S M L

जानिए क्या दिखाता है शिव का तीसरा नेत्र...

जो समर्पित किया जाता है उसका महत्व नहीं है. महत्व उस भावना का है जिससे वह समर्पित किया जाता है

Devdutt Pattanaik | Published On: Feb 24, 2017 09:00 AM IST | Updated On: Feb 24, 2017 09:53 AM IST

0
जानिए क्या दिखाता है शिव का तीसरा नेत्र...

एक दिन पार्वती ने पीछे से आकर शिव की आंखे बंद कर दी. आंखे बंद करते ही सारी दुनिया में अंधेरा छा गया. अब दोबारा रोशनी करने के लिए सूर्य की जरूरत थी. ऐसे में सूरज को उगाने के लिए शिवजी ने अपनी तीसरी आंख खोली.

तीसरी आंख की चमक से निकली गर्मी इतनी तेज थी कि पार्वती की हथेलियों से पसीना टपकने लगा. पसीने से एक दाग पैदा हुआ. इस धब्बे का नाम अंधक पड़ा. अंधक का मतलब होता है, अंधेरे से बना.

Shiv_DP4

इस अंधक के पालन-पोषण की जिम्मेदारी एक ऐसे असुर को दे दी गई जिसके पास पहले से कोई संतान नहीं थी. बड़े होने पर अंधक ने ब्रह्मा की तपस्या करके एक वरदान मांगा. उसने मांगा कि जब तक वह अपनी मां को वासना की दृष्टि से न देखे तब तक उसकी मौत न हो.

यह भी पढ़ें: ब्रह्मा, विष्णु और महेश में कौन हैं सर्वश्रेष्ठ?

अंधक को इस बात की जानकारी नहीं थी कि वह पैदा कैसे हुआ. उसके मां-बाप कौन हैं, यह भी उसे मालूम नहीं था.

अंधक कैसे मिला अपने माता पिता से

वह पूरी दुनिया जीतने निकल पड़ा. उसे कोई भी हरा नहीं पाया. अपनी जीत का सिलसिला लेकर अंधक कैलाश पर्वत पहुंचा.

Shiv_DP3

कैलाश पर्वत पहुंचते ही अंधक ने शिवजी को ललकारा. तब भगवान शिव ध्यान में थे. अंधक की नजर शिव के बगल में बैठी शक्ति पर पड़ी. अंधक को शक्ति के प्रति आकर्षण हुआ. अंधक को नहीं मालूम था कि यही उसकी मां है.

यह भी पढ़ें:बच्चों को पढ़ाएं रामायण-महाभारत

अंधक पार्वती की ओर बढ़ता है. घबराई पार्वती, शिवजी से उसे रोकने का निवेदन करतीं हैं. ध्यान में लीन शिव अपनी तीसरी आंख खोलते हैं. शिव अपने त्रिशूल से अंधक को निर्बल बनाकर ऐसे ही छोड़ देते हैं. अंधक एक हजार साल तक ऐसे ही खड़ा रहा. नतीजा यह हुआ कि उसकी मांसपेशियां सूखकर खत्म हो जाती हैं. अंधक हड्डी का एक ढांचा मात्र रह जाता है.

Shiv_DP2

इसके बाद उसे एहसास होता है कि पार्वती ही उसकी मां हैं और शिव उसके पिता. अंधक दोनों से माफी मांगता है और उनके साथ गण के रूप में रहने की आज्ञा ले लेता है.

क्या राज छुपा है इस साधारण सी कहानी में ?

ध्यान देने वाली बात यह है कि अंधक का जन्म शिव की तीसरी आंख से होता है. शिव की तीसरी आंख सही और गलत का भेद नहीं कर पाती. उनकी बाकि दोनों आंखें सही और गलत देखती हैं. शिव का तीसरा नेत्र ज्ञान की आंख है.

यह भी पढ़ें:भारत में इस्लामी कट्टरता की जड़ें गहरी जमी हैं

संस्कृति का आधार आपसी भेद और समानताएं हैं. इन मतभेदों और समानताओं की सीमाएं होती हैं. इन सीमाओं में संस्कृति के कुछ पक्ष समाहित होते हैं तो कुछ को अलग कर दिया जाता है. महिला और पुरुष इसी संस्कृति में पति और पत्नी के रूप में होते हैं. भगवान शिव का तीसरा नेत्र संस्कृति से परे है.

शिव की तीसरी आंख पति और पत्नी में भेद नहीं कर सकती. इसलिए शिव को अपनी पत्नी रावण को देना गलत नहीं लगता. इसलिए उनके तीसरे नेत्र से पैदा हुआ बालक मां को पहचान नहीं पाता और उनके प्रति आकर्षित हो जाता है.

शिव को इतना ज्यादा भोला माना जाता है कि वो किसी दूसरी महिला और अपनी पत्नी में फर्क नहीं कर पाते. शिव स्त्री और पुरुष में भी अंतर नहीं कर पाते. जब विष्णु उनके लिए मोहिनी का रूप धर कर आते हैं तो वे उनसे आलिंगनबद्ध हो जाते हैं.

ऐसे में विष्णु और पार्वती यह समझ नहीं पाते की कोई शिव को यह कैसे बताए कि ऐसा करना सही नहीं है. इतना ही नहीं भोलेनाथ उन्हें संस्कृति के नियमों पर सवाल उठाने के लिए बाध्य कर देते हैं. कोई व्यवहार सही या गलत क्यों है? सही व्यवहार का आधार क्या है? संस्कृति को हमेशा एक सा क्यों बने रहना चाहिए या संस्कृति बदलनी क्यों नहीं चाहिए?

यह भी पढ़ें:दिल की बीमारियों से बचना है तो मीट खाना बंद करें

इसी तरह भोलेनाथ ने एक बार पार्वती से कहा,’मुझे जो समर्पित किया जाता है उसका महत्व नहीं है. महत्व उस भावना का है जिससे वह समर्पित किया जाता है.’

शिव को भोलेनाथ कैसे बनाता है ये नेत्र

तमिल पेरियार पुराणम् की एक कथा है. इस कहानी में टिन्नन नाम का एक आदिवासी युवक हर शाम शिकार करने के बाद शिवलिंग पर एक जंगली फूल चढ़ाता है. इस फूल को वह अपने बालों में लगाता था. झरने का पानी अपने मुंह में भरकर लाता. उसे जल के रूप में शिवलिंग पर चढ़ाता. वह शिकार से हड्डियां निकालकर उसका बचा हुआ मांस भी शिवजी को समर्पित करता है.

ग्रंथों में शिवलिंग को फूल, दूध, धूप, राख और फल चढ़ाने की बात कही गई है.

Shiv_DP

सच्ची भक्ति जांचने के लिए एक दिन शिवलिंग में से आंखों का एक जोड़ा प्रकट हुआ. एक आंख से खून निकलने लगता है. पुजारी इसे अशुभ समझकर वहां से भागने लगता है. लेकिन आदिवासी युवक टिन्नन इस खून को रोकने की कोशिश करने लगता है.

यह भी पढ़ें:सबके अपने-अपने विवेकानंद

जब खून नहीं रुकता तो टिन्नन अपनी आंख निकालकर वहां लगा देता है. शिव कहते हैं, ‘यह है सच्ची भावना’. शिव उसे कैलाश बुला लेते हैं.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi