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पुण्यतिथि विशेष: जब नौशाद को शादी के लिए बनना पड़ा दर्जी

नौशाद साहब उन गुणी संगीतकारों में से थे जिन्होंने भारतीय संगीत को फिल्मी संगीत का हिस्सा बनाया

Nazim Naqvi | Published On: May 05, 2017 08:24 AM IST | Updated On: May 05, 2017 09:01 AM IST

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पुण्यतिथि विशेष: जब नौशाद को शादी के लिए बनना पड़ा दर्जी

अब शायद वह बात नहीं रह गई है लेकिन 18 साल पहले, किसी पते पर नाम के नीचे, अगर ये तीन शब्द 'कार्टर रोड, बांद्रा, मुंबई' लिखे होते थे तो यकीनन वह फिल्म इंडस्ट्री का कोई बड़ा नाम होता था.

इसी कार्टर रोड पर एक बंगले का नाम ‘आशियाना’ है और इसमें नौशाद अली रहते थे. 18 साल पहले नौशाद साहब के साथ गुजारे वो कुछ घंटे दिमाग में इस तरह बसे हैं जैसे किसी क्लासिक-ग्रंथ की याददाश्त, जिसमें पन्नों की खुशबू भी शामिल होती है.

हम गए तो थे संगीतकार-नौशाद से मिलने, और ख्वाहिश ये भी थी कि अगर मुमकिन हुआ तो शायर-नौशाद से भी गुफ्तुगू कर लेंगे लेकिन ‘आशियाना’ में कदम रखते ही जिस शख्स को सलाम करके हाथ मिलाया वो ‘इंसान-नौशाद’ थे.

जरुरत से ज्यादा सादा-तबीयत इंसान, न कोई बनावट, न कोई स्टारडम, हो सकता है कभी रहा हो ये सबकुछ उनके अंदर, लेकिन हम जिन नौशाद से मिल रहे थे वो 80 साल के तजुर्बे का एक लहरें मारता हुआ समंदर थे. क्या अजब इत्तेफाक था, ‘आशियाना’ के सामने भी समंदर और ‘आशियाना’ के अंदर भी समंदर.

जो नौशाद साहब से मिल चुके हैं वो हमारी इस बात से सहमत होंगे कि वह बातचीत में इतने सहज होते हैं कि अगर कोई बात छुपाना भी चाहें तो नहीं छुपा सकते. पता नहीं कैसे शादी की बात चल पड़ी तो बस फिर क्या था, जीने लगे उन लम्हों को 'मैं बम्बई में था की मुझे वालिदा (माँ) का खत मिला... लिखा था हमने यहां (लखनऊ में) तुम्हारी शादी तय कर दी है... जब रिश्ता लेकर गए तो लड़की के बाप ने पूछा कि लड़का क्या करता है तो मैंने जल्दी से कह दिया कि वह बंबई में दर्जी है... और बहुत अच्छा काम है उसका वहां पर... अब तुम जब आना और तुमसे पूछा जाए तो यही बताना...'

फिर मुस्कुराकर बोले 'देखिए इस मौसिकी की मुहब्बत में मैंने क्या-क्या पापड़ बेले हैं... उस जमाने में जब एक संगीतकार से ज्यादा इज्जत एक दर्जी को दी जाती थी.'

शादी का किस्सा भी खूब मजे लेकर बताते हैं, 'मैं जब शादी के लिए लखनऊ गया तो मेरी पिक्चर रतन रिलीज हो चुकी थी और उसके गाने धूम मचा रहे थे... जब मेरी बारात निकली तो बैंड वाले उसी फिल्म का एक गाना ‘अंखियां मिलाके, जिया भरमा के, चले नहीं जाना’, बजा रहे थे और मेरे ससुर और मेरे बाप दोनों मिलकर उस संगीतकार को कोस रहे थे कि जिसने इतना वाहियात गाना बनाया था.'

नौशाद अली को बचपन से संगीत का शौक था. ये वो जमाना था जब फिल्में मूक होती थीं और परदे के पास ही तबला, हारमोनियम, सितार और वायलिन बजाने वाले बैठते थे. होता ये था कि साजिंदे फिल्म को पहले ही देख चुके होते थे और कहां पर क्या बजाना है यह तय कर लेते थे. जब दर्शक फिल्म देखने आते थे तो इन साजिंदों का संगीत उस मूक फिल्म को नई ताजगी से भर देता था. नौशाद अली भी ऐसी किसी टीम का हिस्सा बन चुके थे और खेल-खेल में ही सीख चुके थे कि ‘बैकग्राउंड म्यूजिक’ का क्या महत्त्व होता है.

बहरहाल उनके वालिद को यह बिलकुल पसंद नहीं था कि उनका बेटा मौसिकी का दीवाना हो जाए. जब बाप की यह सख्ती बर्दाश्त से बाहर हो गयी तो नौशाद ने लखनऊ को तमाम किया और बंबई (अब मुंबई) को सलाम किया.

