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इस ठुमरी को शायद ही किसी दिग्गज कलाकार ने ना गाया हो

ऐसा माना जाता है कि ठुमरी गायकी की शुरुआत लखनऊ से हुई थी

FP Staff | Published On: Jul 15, 2017 09:44 AM IST | Updated On: Jul 15, 2017 11:04 AM IST

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इस ठुमरी को शायद ही किसी दिग्गज कलाकार ने ना गाया हो

आज शास्त्रीय गायन की जिस शैली की हम बात करने जा रहे हैं उसे समझाने के लिए हम आपको शुरू में ही एक वीडियो दिखा देते हैं. इस वीडियो को देखने के बाद आपके लिए उस शास्त्रीय गायन शैली को समझना आसान हो जाएगा. ये वीडियो है हिंदी फिल्म इतिहास की एक लाजवाब फिल्म देवदास से, जिसे संजय लीला भंसाली ने बनाया था और संगीत दिया था इस्माइल दरबार ने. आप पहले ये वीडियो देखिए.

‘काहे छेड़ छेड़ मोहे गरवा लगाए’ दरअसल ये शुद्ध तौर पर भारतीय शास्त्रीय संगीत की प्रचलिए शैली ठुमरी है. आपने शास्त्रीय संगीत के कार्यक्रमों में या शास्त्रीय गायकों से ‘ठुमरी’ शब्द जरूर सुना होगा. ठुमरी पारंपरिक भारतीय शास्त्रीय संगीत का अहम अंग है. क्या कभी आपने ये जानने की कोशिश की कि ठुमरी आखिर क्या होती है? कैसे गाई जाती है? ये ख्याल गायकी या ध्रुपद गायकी से अलग कैसे होती है?

अगर आपने ऐसी कोशिश कभी नहीं की तो आज आप इस पोस्ट को जरूर पढ़िए. एक सुपरहिट ठुमरी आप सुन ही चुके हैं लिहाजा आज आपको इन सारी बातों का जवाब मिल जाएगा. पिछले कुछ समय में हिंदी फिल्मों ने कुछ पारंपरिक ठुमरियों को उठाकर ऐसी आधुनिकता के साथ परोसा है कि अब ठुमरी को समझना ज्यादा मुश्किल रहा भी नहीं.

ठुमरी की कहानी, खासियत जैसी बातों को बताएं उससे पहले एक और उदाहरण देखिए जो एक ऐसी लोकप्रिय ठुमरी का है जिसे हर बड़े कलाकार ने अपने-अपने अंदाज में पेश किया है. हम आपको 1938 में आई फिल्म-स्ट्रीट सिंगर की वो ठुमरी सुना रहे हैं जिसे केएल सहगल ने गाया था और संगीत दिया था आरसी बोराल ने.

नवाब वाजिद अली शाह की लिखी गई इस ठुमरी को भारतीय शास्त्रीय संगीत के एक से बढ़कर एक दिग्गज कलाकारों ने गाया बजाया है. जिसमें भारत रत्न से सम्मानित पंडित भीमसेन जोशी से लेकर गजल गायक जगजीत सिंह तक सभी शामिल हैं. मसलन- केसरबाई, सिद्धेश्वरी देवी, किशोरी अमोनकर, बेगम अख्तर, गिरिजा देवी, पंडित राजन साजन मिश्रा, मालिनी अवस्थी जैसे दिग्गज कलाकारों ने भी इस ठुमरी को गाया है. अदायगी के फर्क को समझाने के लिए हम आपको पंडित राजन साजन मिश्रा और जगजीत सिंह की गाई इस ठुमरी को सुना रहे हैं.

कहां से हुई थी ठुमरी की शुरुआत?  

ऐसा माना जाता है कि ठुमरी गायकी की शुरुआत लखनऊ से हुई थी. ऐसा माना जाता है कि ठुमरी शब्ज ‘ठुम’ और ‘री’ को मिलाकर बना है. ‘ठुम’ और ‘री’ का आशय ठुमकत और रिझावत से है. जानकार ऐसा मानते हैं कि ये उपशास्त्रीय गायन की एक शैली है. गायकी की इस शैली को बढ़ाने का श्रेय नवाब वाजिद अली शाह को दिया जाता है.

