल्मों में उन्हें ‘सीमा’ से पहचान मिली.

आने वाले वर्षों में उन्हें 'पेइंग गेस्ट', 'दिल्ली का ठग', 'अनाड़ी' जैसी फिल्मों से काफी नाम मिला. लंबे समय तक नूतन 5 फिल्मफेयर अवॉर्ड जीतने वाली अकेली अभिनेत्री थीं.

नूतन एक पत्नी के रूप में

अपने फिल्मी करियर के उरूज में ही नूतन ने नेवी ऑफिसर रजनीश बहल से विवाह कर लिया. अपनी अधूरी फिल्मों को पूरा करने के बाद उन्होंने फिल्मों को अलविदा कहने का मन बना लिया. उनके लिए परिवार पहले था. मगर जब विमल रॉय ‘बंदिनी’ की स्क्रिप्ट लेकर आए तो पति रजनीश ने ही उन्हें फिल्मों में काम करने के लिए मनाया.

नूतन फिर फिल्मों मे लौट तो आईं, मगर उन्होंने परिवार और काम के बीच संतुलन बनाए रखा. रजनीश एक साक्षात्कार में कहते हैं कि मेरी मां जब अंतिम वक्त में बीमार हुईं तो उन्होंने फोन पर कहा कि मुझे नूतन कि याद आ रही है, इसलिए तुझे फोन किया. ऐसी थी नूतन.

नूतन एक गायिका के रूप में

नूतन की पुरकशिश आवाज के तो लोग प्रसंशक थे ही, मगर कम ही लोग जान पाए कि नूतन एक अच्छी गायिका भी थीं. अभिनय को महत्व देने के कारण वो संगीतकारों की कोशिशों के बावजूद ज्यादा नहीं गा सकीं. उन्होंने 'हमारी बेटी', 'छबीली' और 'मयूरी' जैसी फिल्मों मे गीत गाए. उन्होंने कुछ भजन भी रिकॉर्ड करवाए थे.

नूतन और विवाद

नूतन का व्यक्तित्व जिस तरह का था, वह विवादों से कोसों दूर रहती थीं. मगर जैसा कि कहते हैं कि फिल्म इंडस्ट्री काजल की ऐसी कोठरी है जहां से कोई भी बेदाग वापिस नहीं आता. नूतन भी इसका अपवाद नहीं रहीं.

विवाह के बाद नूतन ने अपनी मां शोभना समर्थ पर उनके पैसों के हेर-फेर करने के मामले में मुकदमा कर दिया. खटास इतनी बढ़ी कि मां-बेटी में लगभग बीस वर्षों तक बातचीत भी बंद रही. बाद में जब शोभना समर्थ की तबीयत बिगड़ी तब नूतन ने दोबारा आना-जाना शुरू किया.

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1970 में आई फिल्म ‘देवी’ के सेट पर नूतन ने संजीव कुमार को थप्पड़ मार दिया था. दरअसल वह संजीव कुमार द्वारा किसी पत्रिका को दिए गैर-जिम्मेदारना साक्षात्कार से नाराज थीं जिसमें दोनों के प्रेम-प्रसंग के बारे में लिखा था.

नूतन और फिल्म चयन

नूतन किरदारों को लेकर प्रयोग करने वाली कलाकार थीं. उन्होंने 'मैं तुलसी तेरे आंगन की', 'साजन की सहेली', 'सौदागर' जैसी परिपक्व रोल लेने तब शुरू किए जब अन्य अभिनेत्रियां इन्हें चरित्र कलाकरों की भूमिका मानती थीं.

दक्षिण भारतीय फिल्मों के हिंदी रीमेक पर हामी भरने वाले शुरुआती कलाकारों में से एक नूतन भी थीं. 'मिलन', 'खानदान' जैसी फिल्मों ने उनके चयन को सही साबित भी किया. इस दौर मेंऐसी कहानी उन्हें ही ध्यान में रखकर लिखी जाती थीं.

80 के दशक में उन्होंने कमोबेश मां के किरदार निभाए. उम्र उनके चेहरे से झलकने लगा था. 'मेरी जंग', 'नाम', 'कर्मा' जैसी फिल्मों में उनकी जगह किसी और की कल्पना भी नहीं की जा सकती.

नूतन अपने वक्त से आगे की महिला थीं. वह बिना सहयोग तेंदुए का शिकार कर लेती थीं. वह विधवा किरदारों के प्रेम और पुनर्विवाह जैसी स्क्रिप्ट की हिमायती थीं. इस पर वह लेखकों से बहस भी कर लेती थीं. नूतन अपने वक्त के आगे की विदुषी थी. संस्कृत पर उनकी पकड़ उल्लेखनीय थी.

अस्सी के आखिरी सालों मे नूतन पहले ब्रेस्ट कैंसर से पीड़ित हुईं जो बाद में फेफड़े तक फैल गया. वह दर्द से घबराती थीं इसलिए उन्होने अपने पति से कहा था कि बस इस बात का ध्यान रखा जाए कि उन्हें दर्द कम हो.

पूरा ध्यान रखा गया लेकिन 21 फरवरी 1991 को महज 54 साल की उम्र में नूतन अपना शरीर छोड़ गईं. और साथ ही छोड़ गईं वह खाली स्थान जो सिर्फ वही भर सकती थीं.

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