हालांकि इस ने भी आते ही नौशाद को गले नहीं लगा लिया. 80 साल के नौशाद की आंखों में दादर के ब्रॉडवे थिएटर और उसके सामने वाले फुटपाथ की तस्वीर आज भी उतनी ही ताजा है जितनी 1940 में रही होगी. सड़क के इस तरफ फुटपाथ, जो उनका बिस्तर हुआ करता था और सड़क के उस तरफ ब्रॉडवे थिएटर जहां 1944 में उनकी पहली फिल्म ‘रतन’ रिलीज़ हुई थी.

उसके बाद तो नौशाद ने पीछे मुड़कर ही नहीं देखा. ‘रतन’ की कामयाबी के बाद वो एक फिल्म का मेहनताना 25 हजार लेने लगे थे. उन्होंने ज्यादा फिल्में नहीं की. उनकी झोली में यही कोई 67-68 फिल्में होंगी जिनमें उन्होंने संगीत दिया लेकिन कामयाबी की दास्तान ये है कि उसमें से 35 फिल्में सिल्वर-जुबली (25 सप्ताह), 12 गोल्डन-जुबली (50 सप्ताह) और 3 डायमंड-जुबली (60 सप्ताह) चली थीं.

फिल्म संगीत को उन्होंने सुरैया, लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी जैसी आवाजें दीं. ऐसे नायाब गीतों की लड़ी पिरोई जिसका नाम लिए बगैर फिल्म संगीत पर कोई बात हो ही नहीं सकती.

‘नन्हा मुन्ना राही हूं’, ‘ओ दुनिया के रखवाले’, ‘बचपन के दिन भुला न देना’, ;मुहब्बत की झूठी कहानी पे रोये’, ‘अफसाना लिख रही हूं’ और फिर वो शाहकार कृष्ण-भजन ‘मन तरपत हरी दर्शन को आज’.

नौशाद साहब ‘जब प्यार किया तो डरना क्या’ गाने के बारे में बड़ा दिलचस्प किस्सा सुनाते हैं. दरअसल बात यह थी कि के आसिफ ‘मुगल-ए-आज़म’ बना रहे थे और उन्हीं दिनों फिल्मिस्तान स्टूडियो वाले भी उसी कहानी को ‘अनारकली’ के नाम से बना रहे थे.

'मैंने आसिफ साहब से अर्ज किया कि मुगल-ए-आज़म और अनारकली एक ही कहानी पर बनने वाली दो फिल्में हैं और अनारकली जो फिल्मिस्तान वाले बना रहे हैं, मेरा ख्याल है, पहले रिलीज हो जाएगी... तो आप सब्जेक्ट बदल दीजिए वर्ना खामख्वाह में कंपटिशन होगा... तो आसिफ साहब बोले कि सब्जेक्ट तो यही रहेगा... और आपको इसका म्यूजिक करना है... खैर हमने कहा कि चलिए करेंगे...

इत्तेफाक यही हुआ कि हमलोग काम कर ही रहे थे और अनारकली रिलीज हो गई... उसका एक गाना भी बहुत मकबूल हुआ 'मोहब्बत में ऐसे कदम डगमगाए, जमाना ये समझा कि हम पी के आए”...तो मैंने कहा आसिफ साहब इस गाने की सिचुएशन भी दोनों फिल्मों में एक सी है... तो या तो आप ये सिचुएशन बदलिए या गाने का आइडिया बदलिए... तो आसिफ साहब फिर बोले कि भई सिचुएशन भी वही रहेगी आइडिया भी वही रहेगा... अकबर बैठा है, सलीम भी बैठा है और वही रक्कासा आएगी.

इसका नाम अनारकली है और वो आइटम पेश करेगी. इसमें इम्तेहान आपका है मेरा नहीं है. मैंने कहा क्यों.. आपका क्यों नहीं है. कहने लगे मैं तो निकल जाऊंगा,  मैं ऐसा सेट लगा रहा हूं कि लोगों ने आज तक देखा नहीं होगा. तो इस तरह वो शीशमहल का सेट बना और ‘जब प्यार किया तो डरना क्या’ गाना रिकॉर्ड हुआ.

नौशाद साहब उन गुणी संगीतकारों में से थे, जिन्होंने भारतीय संगीत को फिल्मी संगीत का हिस्सा बनाया. वे नए संगीतकारों में पाश्चात्य-संगीत की चोरी से खुद को बहुत जख्मी महसूस करते थे. अपने गम का इजहार उन्होंने अपना एक शेर सुना कर यूं किया.

दरे ग़ैर पर भीख मांगो न फ़न की जब अपने ही घर में ख़ज़ाने बहुत हैं हैं दिन बद-मज़ाक़ी के ‘नौशाद’ लेकिन अभी तेरे फ़न के दीवाने बहुत हैं

या फिर उनका यह शेर- वो ही ‘नौशाद’ फ़न का शैदाई बात करते हो किस दीवाने की

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