ठुमरी गायकी में शुरुआती दौर में जिन कलाकारों के नाम मशहूर हैं उसमें अख्तर पिया, सनद पिया, लल्लन पिया, भैयासाहब गणपत राव और उस्ताद मौजूद्दीन खान की गिनती होती है. नवाब वाजिद अली शाह खुद ही अख्तर पिया के नाम से ठुमरियों की रचना किया करते थे. ठुमरी गायकी में यूं तो लखनऊ और बनारस घरानों का योगदान प्रमुख माना जाता है लेकिन गया और पंजाब घराने की गायकी में भी बाद में ठुमरी गायकी का इतिहास मिलता है.

आइए आपको मशहूर गजल गायक उस्ताद मेंहदी हसन की गाई एक बेहद लोकप्रिय ठुमरी सुनाते हैं. जो सुनने वालों को खूब पसंद आती है. इसके बोल हैं- बाजूबंद खुल खुल जाए. इस ठुमरी को भी तमाम दिग्गज कलाकारों ने गाया है. ये ठुमरी भी सुनिए

क्या है ठुमरी गायकी की खासियत?

ठुमरी में स्थाई और अंतरा दो हिस्से होते हैं. ठुमरी गायकी में कलाकार छोटी छोटी तानों का इस्तेमाल करते हैं. ठुमरी अधिकतर राग भैरवी, खमाज, पीलू, झिंझोटी और काफी में गाई जाती है. इस गायन की बंदिशें दीपचंदी तथा जत ताल में होती है. ठुमरी में संगीत के तत्व के तौर पर देखा जाए तो खटरा, मुरकी, पुकार, गिटगिरी और बोल बनाव है.

ठुमरी में गायक स्थाई के बोलों को लेकर आलाप के साथ गायकी की शुरुआत करता है. ठुमरी गायक तबले के साथ बोलों को उनके भाव के अनुसार श्रृंगारिक शैली में प्रस्तुत करता है. फिर ठुमरी गायक धीरे धीरे अंतरे के बोलों को लेकर तार सप्तक की ओर बढ़ता है. गायकी के बीच बीच में गायक स्थाई पर लौटकर सम दिखाता है. तबला वादक की लग्गी-लड़ी और द्रुत लय में स्थाई की संगत के साथ ठुमरी खत्म की जाती है.

फिल्मों में भी ठुमरियों का हुआ है इस्तेमाल

फिल्म-गदर में भी ठुमरी ‘आन मिलो सजना’ का इस्तेमाल किया था. इस ठुमरी के बारे में खुद शास्त्रीस गायक पंडित अजय चक्रवर्ती बता रहे हैं. इन्होंने ही गदर फिल्म में इस ठुमरी को गाया था.

भगवान कृष्ण और राधा के प्रसंगों को लेकर खूब ठुमरियां गाई गई हैं. एक कलाकार के तौर पर पारंगत उसे माना जाता है जो एक ठुमरी को अलग अलग भावों और अर्थ के साथ प्रस्तुत कर सके. जैसे मौजूदा दौर में ‘ठुमरी क्वीन’ कही जाने वाली महान कलाकार गिरिजा देवी जी बाबुल मोरा नैहर छूटो ही जाए को अलग तरीके से परिभाषित करती हैं. इस ठुमरी के बोल हैं

बाबुल मोरा नैहर छूटो ही जाए

चार कहार मिल डोलियां सजाएं

मोरा अपना बेगाना छूटो ही जाए

बाबुल मोरा नैहर छूटो ही जाए

गिरिजा जी इसके मायने बताते हुए कहती हैं कि मरने के बाद अर्थी भी तो चार लोग ही उठाते हैं. ये ठुमरी का दर्शनशास्त्र है. ठुमरी को लेकर शास्त्रीय गायक पंडित अजय पोहणकर और उनके पुत्र अभिजीत पोहणकर ने भी काफी प्रयोग किए हैं. इस प्रयोग के नजरिए से ठुमरी को सुनिए- पिया बावरी. जो एक पारंपरिक ठुमरी है. इस पारंपरिक ठुमरी में पिता पुत्र की जोड़ी ने बड़ी खूबसूरती से आधुनिक वाद्ययंत्रों का इस्तेमाल किया है.

जाने माने गायक पंडित छन्नू लाल मिश्र ठुमरी के एक कड़वे सच की तरफ इशारा करते हैं. वो कहते हैं कि अगर नए गायकों ने ठुमरी की शैली का संरक्षण संवर्धन नहीं किया तो आने वाले समय में ये शैली शायद ही बचेगी. ठुमरी पर आज की बात खत्म करते हैं ठुमरी क्वीन गिरिजा देवी की गाई एक ठुमरी से. अगली बार शास्त्रीय गायन की एक और शैली से आपको रूबरू कराएंगे. चलते चलते गिरिजा देवी जी की ठुमरी

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