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अगली बार अकबर को 'महान' बताने से पहले इन बातों का ध्यान रखिएगा

अकबर की गैर-सांप्रदायिकता वाली छवि के चादर में कई छेद हैं

Avinash Dwivedi | Published On: May 14, 2017 02:46 PM IST | Updated On: May 14, 2017 04:43 PM IST

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अगली बार अकबर को 'महान' बताने से पहले इन बातों का ध्यान रखिएगा

सभी इस बात से सहमत होंगे कि महानता असंदिग्ध होती है. कोई अगर-मगर की गुंजाइश नहीं रखती. महानता यानि एब्सॉल्यूट, परफेक्ट. पर अकबर की महानता परफेक्ट नहीं थी. इतिहास तथ्यों से बनता है, पूर्वाग्रहों से नहीं.

फिर भी अकबर का नाम आते ही लोग महाराणा प्रताप की बहस शुरू कर देते हैं. अपनी धार्मिक अस्मिताओं के बरक्स दोनों को परखने लगते हैं, तुलना करने लगते हैं.

पर इस बहस से निकलकर अगर अकबर के शासन और कामों पर गहराई से नजर डालें तो साफ-समझ आ जाता है कि अकबर की छवि इतिहासकारों ने बढ़ाई-चढ़ाई है. किताबों में इस तर्क के मुकम्मल कारण मौजूद हैं. जो आपकी नज्र हैं.

मुगलों की जड़ें फिर जमाने के पीछे अकबर नहीं बैरम खां का नायकत्व था

हम अक्सर अकबर का जिक्र करते हुए उसे पुन: मुगल साम्राज्य की स्थापना करने वाला कह जाते हैं. पर हमेशा हमें याद रखना चाहिए कि साम्राज्य में 'वकील' के पद पर नियुक्त बैरम खां बादशाह अकबर के नाम के पीछे सक्रिय था क्योंकि जब अकबर को बादशाह बनाया गया, उस वक्त अकबर मात्र 13 साल 4 महीने का बालक था.

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वो बैरम खां ही था जिसके नेतृत्व में मुगलों के सौभाग्यवश जीतता हुआ हेमू हार गया. वहीं इतिहासकार सतीशचंद्र के अनुसार इसके बाद भी अगले चार सालों तक बैरम खां शांत नहीं बैठा और उसने काबुल से लेकर जौनपुर तक अकबर का साम्राज्य स्थापित कर दिया. पश्चिम में अजमेर को जीत लिया. ग्वालियर पर कब्जा कर लिया. मालवा और रणथंभौर पर कब्जे के लिए सेनाएं भेज दीं.

ऐसे में जब साम्राज्य का अधिकांश हिस्सा बैरम खां जीतकर अकबर को दे चुका था तो बैरम खां को उसके हक का क्रेडिट मिलना चाहिए. इसलिए याद रखें कि अकबर के नाम काट दी जाने वाली रसीदें दरअसल बैरम खां के नाम की थीं. बाद में उसी बैरम खां को शिया होने के चलते दरबारियों ने फंसा दिया. और 'महान' बादशाह अकबर अपने 'बाबा' के खिलाफ दरबारी षड्यंत्रों को समझ नहीं पाए.

जिस बैरम खां ने उन्हें इतना बड़ा साम्राज्य जीतकर दिया था. उसी की शक्तियों पर अकबर ने पाबंदी की बात की या हज चले जाने की सलाह दी जो दूसरे शब्दों में 'देश-निकाला' था. इसके चलते बैरम खां बागी भी बने और अंतत: जब हज जाने की बात स्वीकारी तो रास्ते में उनके एक पुराने दुश्मन ने उन्हें मार दिया.

इस तरह से नायक बैरम खां की सारी ख्याति कई बार बादशाह अकबर के नाम पर दर्ज होती है, लोग बैरम खां को भूल ही जाते हैं. वैसे अगर फिर भी अकबर को ही इसका श्रेय देना चाहें तो हेमू पर जीत के बाद जो कटे हुए सिरों की मीनार बनाई गई थी, उसका श्रेय भी अकबर को ही दिया जाना चाहिए.

अकबर ने वादे के बावजूद 30,000 हिंदुओं के नरसंहार का आदेश दिया था

अकबर से मेवाड़ के राणा ने समझौते के लिए इंकार कर दिया था. और इसके बाद अकबर की सेनाएं चित्तौड़ के किले का घेरा डाले हुए थीं. राजा उदय सिंह राजधानी छोड़कर भाग चुका था. ऐसे में जयमल और फत्ता ने सेनाओं का नेतृत्व किया और जबरदस्त बहादुरी का प्रदर्शन किया.

पर घेरा ज्यादा वक्त तक नहीं चला और 24 फरवरी, 1568 को चित्तौड़ के किले का पतन हो गया. करीब 30 हजार किसान और दूसरे नागरिक बंदी बनाए गए. अकबर ने सभी को सुरक्षित रखने का वायदा भी किया था पर जाने क्या बात हुई कि सनक में आकर अकबर ने सभी के कत्ल का आदेश दे दिया. और ये बिना हथियारों के लोग जो अकबर की सेना का मुकाबला भी नहीं कर सकते थे, गाजर-मूली की तरह काट दिए गए.

ध्यान देने योग्य बात ये है कि इन्हीं बादशाह अकबर ने फरमान निकालकर युद्धबंदियों को दास बनाने की प्रथा 1562 में बंद कर दी थी. तो ये था इतिहासकारों द्वारा जनप्रिय सिद्ध किए गए बादशाह की दरियादिली का एक नमूना.

बाज बहादुर और रानी रूपमती के प्रेम में बना विलेन

अकबर ने एक मुकम्मल प्रेम कहानी में विलेन की भूमिका अदा की थी. मांडू के राजा बाज बहादुर ने एक किसान की लड़की रूपमती से शादी की थी. रूपमती से शादी करने के पीछे कारण था रूपमती की सुंदरता और उसकी गायकी. बाज बहादुर खुद भी कला के पारखी और अच्छे गायक थे.

दोनों एक-दूसरे से बहुत प्यार करते थे. उनके और रानी के प्रेम के किस्से बहुत मशहूर थे. मांडू की जनता तो दोनों पर जान छिड़कती थी. अधम खान के नेतृत्व में अकबर की सेना ने मांडू पर आक्रमण किया. कहा जाता है अकबर ने दोनों को पकड़कर लाने के आदेश दिए थे.

चित्तौड़ से मदद मांगने की बाज बहादुर ने कोशिश भी की थी पर सफल नहीं रहा. जिसके बाद मांडू का पतन हो गया. राजा बंदी बना लिया गया पर रानी रूपमती ने पकड़े जाने से भला मौत को समझा और हीरा निगल कर मौत को गले लगाया.

बाद में अकबर ने राजा को भी छोड़ दिया और बाजबहादुर सारंगपुर लौटने पर रानी रूपमती की कब्र पर सिर पटक-पटक कर मर गया. इस घटना के बाद अकबर को अपने किये पर काफी शर्मिंदगी हुई़. उन्होंने पश्चाताप करने के लिए सन 1568 में सारंगपुर के समीप एक मकबरे का निर्माण कराया. बाज बहादुर के मकबरे पर अकबर ने ‘आशिक-ए-सादिक’ और रूपमती की समाधि पर ‘शहीद-ए-वफा’ लिखवाया.

पर इससे वो प्रेम धरती पर फिर नहीं लौटना था. 'अहमद उल उमरी तुर्कमान' ने 1599 में लिखे अपने ग्रथ में रानी रूपमती की इस कहानी का वर्णन किया है. मांडू में आज भी दोनों के प्रेमगीत गाए जाते हैं. पर विडंबना ये है कि जिस 300 बीवियों वाले बादशाह को दूसरे की मोहब्बत का सम्मान करना नहीं आया, उसकी प्रेमगाथा आज टीवी पर बार-बार अत्यधिक बढ़ा-चढ़ाकर दोहराई जाती है.

बाज और रूपमती

बाज और रूपमती

अकबर की गैर-सांप्रदायिकता वाली छवि के चादर में कई छेद हैं

ये एक स्वीकृत तथ्य है कि अकबर के पास 'गाज़ी' की उपाधि थी. 'गाज़ी' का मतलब होता है काफिरों को मौत के घाट उतारने वाला. माना कि अकबर को ये उपाधि उसके प्रारंभिक दिनों में मिली थी. पर अगर अकबर के अंदर सांप्रदायिक सौहार्द की भावना का उदय हो चुका था तो उसने ये उपाधि त्याग क्यों नहीं दी.

अकबर के लिए उपाधियों का कोई महत्व न रहा हो ऐसा भी नहीं है, वो उपाधियों का महत्व बखूबी समझता था तभी तो अपने आखिरी वक्त तक अकबर तमाम उपाधियों से खुद को ही नवाजता रहा था.

बात का एक और छोर है जो काबिल-ए-गौर है कि जिस तरह अकबर की एब्सॉल्यूट महानता की बात की जाती है उसमें कहीं कुछ फांस तो जरूर रही होगी जो हिंदू संत-कवि उनके संरक्षण को हेय मानते रहे. जो अपने काल में ही नहीं स्वीकृत हुआ, उसे जबरदस्ती इतिहासकारों ने स्वीकृत बनाने का प्रयास किया है.

ये अंदाजा आप इसी से लगाइए कि जब तुलसीदास जैसे संत को उन्होंने मनसबदारी देने का प्रयास किया तो अव्वल तुलसी ने मना कर दिया, दूजे तुलसी ने इस प्रस्ताव का मजाक उड़ाते हुए बादशाह की सत्ता को ही चुनौती दे दी यानि उन्हें हद याद दिलाते हुए अदना इंसान बता दिया -

हम चाकर रघुबीर के कतो लिखो दरबार तुलसी अब का होएंगे नर के मनसबदार

अकबर ने ऐसा ही प्रस्ताव कुंभनदास के सामने भी रखा था. उन्होंने भी प्रस्ताव को टाल दिया. इतना ही नहीं कुंभनदास जो 'अष्टछाप' के कवि थे, उन्हें इस बात का लंबे समय तक दुख भी रहा कि उन्हें सीकरी जाना पड़ा. अगर संतों के संपर्क से जनता का कुछ भला होना होता तो कुंभनदास को ये दुख क्यों रहा होता. ये पद पढ़िए लगता है कि अकबर का प्रयास बस प्रभाव गांठने का था -

संतन को कहा सीकरी सो काम ? आवत जात पनहियाँ टूटी, बिसरि गयो हरि नाम जिनको मुख देखे दुख उपजत, तिनको करिबे परी सलाम कुंभनदास लाल गिरिधर बिनु और सबै बेकाम

इसके अलावा सीधे तौर पर अकबर ने कभी इस्लाम के खिलाफ कुछ नहीं कहा. अकबर ने गलत प्रथाओं में सुधार की भी वकालत नहीं की. अकबर ने खुद को फर्रे-इजादी पाने वाला 'इंसान-ए-कामिल' और 'जिल्ल-ए-इलाही' कहलाया.

पर इसके पीछे शासन का अधिकाधिक केंद्रीकरण और खुद ज्यादा से ज्यादा ताकतवर हो जाने की चाहत थी जिसे हम जनता को मुल्लाओं की जकड़ से आजाद कराने के उसके प्रयास के रूप में गलत ढंग से व्याख्यायित करते हैं.

इसलिए अगर किसी वक्त जनसाधारण खौफ के चलते बादशाह से कोई शिकायत नहीं रख रहा तो इसे गैर-सांप्रदायिक कहकर नहीं भुनाना चाहिए.

ऐसे में इतिहासकारों ने अकबर की महानता का खांचा जिस धार्मिक बराबरी, सभी धर्मों को आदर देने और मानवीय दृष्टिकोण के इर्द-गिर्द बुना है उसकी परिणति धर्म दीन-ए-इलाही में हुई थी. और ये भी एक परखी हुई बात है कि उस धर्म का क्या हश्र हुआ? हालांकि कारण कई थे पर निष्कर्ष ये था कि जनता क्या सारे दरबारियों ने भी इसे नहीं अपनाया.

अकबर की शासन संबंधी नीतियों में मौलिकता नहीं थी

अकबर की जिस चीज के लिए सबसे ज्यादा तारीफ की जाती है उनमें से एक है उसकी शासन संबंधी नीतियां. अकबर की महानता से जोड़कर तर्क दिए जाते हैं कि मनसबदारी प्रथा की शुरुआत उन्होंने की. भूमि का अलग-अलग विभाजन करवाया. भूमिमाप की तकनीकी भी उनके वक्त में बहुत अच्छी थी. आदि-आदि.

पर हम इन तारीफों के दौरान ये भूल जाते हैं कि इनमें से शायद ही कुछ मौलिक रहा हो. जानकार मानते हैं कि मनसबदारी प्रथा चंगेज खान के शासन प्रबंध से प्रेरित थी. और अकबर से पहले भी ये बहमनी साम्राज्य में इसका प्रचलन था. इसलिए अकबर के खाते में इसको क्रेडिट कर देना भी तथ्यों की अनदेखी है.

प्रशासनिक सुधारों के नाम पर अकबर के कामों में अधिकांश चीजें उसने शेरशाह के शासन से उठा ली थीं. शेरशाह शासन के मामले में अकबर से कहीं ज्यादा मौलिक था. अकबर ने शेरशाह के भूमि विभाजन को ही नए ढंग से लागू कर दिया. यहां तक की शेरशाह की बांट-माप भी उसने अपनाई जो कई रूपों में आधुनिक समय में भी प्रचलित रही.

इसलिए अकबर को महान मानकर हर चीज के लिए अकबर की तारीफ नहीं की जानी चाहिए. बल्कि देखा जाए तो अकबर प्रशासन के मामले में सीधे तौर पर दूसरे की नीतियों पर निर्भर रहा. इसमें उसकी कोई खास मौलिकता नहीं थी.

अकबर के ही वक्त में तय हो गई थी भारत की गुलामी

अकबर के युद्ध और रणनीति कौशल की भूरि-भूरि प्रशंसा इतिहासकार करते हैं पर वो ये भूल जाते हैं कि अकबर अपने शासन के चरम पर पुर्तगालियों से युद्ध हार गया था. बाद में भले ही सहयोग के प्रयास रहें हों पर ये तथ्य है कि अकबर कभी भी विदेशी व्यापारियों से निपटने में सफल नहीं रहा. उस वक्त व्यापार शासन से बड़ी चीज हो रहा था. ऐसे में इन हारों को आधार बना कर कह सकते हैं कि अकबर ने ही भारत की गुलामी का रास्ता खोला था. अकबर के वक्त में अच्छा-खासा यूरोपीय व्यापार ही नहीं यूरोपीय बस्तियां भी भारत के पश्चिम के तटों पर स्थापित हो चुकी थीं. अकबर उनसे सीधे भिड़ने में डरता था.

अकबर के नवरत्न

अकबर के नवरत्न

फिर भी अकबर ने कभी अच्छी नेवी बनाने की कोशिश नहीं की. अगर अकबर ने ये दूरदर्शिता दिखाई होती तो शायद भारतीय आगे चलकर विदेशी ताकतों का मुकाबला कर पाए होते. लगातार की जा रही अकबर की इस अनदेखी ने तय कर दिया था कि एक दिन ये ताकतवर यूरोपीय व्यापार भारत में सत्ता के कमजोर होते ही अपना विस्तार जरूर करना चाहेंगे. ऐसे में जो भी हुआ वो तो होना ही था. अगर हम अकबर को वाकई महान मानते हैं तो ये अकबर की नैतिक जिम्मेदारी थी कि उनपर नकेल कसी जाए.

पर वो इतना भी महान नहीं था कि ऐसा कर पाता. कहा तो ये भी जाता है कि बार-बार मेवाड़ पर हमला कर उसे जीत लेने की अकबर की ख्वाहिश के पीछे भी व्यापार के लिए मार्ग सुलभ करना और व्यापार पर कर वसूलने की आकांक्षा थी. ऐसे में जो व्यापारियों की सेनाओं से मात खा जा रहा हो, ऐसे बादशाह की 'महानता' आखिर किस काम की?

निस्संदेह अकबर मध्यकालीन शासकों में एक बेहतरीन शासक था उसने शासन के कई क्षेत्रों में बहुत ही अच्छे काम किए पर ये उसके काम नहीं, जरा सी बात को भावनाओं के प्रवाह में आकर बढ़ा-चढ़ा देने की हमारी प्रवृत्ति है जो अकबर को 'महान' बना देती है. और इस तरह उनकी सारी गलतियों/कमियों पर पर्दा पड़ जाता है.

अकबर ने 'माहमअनगा' के बेटे अधम खान को तीन बार महल की छत से उठाकर नीचे फिंकवाया था (अकबरनामा)

अकबर ने 'माहमअनगा' के बेटे अधम खान को तीन बार महल की छत से उठाकर नीचे फिंकवाया था (अकबरनामा)

एक शासक जिसे आधे से ज्यादा भारत गद्दी पर बैठने के बाद उसके संरक्षक उसे जीत के दे जाते हों. जिसे अपनी ही बात का कोई मान न हो. जो आवेश में आकर 'माहमअनगा' के बेटे अधम खान को तीन बार महल की छत से उठाकर नीचे फिंकवाता हो (हालांकि इतिहासकार कहते हैं कि ये इस बात का प्रयास था कि अकबर दिखाना चाहता था कि कोई करीबी इंसान उसके राजकाज में दखल न दे पर जो भी हो तरीका वहशी ही था.). आवेश में अकबर वो सब कर रहा था, जो कि किसी भी बुद्धिमान इंसान के लिए वर्जित है. ऐसे उसे महान कैसे कहा जाए?

हां ये अवश्य है कि अकबर-बीरबल की दंतकथाओं के दम पर धीरे-धीरे श्रुतियों में वो सौम्य भी हुआ, कथाओं का हिस्सा बना और महानता को आगे बढ़ाता गया. ये जानते हुए कि महानता में किसी भी अगर-मगर वाले तर्क की कोई गुंजाइश नहीं होती. महानता एब्सॉल्यूट होती है. अगर बात कहीं अटक रही है तो महानता तो वैसे भी खत्म हो जाती है.

ये भारत जो आज तक मार्कोनी के रेडियो के सामने जेसी बोस के साथ हुए धोखे का जिक्र करता हो वो कैसे इंसानी भूलों से भरे इस बादशाह को महानता का दर्जा दे सकता है? अकबर के नाम के साथ 'महानता' का उपयोग बस 'महानता' शब्द के अर्थ को कम प्रभावी बना देना है.

(सोर्सेज- अकबरनामा, अबुल फजल, मालवा थ्रू द एजेस, एमडी खरे; ए मीडिवल हिस्ट्री ऑफ इंडिया, सतीशचंद्र; एन एडवांस हिस्ट्री ऑफ इंडिया, आरसी मजूमदार, एचसी रायचौधुरी, के दत्ता; द कैम्ब्रिज हिस्ट्री ऑफ इंडिया, अखबार/वेबसाइट - प्रभात खबर, विकीपीडिया, प्रिजर्व आर्टिकल्स. कॉम, इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका)

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